अगर आप वादा करें कि आप गूगल पर नहीं खोजेंगे तो मैं आपसे तीन सवाल पूछूंगा। पहला, मोदी के कार्यकाल में ज्ञानेश कुमार के पहले कितने मुख्य चुनाव आयुक्त हुए? दूसरा, क्या आपको किसी एक का भी नाम याद है? और तीसरा आपको 1950 से अब तक के कितने मुख्य चुनाव आयुक्तों के नाम याद हैं?
पहले सवाल का जवाब है आठ। मोदी के कार्यकाल में 8 मुख्य चुनाव आयुक्त सम्मानजनक ढंग से अपना दायित्व संभालकर विदा हो चुके हैं। जैसा कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रवक्ता कहते हैं इस दौरान उनकी पार्टी को 20 चुनावों में हार मिली और 2024 के लोक सभा चुनाव में पार्टी 240 सीटों पर सिमट गई। आपको 1990 के दशक के टीएन शेषन याद होंगे जिन्होंने इस संस्थान को नए मायने दिए। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस. वाई. कुरैशी को सार्वजनिक बहसों में सक्रियता के लिए और शायद मनोहर सिंह गिल भी याद किया जाता है।
ऐसा शायद इसलिए भी है क्योंकि 1993-95 में गिल ने साथी चुनाव आयुक्त जी.वी.जी. कृष्णमूर्ति के साथ मिलकर शेषन की ‘तानाशाही’ का सफलतापूर्वक सामना किया और तीनों सदस्यों की समानता के सिद्धांत को आगे बढ़ाया। गिल बाद में मनमोहन सिंह की सरकार सरकार में राज्य मंत्री बने। शेष 22 मुख्य चुनाव आयुक्त चुपचाप सेवानिवृत्त हो गए। उनकी प्रतिष्ठा मुख्य रूप से अक्ष्क्षुण रही। इन्होंने इस संस्थान की गरिमा को बढ़ाने का ही काम किया, क्षति नहीं पहुंचाई।
मैं करीब पांच दशकों से चुनाव और राजनीति पर रिपोर्टिंग कर रहा हूं। मुझे भी गिनेचुने नाम ही याद हैं। इनमें से कुछ को तो मैं मुख्य चुनाव आयुक्त बनने के पहले से निजी तौर पर जानता था। जबकि कुछ अन्य से मेरी बाद में पेशेवर मुलाकातें हुईं।
ऐसे जिस पहले व्यक्ति से मैंने बात की थी वे आर. के. त्रिवेदी थे जिन्होंने 18 जून 1982 से 31 दिसंबर 1985 तक पद संभाला। यह बातचीत उस चुनाव के संदर्भ में हुई थी जिसे इंदिरा गांधी ने असम में उस समय करवाया था जब हिंसक जनबहिष्कार का दौर चल रहा था जिसमें करीब 7,000 लोगों की जान चली गई थी। मैंने त्रिवेदी से पूछा कि उन्होंने इस तरह चुनाव क्यों करवा दिया जबकि उसका व्यापक विरोध हो रहा था। उनका संक्षिप्त जवाब था, ‘मुझे व्यावहारिक होना पड़ता है।’ बाद में उनका यह वाक्य खूब उद्धृत किया गया।
75 साल पुराना यह संदर्भ इस तथ्य को सामने रखने के लिए है कि ज्ञानेश कुमार अब हमारे 26 मुख्य निर्वाचन आयुक्तों में दूसरे सबसे अविस्मरणीय व्यक्ति बन गए हैं। जाहिर है उन्होंने यह ‘प्रसिद्धि’ पाने की कोशिश नहीं की थी। लेकिन अब वे इससे पीछा नहीं छुड़ा सकते। न ही मोदी सरकार उनसे खुद को अलग कर सकती है। हालांकि संकेत यही हैं कि सरकार ऐसा करना चाहेगी। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कई प्रभावशाली टिप्पणीकार उनकी तीखी आलोचना कर रहे हैं। इनमें चर्चित टीवी एंकर रजत शर्मा भी शामिल हैं जिन्हें कोई भी विपक्ष का भोंपू नहीं कहेगा।
