आर्थिक मंदी की वजह से दुनिया भर की कंपनियों में छंटनी का दौर चल रहा है। अब भारत भी इस छंटनी की परछाई से अछूता नहीं है। रोजाना लोग अपनी नौकरियों से हाथ धो रहे हैं। आने वाले महीने भी रोजगार के लिहाज से अच्छे नहीं हैं।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कंपनियों के लिए कर्मचारियों की नियुक्ति करने वाली कंपनी मैनपावर इंक की ओर से जारी सर्वेक्षण के मुताबिक अगली तिमाही के दौरान भारत में कंपनियां सबसे कम रोजगार देंगी।
पिछले साढ़े तीन सालों के दौरान भर्ती होने वाले कर्मचारियों की तुलना में 2009 की जनवरी-मार्च तिमाही में भर्तियों की तादाद सबसे कम रहेगी।
सर्वेक्षण में यह बात भी सामने आई है कि वैश्विक मंदी ने एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था को अपने शिकंजे में ले लिया है।
मैनपावर इंक ने सात क्षेत्रों में करीब 3,597 भारतीय कंपनियों में यह सर्वेक्षण किया और पाया कि जनवरी-मार्च के बीच की अवधि में रोजगार की संभावनाओं में 27 फीसदी की गिरावट आई है और यह दर घटकर 19 फीसदी की समायोजित दर पर आ गई है।
इस सर्वेक्षण से उन कंपनियों के बीच के अंतर का पता लगता है जो नए लोगों की नियुक्तियां करनी चाहती हैं और जो मंदी के कारण छंटनी करने की योजना बना रही हैं। जिन 33 देशों में यह सर्वेक्षण कराया गया उनमें भारत का स्थान पेरु (24 फीसदी) के बाद दूसरा था।
मैनपावर ने कहा कि वर्ष 2005 की तीसरी तिमाही में इस सर्वेक्षण की शुरुआत हुई थी तब के मुकाबले अभी भारत की स्थिति रोजगार मुहैया कराने के मामले में काफी खराब हो गई है।
बाजार की खस्ता हालत के कारण आलम यह है कि कोई भी कंपनी भर्ती करने के मूड में नजर नहीं आ रही है।
वैश्विक मंदी के बीच भारत की विकास दर में भी गिरावट आने की आशंका जताई जा रही है। माना जा रहा है कि मार्च 2009 तक विकास दर फिसलकर 7 फीसदी तक आ सकती है।
जबकि पिछले चार साल में भारतीय अर्थव्यवस्था 9 फीसदी की दर से विकास कर रही थी। मंदी का औद्योगिक विकास पर भी बहुत बुरा असर पडा है,
जबकि अमेरिका और यूरोपीय बाजारों के औंधे मुंह गिरने से निर्यात सेवा क्षेत्र भी गंभीर रूप से प्रभावित हुआ है। जहां तक नई भर्तियों की बात है तो सबसे ज्यादा बुरी स्थिति परिवहन की है जिसके शेयरों में जबरदस्त गिरावट आई है। इन क्षेत्रों में भर्ती की दर 30 फीसदी से घटकर महज 12 फीसदी के स्तर पर आ गई है।