शहरों में पुरुषों की नौकरियां गंवाने की दर हुई तेज

मार्च 2020 में समाप्त तिमाही की तुलना मार्च 2021 तिमाही से करने पर पता चलता है कि भारत ने कोविड-19 महामारी का सामना किस तरह किया है? मार्च 2020 तिमाही इस महामारी से पहले की स्थिति को बयां करती है जबकि मार्च 2021 की तिमाही इस आपदा के एक साल बाद की स्थिति बताती है। तिमाही के आंकड़ों का इस्तेमाल करने पर मासिक आंकड़ों में सुनाई देने वाला शोर थम जाता है और सालाना आधार पर की गई तुलना किसी तरह के मौसमी असर को भी खत्म कर देती है।

 
कोविड-पूर्व तिमाही के तौर पर मार्च 2020 तिमाही का इस्तेमाल करने में बस एक समस्या है कि वह पूरी तिमाही कोविड के असर से मुक्त नहीं थी। फरवरी 2020 के अंतिम दिनों से कोरोनावायरस के संक्रमण बढऩे लगे थे और 24 मार्च, 2020 को तो देश भर में लॉकडाउन ही घोषित कर दिया गया था। जनवरी 2020 में करीब 41 करोड़ लोगों को रोजगार मिले हुए थे। फरवरी में यह आंकड़ा घटकर 40.6 करोड़ पर आ गया था और मार्च 2020 में तो यह संख्या और भी गिरकर 39.6 करोड़ पर आ गई। इस तरह मार्च 2020 तिमाही को कोविड से पहले की तिमाही बताना कोविड-पूर्व हालात को कमतर करना ही है। इसके बावजूद यह कहा जा सकता है कि मार्च 2020 की तिमाही में 40.6 करोड़ लोग रोजगार में लगे हुए थे। 
 
मार्च 2021 में समाप्त तिमाही में रोजगार आंकड़ा 39.97 करोड़ रहा। इसका मतलब है कि कोविड महामारी के एक साल बाद रोजगार में लगे लोगों की संख्या में 63 लाख की कमी आ गई। हमें यह ध्यान रखना होगा कि यह आंकड़ा महामारी के साल में नौकरियां गंवाने वालों का नहीं है। वह संख्या तो इससे बहुत ज्यादा है। दरअसल महामारी में चली गई बहुतेरी नौकरियां बाद में वापस भी आ गईं। हमारी दिलचस्पी कोविड के आघात से पहले और बाद की स्थिति में है। इससे पता चलता है कि सभी नौकरियां वापस नहीं आईं। शुद्ध गिरावट 63 लाख रोजगार की है जो कुल रोजगार में 1.5 फीसदी का नुकसान दर्शाता है।
 
पहली लहर आने के ठीक एक साल बाद कोविड महामारी की दूसरी लहर ने भारत को चपेट में लिया। इस दौरान 1.33 करोड़ अतिरिक्त नौकरियां चली गईं। परिणाम यह हुआ कि मार्च 2021 तिमाही में 39.97 करोड़ पर रहा रोजगार आंकड़ा जून में समाप्त तिमाही में 38.64 करोड़ पर आ गया। इस तरह कोविड से पहले की मार्च 2020 तिमाही की तुलना में आज भारत में 1.96 करोड़ नौकरियां कम हो गई हैं। यह बहुत बड़ा आंकड़ा है। 
 
यह ठीक नहीं है कि पहली लहर में गई 63 लाख नौकरियों की तुलना दूसरी लहर में गंवाई गई 1.33 करोड़ नौकरियों से की जाए। अनुभव हमें बताता है कि पहले जा चुकी कई नौकरियां बाद में वापस भी आ गईं। जून 2020 में समाप्त तिमाही में उपलब्ध रोजगार मार्च 2020 तिमाही की तुलना में 7.8 करोड़ तक कम थे। लेकिन यह बहुत बड़ी गिरावट भी बाद में दुरुस्त हो गई और मार्च 2021 तिमाही में सिर्फ 63 लाख रोजगार ही एक साल पहले की तुलना में कम रह गए थे। इसी तरह दूसरी लहर की पहली तिमाही में कम हुए 1.33 करोड़ रोजगार भी आने वाली तिमाहियों में कुछ हद तक वापस आ जाएंगे। 
 
