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बदलते विश्व में अहम हैं एआईआईबी, ब्रिक्स बैंक
जैमिनी भगवती /  March 22, 2015

विश्व बैंक और एडीबी स्थायी विकास के मुद्दे पर विकसित देशों के एनजीओ से बहुत प्रभावित नजर आ रहे हैं। बता रहे हैं जैमिनी भगवती

करीब सात साल पहले 25 जनवरी 2008 को मेरा एक आलेख इस अखबार के अंग्रेजी संस्करण में प्रकाशित हुआ था। आलेख में मुख्य रूप से यह सुझाव दिया गया था कि भारत को चीन के सहयोग से पहल करते हुए एक निवेश बैंक बनाना चाहिए ताकि सदस्य देशों के बुनियादी क्षेत्र की परियोजनाओं को मदद की जा सके। यह विचार वित्त मंत्रालय से साझा किया गया था लेकिन उसे लेकर आगे सुनवाई नहीं हुई। 
चीन की पहल पर 24 अक्टूबर 2014 को एशियाई बुनियादी निवेश बैंक (एआईआईबी) की स्थापना की गई। उस वक्त 21 एशियाई देश इसके संस्थापक सदस्य बने और उन्होंने पेइचिंग में समझौता ज्ञापन समारोह में शिरकत की। चीन के राष्टï्रपति ने समारोह की अध्यक्षता की और सदस्य देशों का प्रतिनिधित्व उनके वित्त मंत्रियों ने किया। भारत की ओर से वित्त मंत्रालय के संयुक्त सचिव वहां पहुंचे। इससे पहले विदेश मंत्रालय और वित्त मंत्रालय के बीच यह द्वंद्व रहा कि समारोह में किसे भेजा जाए?
 विदेश मंत्रालय पेइचिंग स्थित भारतीय दूतावास से किसी व्यक्ति को भेजना चाहता था जबकि वित्त मंत्रालय कहना था कि वह बहुपक्षीय विकास बैंकों की प्रमुख एजेंसी है। जाहिर है उसे सफलता मिली। एआईआईबी देश की बुनियादी ढांचा जरूरतों को पूरा करने के लिए लंबी अवधि के ऋण मुहैया करा सकता है इसलिए भारत को उस पर पूरा ध्यान देना चाहिए।
बीते दिनों, पहले ब्रिटेन और फिर फ्रांस, जर्मनी और इटली ने पुष्टिï की कि वे एआईआईबी के सदस्य बने। मीडिया में आ रही खबरों के मुताबिक दक्षिण कोरिया और ऑस्ट्रेलिया भी इसका सदस्य बनने का फैसला कर सकते हैं। अमेरिका ने अपने पश्चिमी मित्रों को एआईआईबी का सदस्य बनने से रोकने की कोशिश की थी लेकिन ब्रिटेन जैसा उसका निकट सहयोगी भी नहीं माना। यह पहला अवसर है जब संयुक्त राष्टï्र सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों में से तीन (चीन, ब्रिटेन और फ्रांस) और जी7 के सात सदस्यों में से चार (ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और इटली) ने अमेरिका को धता बताते हुए एक बहुपक्षीय विकास बैंक की स्थापना में हिस्सा लिया। ध्यान देने वाली बात यह है कि भारतीय प्रिंट मीडिया ने इसे बमुश्किल जगह दी है।
अब तक देखा जाए तो पश्चिम के विकसित देशों ने ब्रिक्स के पांच सदस्य देशों द्वारा स्थापित किए जाने वाले न्यू डेवलपमेंट बैंक (एनडीबी) अथवा कंटिंजेंट रिजर्व अरेंजमेंट (सीआरए) का सदस्य बनने में कोई रुचि नहीं दिखाई है। चीन एआईआईबी पर अधिक ध्यान केंद्रित किए हुए है। एनडीबी की तरह ही 50 अरब डॉलर की संपत्ति वाले एआईआईबी का मुख्यालय शांघाई में होगा लेकिन चीन 49 फीसदी हिस्सेदारी के साथ इसका प्रमुख साझेदार होगा। जबकि 10 अरब डॉलर के एनडीबी में ब्रिक्स के पांचों सदस्य 10-10 फीसदी का योगदान करेंगे।
चीन के साथ भारत के रिश्ते जटिल हैं और वे कई संवेदनशील द्विपक्षीय और व्यापक सामरिक मसलों से घिरे हुए हैं। अगर चीन एनडीबी के काम की गति को धीमा करता है तो भारत कुछ खास नहीं कर सकता। चीन एआईआईबी की मदद से मध्य एशिया के देशों को ऋण दे सकता है और बाद में एनडीबी की मदद से अफ्रीका या लैटिन अमेरिका के देशों को ऋण दिया जा सकता है। भारत एआईआईबी और एनडीबी के साथ अपने संपर्क मजबूत बनाए रख सकता है क्योंकि वह संभवत: सबसे मजबूत साख वाला ऋणकर्ता होगा।
