एफसीआई पर फिर कर्ज बढऩे का जोखिम

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 12, 2022 | 8:46 AM IST

सरकार ने वित्त वर्ष 2021 के व्यय का करीब 10 फीसदी हिस्सा भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) को आवंटित करने का फैसला किया है, जिससे निगम का ज्यादातर मौजूदा कर्ज खत्म हो सकता है। लेकिन अधिकारियों और विशेषज्ञों का कहना है कि अगर आने वाले समय में बजट आवंटन के जरिये खाद्य सब्सिडी के लिए पर्याप्त प्रावधान नहीं किया गया या आर्थिक लागत कम करने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए तो यह सरकारी खजाने पर फिर तगड़ा बोझ बन सकता है।
बजट दस्तावेजों से पता चलता है कि वित्त वर्ष 2021 में खाद्य सब्सिडी के लिए करीब 4.22 लाख करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है। इसमें एफसीआई का हिस्सा करीब 3.44 लाख करोड़ रुपये है। शेष पैसा राज्यों को विकेंद्रित खरीद के लिए भुगतान में इस्तेमाल किया जाएगा। वित्त वर्ष 2020-21 में कुल खर्च 34,50,305 करोड़ रुपये अनुमानित है। इस तरह केंद्र सरकार के कुल व्यय में एफसीआई के लिए आवंटित राशि करीब 10 फीसदी है। इस 3.44 लाख करोड़ ररुपये की राशि में से करीब 2.18 लाख करोड़ रुपये राष्ट्रीय लघु बचत कोष (एनएसएसएफ) के बकाया ऋणों को चुकाने में खर्च होंगे। इसका मतलब है कि एफसीआई पर एनएसएसएफ का बकाया चालू वित्त वर्ष के अंत में करीब 1.26 लाख करोड़ रुपये रहेगा, जिसके एक अहम हिस्से का भुगतान आगामी वित्त वर्ष में होगा।
हालांकि सूत्रों ने कहा कि अगर केंद्र हर साल एफसीआई की सब्सिडी जरूरत पूरी करने के लिए करीब 1,50,000 करोड़ रुपये और राज्यों की विकेंद्रित खरीद के लिए अतिरिक्त 30,000 से 40,000 करोड़ रुपये नहीं मुहैया कराता रहेगा और बीते कुछ वर्षों की तरह बजट से इतर उधारी से दूरी नहीं बनाएगा तो बकाया फिर बढ़ जाएगा और अगले कुछ वर्षों में उस स्तर पर पहुंच जाएगा, जिसे संभालना मुश्किल होगा। एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, ‘आम तौर पर एफसीआई को किसी वित्त वर्ष में बजट जरूरत का करीब 95 फीसदी हिस्सा मिलता था और शेष लेखों के ऑडिट के बाद हस्तांतरित किया जाता था। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से एक साल में बजटीय सहायता का केवल 50 से 55 फीसदी हिस्सा ही दिया गया, इसलिए हमें शेष रकम राष्ट्रीय लघु बचत कोष से उधार लेनी पड़ी।’
उन्होंने कहा कि इससे एफसीआई पर ब्याज का बोझ बढ़ गया। यह एनएसएसएफ ऋणों से पहले करीब 5,000 करोड़ रुपये प्रति वर्ष था, जो पिछले कुछ वर्षों में बढ़कर करीब 30,000 करोड़ रुपये हो गया है।
सब्सिडी का बोझ बढऩे की मुख्य वजह यह है कि छह करोड़ टन अनाज अत्यधिक सब्सिडीयुक्त दरों पर वितरित किया जाता है। इसमें चावल की दर 3 रुपये प्रति किलोग्राम, गेहूं की दो रुपये प्रति किलोग्राम और मोटे अनाज की एक रुपये प्रति किलोग्राम होती है।  
अधिकारी ने कहा, ‘एक तरीका यह हो सकता है कि लाभार्थियों को गेहूं और चावल देने की दर (सीआईपी) में एक रुपये प्रति किलोग्राम की बढ़ोतरी कर दी जाए। लेकिन यह राजनीतिक से जुड़ा फैसला है, जो कोई भी सरकार नहीं लेना चाहती।’
उन्होंने कहा कि अनाज के सीआईपी में एक रुपये की बढ़ोतरी से खाद्य सब्सिडी हर साल करीब 6,000 करोड़ रुपये घट सकती है। दरअसल संसद में पेश की गई 2020-21 की आर्थिक समीक्षा में खाद्य सब्सिडी कम करने के लिए अनाज के सीआईपी में बढ़ोतरी की बात कही गई थी। वर्ष 2020-21 में चावल की आर्थिक लागत 37.26 रुपये प्रति किलोग्राम जबकि वितरण कीमत 3 रुपये प्रति किलोग्राम थी। इस तरह हर एक किलोग्राम चावल पर 34.26 रुपये की सब्सिडी दी गई। वहीं गेहूं की आर्थिक लागत 26.83 रुपये प्रति किलोग्राम थी, जबकि इसे राशन की दुकानों के जरिये दो रुपये प्रति किलोग्राम की दर पर वितरित किया गया। इससे सरकार को 24.83 रुपये प्रति किलोग्राम सब्सिडी वहन करनी पड़ी।

First Published : February 4, 2021 | 11:40 PM IST