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Multi-Factor Funds: कम जोखिम में बेहतर रिटर्न का मौका या सिर्फ नया ट्रेंड? निवेश से पहले जानें फायदे-नुकसान

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फैक्टर फंड, ऐसे पैसिव फंड होते हैं जो उन इंडेक्स को ट्रैक करते हैं जिन्हें शेयरों के चयन के लिए कुछ खास मानदंडों (फैक्टर्स) के आधार पर तैयार किया जाता है

Last Updated- June 09, 2026 | 8:00 PM IST
Mutual Fund

Multi-factor funds: दो एसेट मैनेजमेंट कंपनियों (AMC) ने मल्टी-फैक्टर फंड्स के न्यू फंड ऑफर (NFO) लॉन्च किए हैं। कोटक एएमसी ने निफ्टी अल्फा लो वोलैटिलिटी 30 इंडेक्स फंड और ग्रो एएमसी ने निफ्टी स्मॉलकैप 250 मोमेंटम क्वालिटी 100 एक्सचेंज-ट्रेडेड फंड (ETF) पेश किया है।

क्या होते हैं मल्टी-फैक्टर फंड?

फैक्टर फंड, ऐसे पैसिव फंड होते हैं जो उन इंडेक्स को ट्रैक करते हैं जिन्हें शेयरों के चयन के लिए कुछ खास मानदंडों (फैक्टर्स) के आधार पर तैयार किया जाता है। इन फंड्स को स्मार्ट-बीटा फंड भी कहा जाता है।

इन फैक्टर्स में वैल्यू (कम कीमत पर उपलब्ध अच्छे शेयर), क्वालिटी (मजबूत वित्तीय स्थिति वाली कंपनियां), मोमेंटम (तेजी से बढ़ रहे शेयर), लो वोलैटिलिटी (कम उतार-चढ़ाव वाले शेयर) और अल्फा (बाजार से बेहतर प्रदर्शन करने की क्षमता) शामिल हो सकते हैं।

मोतीलाल ओसवाल एसेट मैनेजमेंट कंपनी के पैसिव बिजनेस के हेड प्रतीक ओसवाल कहते हैं, “मल्टी-फैक्टर निवेश रणनीति में कई फैक्टर्स को एक साथ शामिल किया जाता है, ताकि किसी एक फैक्टर पर निर्भरता कम हो और अलग-अलग बाजार परिस्थितियों में ज्यादा संतुलित प्रदर्शन हासिल किया जा सके।”

Also Read: Gold ETF से एक साल में पहली बार निकासी, बढ़ी निवेशकों की चिंता; अब आगे क्या करना चाहिए? 

स्टाइल रिस्क को कम करते हैं मल्टी-फैक्टर फंड 

सिंगल-फैक्टर फंड्स की एक बड़ी कमजोरी यह होती है कि उनका प्रदर्शन किसी एक निवेश शैली (स्टाइल) पर काफी हद तक निर्भर करता है।

फंड्सइंडिया के सीनियर मैनेजर (रिसर्च) जिरल मेहता कहते हैं, “यदि कोई निवेशक केवल एक फैक्टर आधारित रणनीति में निवेश करता है, तो उस निवेश शैली के बाजार में पसंद से बाहर होने पर उसे कई वर्षों तक कमजोर प्रदर्शन का सामना करना पड़ सकता है।”

कई फैक्टर्स को मिलाकर जोखिम कम किया जा सकता है। मल्टी-फैक्टर फंड निवेशकों को ज्यादा स्थिर प्रदर्शन प्रदान कर सकते हैं।

ग्रोथवाइन कैपिटल के को-फाउंडर शुभम गुप्ता कहते हैं, “मल्टी-फैक्टर फंड्स के पोर्टफोलियो में डायवर्सिफिकेशन भी ज्यादा होती है।”

फैक्टर साइक्लिकैलिटी का जोखिम 

हालांकि कई फैक्टर्स को एक साथ शामिल करने से फैक्टर साइक्लिकैलिटी (बाजार के अलग-अलग चरणों में विभिन्न फैक्टर्स के प्रदर्शन में बदलाव) का जोखिम कम हो जाता है, लेकिन यह पूरी तरह खत्म नहीं होता।

लैडरअप एसेट मैनेजर्स के मैनेजिंग डायरेक्टर राघवेंद्र नाथ कहते हैं, “ऐसा भी हो सकता है कि एक ही समय में कई फैक्टर्स कमजोर प्रदर्शन करें।”

एक्सपर्ट्स का यह भी कहना है कि जिन बैक-टेस्टेड नतीजों के आधार पर अक्सर इन फंड्स का प्रचार किया जाता है, वे भविष्य के प्रदर्शन की गारंटी नहीं होते। गुप्ता के मुताबिक, “वास्तविक रिटर्न बैक-टेस्टेड रिटर्न से काफी अलग हो सकते हैं।”