विश्व बैंक और एडीबी लंबे समय से इसलिए फल-फूल रहे हैं क्योंकि उन्होंने शुरुआत में साख वाले ऋणकर्ताओं को ऋण दिया। इनमें भारत और चीन प्रमुख हैं। गरीब देशों को केवल रियायती आईडीए ऋण मिला जिसकी भरपाई अमीर देशों के अनुदान से होती है। चीन में एक पार्टी वाली साम्यवादी शासन व्यवस्था है। उसने खरीद क्षमता के संदर्भ में दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के क्रम में जबरदस्त लचीलापन और क्षमता का प्रदर्शन किया है।
अंतरराष्टï्रीय मुद्रा कोष यानी आईएमएफ के मुताबिक चीन की अर्थव्यवस्था का आकार 176 खरब डॉलर है जबकि अमेरिका की 174 खरब डॉलर। हालांकि कई पड़ोसी मुल्कों के साथ विवादों और मतभेद के चलते एशिया में और अधिक विकास की उसकी संभावनाएं प्रभावित हुई हैं। हालांकि एक बिंदु यह भी है कि अधिकांश एशियाई देशों का कारोबार अमेरिका के मुकाबले चीन के साथ ज्यादा है।अमेरिका के लिए तात्कालिक चिंता का विषय है आईएमएफ, विश्व बैंक और एडीबी के दबदबे में संभावित कमी।
सीआरए, एआईआईबी और एनडीबी का विकास होने पर यह संभव है। वर्ष 2011 में आईएमएफ के तात्कालिक महानिदेशक डोमिनिक स्ट्रॉस कानï को बेहद अप्रिय हालात में पद छोडऩा पड़ा था। उस वक्त जी7 के कई प्रत्याशी उनका पद लेने के योग्य थे लेकिन एक और यूरोपीय नागरिक को ही उस पद पर नियुक्त किया गया। तब से अमेरिकी कांग्रेस लगातार आईएमएफ कोटा सुधार की राह में खड़ी है।
इन बहुपक्षीय संस्थानों के मुख्य अंशधारकों ने यह मानने से इनकार किया है कि एशियाई देशों को इन संस्थानों की नियुक्तियों में पारदर्शिता में कमी और इनके प्रबंधन के तौर तरीकों की वजह से दिक्कत हो रही है। मिसाल के तौर पर मई 1998 में भारत के परमाणु परीक्षण के बाद विश्व बैंक ने भारत को नया ऋण देने से इनकार करके समझौते की शर्तों का उल्लंघन किया था। शर्तों के मुताबिक राजनीतिक वजहों से विश्व बैंक की ऋण नीति प्रभावित नहीं होनी चाहिए।
अमेरिका ने कहा था कि एआईआईबी मौजूदा संगठनों के उच्च ऋण मानकों का पालन नहीं करेगा। विश्व बैंक की ऋण नीतियों को करीब 15 साल पहले वॉशिंगटन डीसी के अखबारों में उस वक्त पूरे पन्ने के विज्ञापन के रूप में छापा गया था जब बैंक को लगा था कि अमेरिकी कांग्रेस उसके पक्ष में नहीं है और उसकी जांच कर रही है।
इन विज्ञापनों में जोर दिया गया कि आईबीआरडी के ऋण का इस्तेमाल संबंधित मुल्क अमेरिका से आयात करने के लिए करते हैं। आईएमएफ की बात करें तो उसने यूक्रेन और यूरोपीय संघ को ऋण देने में हड़बड़ी दिखाई। यह विचार भी नहीं किया गया कि ऐसे ऋण देना सही होगा या नहीं। उसे यही काम 1990 के दशक में एशियाई देशों को ऋण देते वक्त भी करना चाहिए था।
 विश्व बैंक द्वारा लंबी अवधि की बुनियादी परियोजनाओं को ऋण दिए जमाना हो गया। परिणामस्वरूप एआईआईबी उस भूमिका में जाना चाहता है। विश्व बैंक और एडीबी अब विकास के मोर्चे पर विकसित देशों के स्वयंसेवी संगठनों के हिसाब से संचालित नजर आते हैं। कहने का अर्थ यह नहीं कि स्थायी विकास की अनदेखी की जाए लेकिन क्या बहुपक्षीय विकास बैंकों को एक सिरे से जलविद्युत सिंचाई, ताप और परमाणु बिजली घरों की अनदेखी करनी चाहिए? कहने का अर्थ यही है कि अगर एआईआईबी या एनडीबी संबंधित देशों से मशविरा करके ऐसे क्षेत्रों में परियोजनाओं के लिए ऋण देने की पहल करता है तो यह स्वागतयोग्य है।

Keyword: World bank, ADB, NGO, Developed countries,
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