ज्ञानेश कुमार का पद देश के सबसे अधिक संवैधानिक संरक्षण प्राप्त पदों में से एक है। उन्हें कोई बर्खास्त नहीं कर सकता। 2023 के नए कानून के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में किए गए किसी भी कार्य के लिए उन पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। विपक्ष धमकी दे सकता है लेकिन महाभियोग के लिए उसके पास पर्याप्त संख्या नहीं है। अगर सरकार उन्हें ‘राजी करके’ पद छोड़ने के लिए कहती है तो इसके राजनीतिक परिणाम गंभीर होंगे। खासकर ऐसे में जब 2029 की गर्मियों में होने वाले बड़े चुनाव तक कई चुनाव होने हैं। वे 26 जनवरी 2029 को अपना कार्यकाल पूरा होने तक पद पर बने रह सकते हैं। लेकिन तब ये 27 महीने बहुत लंबे साबित होंगे।
मोदी सरकार के लिए यह स्थिति ऐसे समय आई है जो भारत में आमतौर पर सरकारों के लिए मुश्किल माना जाता है यानी कार्यकाल का तीसरा वर्ष। जनवरी 1966 में इंदिरा गांधी के दौर की शुरुआत से पिछले 60 वर्षों पर नजर डालें तो लगभग हर सरकार ने अपने तीसरे वर्ष के आसपास थकान के संकेत दिखाए और अपनी दिशा से भटकना शुरू किया। केवल वही सरकारें इस संकट से निकल पाईं जिन्होंने अपनी राजनीति या शासन के तौर-तरीकों में नया बदलाव किया।
इंदिरा गांधी ने 1969 में अपनी पार्टी को विभाजित करके ऐसा किया। उन्होंने राजनीति में वामपंथी रुख अपनाया और इसके अनुरूप भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) को वैचारिक सहयोगी बनाया। 1971 में उन्होंने भारी बहुमत हासिल किया लेकिन 1974 तक उनकी सरकार गिरावट की ओर बढ़ने लगी। उनकी हत्या के बाद राजीव गांधी की भारी चुनावी जीत का बड़ा कारण वह राष्ट्रवादी लहर थी जिसे इंदिरा गांधी पहले ही तैयार कर चुकी थीं। खासकर ऑपरेशन ब्लू स्टार के जरिए हिंदी पट्टी में। 545 सदस्यों वाली लोक सभा में 415 सीटों का भारी बहुमत होने के बावजूद राजीव गांधी ने भी 1987 तक अपनी दिशा खो दी और फिर उससे उबर नहीं सके।
यही स्थिति पी. वी. नरसिंह राव के साथ भी हुई। 1991 के आर्थिक सुधारों के साथ उन्होंने जोरदार शुरुआत की लेकिन 1993 तक उनकी सरकार की स्थिति बेहद कमजोर हो चुकी थी। अयोध्या विवाद और अर्जुन सिंह के ‘धर्मनिरपेक्ष’ विद्रोह ने सरकार को पंगु बना दिया था। पहले दो कार्यकालों में मोदी ने तीसरे वर्ष की इस चुनौती को कैसे पार किया? पहले कार्यकाल में नोटबंदी, उरी/सर्जिकल स्ट्राइक और पुलवामा/बालाकोट की घटनाओं ने राजनीतिक परिस्थितियों का रुख बदल दिया। दूसरे कार्यकाल में उन्हें ऐसा कोई नाटकीय बदलाव नहीं मिला और अंततः 2024 में वे लोक सभा में बहुमत के आंकड़े से पीछे रह गए।
ऐतिहासिक रूप से देखें तो थकी हुई सरकारें कैबिनेट में बदलाव करके नए चेहरे लाने की कोशिश करती हैं। इस सरकार के सामने आंतरिक और बाहरी चुनौतियां बढ़ चुकी हैं। अर्थव्यवस्था बढ़ रही है लेकिन रोजगार और वेतन नहीं। बहुत से कमजोर नेतृत्व वाले मुख्यमंत्री दिशाहीन होते जा रहे हैं।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर डॉनल्ड ट्रंप, शी चिनफिंग और व्लादीमिर पुतिन के बीच पारंपरिक समझ और सह अस्तित्व की स्थिति बनती दिख रही है। ऐसे में भारत के सामने एक बेहद जटिल कूटनीतिक भूलभुलैया से निकलने की चुनौती है।
