मंदी की वजह से आईटी और बीपीओ कंपनियां भी लागत में कटौती करने के हर संभव उपाय कर रही है।
इसके तहत कैब की सुविधा में भी कमी की गई है, जिससे देशभर में कॉल सेंटर कैब ऑनरों के कारोबार में करीब 5-40 फीसदी की गिरावट आई है।
नई दिल्ली के प्रमुख ट्रांसपोर्ट सॉल्यूशंस प्रदाता तरुण जैन ने कहा कि उनकी कंपनी 7 कर्मचरियों के लिए एक कैब का इस्तेमाल करती थी, लेकिन अब उसी कैब में 9 कर्मचारियों को लाया-ले जाया जा रहा है। ऐसी ही स्थिति अन्य जगहों पर भी है, जिससे कैब की मांग में पिछले कुछ महीनों से भारी गिरावट आई है।
पिछले एक साल के दौरान कैब कारोबार में करीब 30-35 फीसदी की गिरावट आई है। जैन का कहना है कि कंपनियों ने एक ओर जहां तमाम तरह के मानदंड कायम कर दिए हैं, वहीं रूटों की संख्या भी बढ़ा दी है। बैंक भी नए वाहनों के लिए कर्ज देने में उदारता नहीं बरत रही है। वाहनों का बीमा प्रीमियम भी बढ़ गया है। ऐसे में कैब ऑनरों को नुकसान उठाना पड़ रहा है।
पुणे की स्थिति भी इससे अलग नहीं है। पिछले दो माह में यहां के कैब कारोबार में करीब 40 फीसदी की कमी आई है। पुणे और पिंपरी-छिंदवाड़ा इलाके में 45,000 बीपीओ कर्मचारियों के लिए 7,000 कैब चलते थे। लेकिन अब कैब की संख्या घटकर करीब 4000 रह गई है। कई बीपीओ कंपनियों ने कैब की संख्या कम करके शटल सेवा या फिर मिनी बस सेवा को तवज्जो दे रही हैं।
महाराष्ट्र कॉल सेंटर ड्राइवर्स और ऑनर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष नाना श्रीरसागर ने बिजनेस स्टैंडर्ड को बताया कि बीपीओ कंपनियों की ओर से लागत कम करने की वजह से कई कैबों को सड़कों से हटाना पड़ा है।
उन्होंने बताया कि हमारे संगठन में 7,000 कैब और करीब 350 बसें 150 बीपीओ और आईटी कंपनियों को पिक-ऐंड ड्रॉप की सुविधा प्रदान करती थी, लेकिन अब वाहनों की संख्या घटाकर 4,000 कर दी गई है। भविष्य में इसकी संख्या में और कमी आने की आशंका है।
दूसरी ओर, आईटी और बीपीओ कंपनियां कैब सुविधा को पूरी तरह से खत्म करने के मूड नहीं है, क्योंकि नाइट शिफ्ट में काम होने की वजह से कैब की जरूरत पड़ती है। हालांकि कुछ कंपनियां दिन के शिफ्ट के लिए कैब की जगह बस या शटल सेवा को तवज्जो दे रही हैं।
गौरतलब है कि एक कैब पर कंपनी को प्रतिमाह औसतन 30,00 से 40,000 रुपये खर्च करने पड़ते हैं। बस सेवा के लिए यह खर्च 1 लाख से 1 लाख 10 हजार रुपये तक पहुंच जाती है। लेकिन 60 कैब जितने कर्मचारियों को लाती-ले जाती है, उतने कर्मचारियों के लिए 5 बसें ही पर्याप्त हैं। ऐसे में कंपनी प्रतिमाह करीब 18,50,000 रुपये की बचत कर सकती है।
बेंगलुरु स्थित इन्फोसिस बीपीओ के सीईओ अमिताभ चौधरी का कहना है कि बीपीओ कंपनियों की आय का बड़ा हिस्सा ट्रांसपोर्ट पर खर्च होता है। यही वजह है कि लागत कम करने के लिए कंपनियां इस तरह के कदम उठा रही हैं।
इन्फोसिस अपने कर्मचारियों के लिए पहले ही बस सेवा की शुरुआत कर चुकी है। चौधरी का कहना है कि यह लागत कम करने के लिए ही नहीं, बल्कि कर्मचारियों की सुरक्षा के लिए भी बस सेवा अच्छी है। हां, नाइट शिफ्ट में कैब की सुविधा जरूर दी जा रही है।
पुणे स्थित बीपीओ कंपनी डब्ल्यूएनएस के पास करीब 5,000 कर्मचारी हैं। लेकिन अब कंपनी कैब की जगह बस सेवा की शुरुआत की है। केपीआईटी कम्युनिस इन्फोसिस्टम्स ने कैब और बस, दोनों सेवाओं में कटौती की है।
कंपनी के एक अधिकारी का कहना है कि मंदी के इस दौर में सभी कर्मचारियों को घर तक पिक-ड्रॉप की सुविधा नहीं दी सकता है। इसलिए एक तय रूट पर कंपनी की ओर से बस सेवा चलाई जा रही है। दिल्ली-एनसीआर में यूनाइटेड सर्विसेज कॉरपोरेशन के उपेंद्र सिंह आनंद का कहना है कि पिछले एक साल में कैब कारोबार में करीब 5-10 फीसदी की कमी आई है।
(साथ में बिभु रंजन मिश्र)