मंदी की मार से घिसा जूते-चप्पलों का निर्यात

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 10, 2022 | 12:52 AM IST

आगरा की फुटवियर इकाइयां वित्तीय संकट की आंच से तप रही हैं। इन लघु एवं मझोली कंपनियों को यूरोप और अमेरिका से मिलने वाले ठेकों में पिछले साल लगभग 30 फीसदी की कमी आई।
निर्यात ठेकों के रद्द हो जाने से यह उद्योग नुकसान उठा रहा है। निर्यात ठेकों को बरकरार रखे जाने और परिचालन खर्च में कटौती जैसे सभी उपाय विफल रहे हैं। इससे बाध्य होकर ये इकाइयां अब घरेलू बाजार पर ध्यान केंद्रित करने को विवश हो गई हैं।
आगरा फुटवियर मैन्युफैक्चरर्स ऐंड एक्सपोट्र्स चैम्बर के अधिकारियों ने बताया कि कुछ लघु इकाइयां घरेलू बाजार में अपनी बिक्री बढ़ाने के लिए मैक्स और रिलायंस जैसे रिटेल चेन स्टोरों के साथ करार कर चुकी हैं। अन्य कई कंपनियां स्थानीय डिपार्टमेंटल स्टोरों के जरिये घरेलू रिटेल बाजार में अपना तैयार माल खपाने पर ध्यान दे रही हैं।
काउंसिल फॉर लेदर एक्सपोट्र्स के संयोजक पूरन डावर कहते हैं, ‘फुटवियर निर्यातक फुटवियर के लिए अंतरराष्ट्रीय मांग में गिरावट के कारण निश्चित रूप से बुरे वक्त का सामना कर रहे हैं, लेकिन यह उद्योग पुनर्जीवित हो सकता है। इस उद्योग को घरेलू बाजार पर ध्यान केंद्रित करना होगा।’
आगरा की लगभग 75 फुटवियर निर्यात इकाइयां हर साल 1700 करोड़ रुपये से अधिक का राजस्व अर्जित करती हैं। यह देश के सालाना फुटवियर निर्यात का तकरीबन 60 फीसदी है। डावर ने कहा कि मार्जिन काफी घट गया है और बड़े आयातक खरीद का फैसला लेने में विलंब कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि इस वजह से आगरा क किसी भी फुटवियर निर्यात इकाई को 100 प्रतिशत निर्यात-आधारित इकाई के तौर पर प्रमाणित नहीं किया गया है। घरेलू बाजार में प्रवेश एक लाभदायक विकल्प है।
उन्होंने कहा कि लघु एवं मझोली फुटवियर इकाइयों के सहायक आपूर्तिकर्ताओं ने अपने गैर बिके माल को स्थानीय बाजार में खपाना शुरू कर दिया है और श्रेष्ठ गुणवत्ता के कारण स्थानीय बाजार से इन इकाइयों को अच्छी प्रतिक्रिया मिल रही है।
इस सकारात्मक प्रतिक्रिया ने कई बड़ी निर्यात इकाइयों को घरेलू बाजार में और अधिक अवसर तलाशने के लिए प्रेरित किया है। निर्यातकों की घरेलू बाजार में दस्तक स्थानीय कुटीर उद्योगों के लिए मुसीबत बन गई है।
स्थानीय कुटीर इकाइयों को अपना कारोबार निर्यात इकाइयों के हाथों में चले जाने का भय सता रहा है। ये कुटीर इकाइयां इसलिए भी अधिक भयभीत हो रही हैं, क्योंकि उनकी तुलना में निर्यात-आधारित फुटवियर इकाइयों की तकनीकी ज्यादा श्रेष्ठ है।
एक कॉटेज-स्केल यूनिट यानी कुटीर इकाई के मालिक जावेद आलम का कहना है कि निर्यात-आधारित इकाइयों के पास घरेलू कुटीर इकाइयों की तुलना में बेहतर नेटवर्क और फुटवियर एक्सेसरीज है। यह बेहतर नेटवर्क निर्यात इकाइयों को मूल्य एवं गुणवत्ता के लिहाज से घरेलू इकाइयों से आगे रखता है।
आलम की इकाई अब महज 10 श्रमिकों को रोजी-रोटी मुहैया कराती है। 6 महीने पहले इस इकाई में लगभग 30 लोग काम करते थे। आलम ने दावा किया कि अब तक सिर्फ बड़ी निर्यात इकाइयां ही घरेलू बाजार पर ध्यान देती थीं। लेकिन अगर मध्यम आकार की निर्यात इकाइयां भी बड़ी इकाइयों की राह पर चलती हैं तो घरेलू कुटीर एवं लघु इकाइयां बंदी के कगार पर पहुंच सकती हैं।
डिस्ट्रिक्ट इंडस्ट्रियल सेंटर, आगरा के महा प्रबंधक डीआर गौतम जोर देकर कहते हैं, ‘सरकार ‘यूनीफाइड लेदर डेवलपमेंट स्कीम’ के तहत फुटवियर इकाइयों के तकनीकी उन्नयन के लिए वित्तीय मदद मुहैया कराती है। लेकिन अब यह मदद मशीनरी आयात पर 20-30 फीसदी की सब्सिडी तक ही सीमित रह गई है।’
गौतम ने कहा कि भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक (सिडबी) द्वारा चलाए जा रहे जागरुकता अभियानों के बावजूद स्थानीय इकाइयों ने इस स्कीम का फायदा उठाने में दिलचस्पी नहीं दिखाई है। डिस्ट्रिक्ट इंडस्ट्रियल सेंटर इस स्कीम को स्थानीय इकाइयों के बीच फिर से पेश करने की योजना बना रहा है।

First Published : February 12, 2009 | 10:36 PM IST