इसके बाद चुनाव आएंगे। पहले उत्तर प्रदेश, पंजाब और गुजरात में चुनाव होंगे और उसके अगले वर्ष कर्नाटक, मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे राजनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण राज्यों में। इन राज्यों में चुनाव ऐसे निर्वाचन आयोग की निगरानी में होंगे जिसकी छवि को हालिया घटनाओं से झटका लगा है और विपक्ष के पास अपनी रणनीति तैयार है। अगर वह किसी राज्य में जीतता है तो कहेगा कि मोदी सरकार के जाने का समय आ गया है। अगर हारता है तो दावा करेगा कि चुनाव में धांधली हुई है।
मोदी के लिए राजनीतिक रूप से सकारात्मक बात यह है कि उन्हें फिलहाल कोई आंतरिक चुनौती नहीं है। उनकी पार्टी, सहयोगी दल और मंत्रिमंडल एकजुट हैं। जैसा कि मैंने पहले लिखा है कुछ लोग महत्त्वाकांक्षाएं जरूर पाल सकते हैं लेकिन कोई भी उत्तराधिकारी की बात नहीं करेगा।
भविष्य की ओर देख रहे ऐसे तीन-चार लोगों को भी पता है कि वे 2029 में भाजपा को जीत नहीं दिला सकते। उन्हें मोदी की जरूरत है ताकि वे चौथा कार्यकाल हासिल कर सकें। 2003 में आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और प्रमोद महाजन को याद कीजिए। वे सभी चाहते थे कि 2004 का चुनाव वाजपेयी जीतें ताकि उनके लिए रास्ता बना रहे। आज के वरिष्ठ नेता मोदी के साथ इससे भी अधिक मजबूती से खड़े होंगे।
तीसरे कार्यकाल के तीसरे वर्ष की इस गिरावट से सरकार को कैसे उबारा जाए यह प्रधानमंत्री मोदी से बेहतर कौन जान सकता है। इसके लिए बदलाव की जरूरत है, मंत्रिमंडल या अन्य पदों पर फेरबदल करना है या नई सोच और नई परियोजनाएं शुरू करनी हैं। यह उन्हें ही तय करना होगा। लेकिन पहली प्राथमिकता चुनाव आयोग के प्रति सम्मान बहाल करने की होनी चाहिए, क्योंकि वह भारत की सबसे महत्त्वपूर्ण संस्थाओं में से एक है।
भारतीय लोकतंत्र की एक विशिष्टता है जिसे 145 करोड़ भारतीय बेहद महत्त्व देते हैं। वह है स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव जो दशकों से लगातार होते आए हैं, भले ही इस दौरान नेता और विचारधाराएं बदलती रही हों। जैसा कि राहुल गांधी ने भी स्वीकार किया है हमारा लोकतंत्र दुनिया के लिए भी एक बड़ी साझा सार्वजनिक संपदा है। अगर ऐसा है तथा चुनाव प्रक्रिया लोकतंत्र के केंद्र में है तो इसकी रक्षा के लिए आगे कौन आए? इसे केवल राजनीतिक दलों के प्रवक्ताओं के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।
मोदी सरकार और निर्वाचन आयोग दोनों के नजरिये से आदर्श स्थिति यह होती कि तीनों निर्वाचन आयुक्त साथ बैठते, सवालों के जवाब देते, कैमरों के सामने मुस्कुराते और देश को बताते कि ‘सब कुछ ठीक है’। ऐसा नहीं हो पाना इस चुनौती की गंभीरता को रेखांकित करता है।
प्रधानमंत्री मोदी भारत को गर्व से ‘लोकतंत्र की जननी’ कहते हैं। तो क्या उन्हें ही आगे आकर देश की चुनाव प्रक्रिया की पवित्रता और निष्पक्षता की रक्षा नहीं करनी चाहिए? कौन जानता है ऐसा करने से उनकी सरकार और पार्टी को भी तीसरे वर्ष की इस सुस्ती से बाहर निकलने में मदद मिल जाए। राजनीति में कभी-कभी गैर पारंपरिक कदम भी कारगर साबित होते हैं।