भले ही चले गए अधिकांश रोजगार वापस आ जाएंगे लेकिन मौजूदा क्षति बहुत ज्यादा है और इसकी वजह से पीडि़त हुए परिवारों पर इसके असर को सिर्फ आंकड़ों से नहीं समझा जा सकता है। फिर से नौकरियां वापस पाने वाले या वैकल्पिक रोजगार में लगे तमाम लोगों को कम पारिश्रमिक पर काम करना पड़ा है। इसकी वजह से परिवारों की आमदनी रोजगार में आई गिरावट की तुलना में कहीं ज्यादा गिरी है।
 
दूसरी लहर में हुई रोजगार क्षति का लैंगिक वितरण एक हद तक अशुभ है। पहली बात, करीब 90 फीसदी नौकरियां पुरुषों के पास हैं। महिला कर्मचारियों की तादाद सिर्फ 10 फीसदी है लेकिन कोविड की चपेट में आने के एक साल बाद नौकरियां गंवाने के मामले में उनका अनुपात 23 फीसदी है। मार्च 2021 की तिमाही में उपलब्ध कुल 39.97 करोड़ नौकरियों में से सिर्फ 4.18 करोड़ ही महिलाओं के पास थीं। लेकिन उसके पहले के एक साल में कम हुए 63 लाख रोजगार में महिलाओं की संख्या 15 लाख रही।
 
कोविड-19 महामारी की पहली लहर में बड़े पैमाने पर हुई रोजगार क्षति में एक बड़ा हिस्सा शहरी महिलाओं का था। कुल रोजगार में शहरी महिलाओं की हिस्सेदारी करीब तीन फीसदी होने के बावजूद कुल रोजगार क्षति में उनका अनुपात 39 फीसदी रहा। उस दौरान चली गई 63 लाख नौकरियों में से शहरी महिलाओं की संख्या 24 लाख थी। हालांकि दूसरी लहर में ऐसी स्थिति नहीं रही है। इस दौरान रोजगार गंवाने के मामले में शहरी महिलाएं सबसे कम प्रभावित रही हैं। दूसरी लहर में पुरुषों को तुलनात्मक रूप से ज्यादा संख्या में रोजगार गंवाना पड़ा है। भारत में कुल रोजगार में लगे लोगों में शहरी पुरुषों की हिस्सेदारी करीब 28 फीसदी है। मार्च 2021 तक हुई रोजगार क्षति में शहरी पुरुषों का अनुपात 26 फीसदी ही था। लेकिन जून 2021 की तिमाही में कुल रोजगार क्षति में उनकी हिस्सेदारी बढ़कर 30 फीसदी हो गई। 
 
शहरी पुरुषों की नौकरियां बेहतर गुणवत्ता वाली होती हैं और उनका रोजगार अधिक संख्या में जाने से आमदनी में कहीं ज्यादा गिरावट देखने को मिल सकती है। महिलाएं अक्सर अपने परिवार की दूसरी कमाऊ सदस्य होती हैं। ऐसे में महिलाओं की नौकरी जाने का मतलब आय में कमी तो होता है लेकिन पूरी आमदनी बंद नहीं होती है। इसके उलट अगर पुरुष की नौकरी चली जाती है तो अक्सर उस परिवार की आजीविका ही खतरे में पड़ जाती है। इस तरह शहरी पुरुषों की नौकरियां ज्यादा अनुपात में जाना चिंताजनक है। आमदनी पर इसका असर तभी पता चलेगा जब नवंबर 2021 में तिमाही के लिए आय के आंकड़े जारी किए जाएंगे।