देश के प्रमुख शहरों में रिटेलरों के लिए किराए में 40 फीसदी तक की गिरावट आई है। ज्यादातर मॉल मालिक मंदी से निपटने के लिए वैकल्पिक रणनीतियां बना रहे हैं।
इस क्षेत्र के विशेषज्ञों का कहना है कि बड़े शहरों में अगले 6 महीनों में किराए में और गिरावट आने की उम्मीद है। आरपीजी गु्रप की रिटेल इकाई स्पेंसर्स रिटेल ने कहा है कि उसने दूसरे और तीसरे दर्जे के शहरों में किरायों में 30-40 फीसदी की गिरावट दर्ज की है।
प्रथम दर्जे के शहरों और महानगरों में किराए में 15-20 फीसदी की गिरावट आई है और भविष्य में इसमें और गिरावट आ सकती है जिसका असर अगले कुछ महीनों में दिखने की संभावना है।
आईटीसी की रिटेलिंग इकाई विल्स लाइफस्टाइल के मुख्य कार्याधिकारी अतुल चांद ने कहा, ‘खासकर महानगरों में किराए में संशोधन कर इसमें 20-30 फीसदी तक की कमी की जा रही है।’
विल्स लाइफस्टाइल के 50 आउटलेट हैं जिनमें से 24 मॉल के अंदर स्थित हैं। हैदराबाद, बेंगलुरु, चेन्नई और कुछ अन्य शहरों में 600 फार्मेसी स्टोर चलाने वाली मेडप्लस के संस्थापक एवं मुख्य कार्याधिकारी मधुकर गंगाडी ने कहा कि उनकी कंपनी किराए में कमी किए जाने के लिए बातचीत कर रही है।
जोन्स लांग लासेल मेघराज के उपाध्यक्ष एवं सहायक निदेशक (रिटेल) बप्पादित्य बसु ने कहा, ‘अगले 6 महीनों के दौरान महानगरों में रिटेल किराए में लगभग 30 फीसदी और दूसरे दर्जे के शहरों में लगभग 50 फीसदी की गिरावट आ सकती है।’
रिटेलरों की मांग और राजस्व में कमी के कारण भारतीय रिटेल परिदृश्य बदलाव के दौर से गुजर रहा है।
ज्यादातर रिटेलर किराए में कमी के लिए मॉल मालिकों से बातचीत कर रहे हैं या वे साझा राजस्व मॉडल की तरफ बढ़ रहे हैं। यह मॉडल मॉल मालिकों को रिटेलर के कारोबार बढ़ने पर ज्यादा कमाने का मौका देता है।
दूसरी तरफ, तय किराया लंबी अवधि के लिए नुकसानदायक हो सकता है, क्योंकि ऐसे समझौतों के तहत हर साल सिर्फ 10-15 फीसदी की रेंज में ही किराए में इजाफा होता है।
इनॉर्बिट मॉल के मुख्य कार्याधिकारी किशोर भटीजा ने कहा, ‘हमने अपने रिटेलरों के साथ रेवेन्यू-शेरिंग यानी साझा राजस्व समझौता किया है। यह समझौता रिटेलर की हर महीने की बिक्री के 10-12 फीसदी के लिए है।’ इनॉर्बिट मॉल के रहेजा कॉरपोरेशन से जुड़ा हुआ है।