ऑटोमोबाइल सेक्टर पर पड़ी मंदी की काली छाया अब कल-पुर्जा निर्माताओं का भी बेड़ा गर्क कर रही है।
लघु और छोटे उद्यमों की श्रेणी में आने वाले इन निर्माताओं में कई तो अपना धंधा तक समेटना पड़ रहा है। जमशेदपुर में कल पुर्जे बनाने वाली 600 इकाइयां तो बंद हो ही चुकी हैं।
साथ ही, मुल्क भर में फैली कम से कम ऐसी 2000 दूसरी इकाइयां भी बंद होने के कगार पर पहुंच चुकी हैं।
ये इकाइयां पूरी तरह से उन छोटे-मोटे ठेकों पर निर्भर रहते हैं, जो उन्हें तैयार कल-पुर्जों के निर्माताओं या फिर सीधे ऑटो कंपनियों से मिलते हैं। हाल ही में दोपहिया, कार और व्यवसायिक वाहन बनाने वाली लगभग सभी ऑटो कंपनियों ने अपने उत्पादन में कटौती करने के फैसला लिया था।
इसी वजह से तो इन इकाइयों की हालत इतनी पतली हो चुकी है। टाटा मोटर्स की जमशेदपुर स्थित व्यवसायिक वाहनों को बनाने वाला प्लांट पिछले महीने दो बार आठ-आठ दिनों के लिए बंद रहा।
इसका सबसे ज्यादा असर पड़ा यहां के छोटे-मोटे कल-पुर्जे बनाने वालों पर। यह प्लांट जिस इलाके में है. उसके चारों ओर कल-पुर्जे बनाने वाली फैक्टरियां हैं।
टाटा मोटर्स की तरफ से मांग कम हो जाने की वजह से करीब 600 निर्माताओं को अपनी फैक्टरियों पर ताला जड़ना पड़ा है।
दरअसल, पहले टाटा मोटर्स के इस प्लांट में पहले करीब 500 व्यवसायिक वाहनों का हर रोज उत्पादन होता था। लेकिन अब यहां हर रोज सिर्फ 125-150 भारी वाहन ही बनाए जाते हैं।
इस बारे में टाटा मोटर्स की प्रवक्ता ने कहा, ‘हम आपको प्रतिदिन के उत्पादन के बारे में तो नहीं बता सकते। लेकिन हां जैसा हम पहले ही कह चुके हैं कि हम अब मांग के हिसाब से ही उत्पादन कर रहे हैं। हमने इसलिए प्लांट को कुछ दिनों के लिए बंद भी रखा था।
हम जमशेदपुर और उसके आसपास के 157 निर्माताओं से ही कल-पुर्जे लेते हैं।’ फेडरेशन ऑफ इंडियन माइक्रो, स्मॉल ऐंड मीडिया एंटरप्राइजेज (एफआईएसएमई) के महासचिव अनिल भारद्वाज का कहना है कि, ‘इस बार तो ऑर्डर काफी कम हो चुका है।
इन निर्माताओं को तो अपने बकाये पैसे भी नहीं मिल पा रहे हैं। उनके पास अपना खर्चा निकालने लायक पैसे भी नहीं हैं। देश भर में ऐसी करीब 2000 इकाइयां बस बंद होने की कगार पर पहुंच चुकी हैं।’ मुल्क में ज्यादातर कल-पुर्जे निर्माता पुणे, चेन्नई, गुड़गांव और उत्तराखंड जैसे इलाकों में स्थित हैं।