नाथ का कहना है कि कई निवेशकों के लिए इन रणनीतियों को समझना आसान नहीं होता। इसके अलावा, पोर्टफोलियो में बार-बार बदलाव (रीबैलेंसिंग) किए जाने के कारण इन फंड्स की लागत पारंपरिक इंडेक्स फंड्स की तुलना में ज्यादा हो सकती है।

Also Read: ICICI Pru MF ने लॉन्च किया नया फंड, ₹1,000 से स्मॉलकैप कंपनियों में निवेश का मौका 

सही रणनीति का चुनाव करें

किसी मल्टी-फैक्टर फंड का चयन करते समय केवल हालिया रिटर्न पर ध्यान देने के बजाय उसके प्रदर्शन का विभिन्न बाजार चक्रों (मार्केट साइकल्स) में आकलन करना चाहिए। मेहता का कहना है, “ऐसे फंड का चयन करें जिसकी रणनीति का वास्तविक बाजार परिस्थितियों में मजबूत ट्रैक रिकॉर्ड रहा हो।”

निवेशकों को अलग-अलग फैक्टर्स की प्रकृति को भी समझना चाहिए। गुप्ता के अनुसार, “क्वालिटी और लो-वोलैटिलिटी फैक्टर्स का उद्देश्य पोर्टफोलियो को ज्यादा स्थिर और मजबूत बनाना होता है। वहीं, मोमेंटम और अल्फा फैक्टर्स ज्यादा रिटर्न देने की क्षमता रखते हैं, लेकिन इनमें उतार-चढ़ाव भी ज्यादा हो सकता है।”

फंड में शामिल फैक्टर्स निवेशक की जोखिम उठाने की क्षमता (रिस्क प्रोफाइल) के अनुरूप होने चाहिए। इसके अलावा, किसी फंड का चयन करने से पहले उसके एक्सपेंस रेशियो और ट्रैक रिकॉर्ड की तुलना समान कैटेगरी के अन्य फंड्स से करनी चाहिए।

कोटक महिंद्रा एसेट मैनेजमेंट कंपनी के फंड मैनेजर सतीश डोंडापति कहते हैं, “कम लागत और बेंचमार्क इंडेक्स को ज्यादा सटीकता से ट्रैक करने की क्षमता लंबी अवधि के रिटर्न पर पॉजिटिव प्रभाव डाल सकती है।” नाथ उनकी बात को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं, “एक्सपेंस रेशियो बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि ज्यादा फीस धीरे-धीरे फैक्टर आधारित निवेश से मिलने वाले अतिरिक्त लाभ (फैक्टर प्रीमियम) को कम कर सकता है।”

क्या मल्टी-फैक्टर फंड आपके लिए सही हैं?

प्रतीक ओसवाल के अनुसार, मल्टी-फैक्टर फंड उन लॉन्ग टर्म निवेशकों के लिए बेहतर हो सकते हैं जो व्यवस्थित तरीके से निवेश करना चाहते हैं, सिद्ध निवेश फैक्टर्स का लाभ लेना चाहते हैं और कुछ समय तक कमजोर प्रदर्शन झेलने की क्षमता रखते हैं।

डोंडापति का कहना है, “ये फंड उन निवेशकों को भी आकर्षित कर सकते हैं जो नियम-आधारित (रूल्स-बेस्ड) निवेश रणनीति पसंद करते हैं और लंबी अवधि में बेहतर रिस्क-एडजस्टेड रिटर्न की संभावना तलाश रहे हैं।”

गुप्ता के मुताबिक, रूढ़िवादी (कंजर्वेटिव) निवेशक क्वालिटी और लो-वोलैटिलिटी फैक्टर्स वाले फंड चुन सकते हैं। वहीं, मध्यम से आक्रामक (मॉडरेट-टू-अग्रेसिव) निवेशक ज्यादा रिटर्न की संभावना और कुछ हद तक जोखिम नियंत्रण के लिए क्वालिटी, मोमेंटम या अल्फा के साथ लो-वोलैटिलिटी रणनीति पर विचार कर सकते हैं।

मेहता का मानना है कि सात साल से ज्यादा निवेश अवधि रखने वाले धैर्यवान निवेशक इन फंड्स पर विचार कर सकते हैं। हालांकि, नाथ के अनुसार, मल्टी-फैक्टर इंडेक्स फंड उन निवेशकों के लिए उपयुक्त नहीं हो सकते जो बेहद सरल और कम लागत वाला निवेश विकल्प चाहते हैं या जो लंबे समय तक कमजोर प्रदर्शन सहन नहीं कर सकते।

गुप्ता का सुझाव है कि निवेशक अपनी जोखिम उठाने की क्षमता के आधार पर कुल पोर्टफोलियो का 10 से 30 फीसदी हिस्सा फैक्टर-आधारित रणनीतियों में आवंटित करने पर विचार कर सकते हैं।

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First Published - June 9, 2026 | 7:20 PM IST

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