मोदी मंत्रिमंडल में फेरबदल के असली विजेता

हाल में हुए केंद्रीय मंत्रिमंडल के पुनर्गठन में निजीकरण और सहकारिता क्षेत्र पर खास ध्यान दिया गया है। इन व्यापक बदलावों का विश्लेषण कर रहे हैं ए के भट्टाचार्य 

 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सात वर्षों के कार्यकाल में हुए अब तक के सबसे बड़े मंत्रिमंडल फेरबदल को करीब एक हफ्ता हो चुका है। इस दौरान एक ही झटके में मंत्रिपरिषद के आकार में 45 फीसदी की वृद्धि करना लगभग अभूतपूर्व है। अब प्रधानमंत्री के अलावा केंद्रीय मंत्रिपरिषद में 77 सदस्य हो गए हैं जबकि पहले यह संख्या 53 थी। विस्तार से पहले करीब दर्जन भर मंत्रियों को हटाया गया ताकि नए मंत्रियों को शामिल करने और करीब आधे दर्जन पुराने मंत्रियों को तरक्की के लिए जगह बनाई जा सके। इतने बड़े फेरबदल के बावजूद मोदी के पास मंत्रिपरिषद में तीन और मंत्रियों को शामिल करने की गुंजाइश बची हुई है। नियमों के मुताबिक लोकसभा की कुल सदस्य संख्या के 15 फीसदी यानी 81 मंत्री बनाए जा सकते हैं। 
 
अभी तक हमारा ज्यादा ध्यान मंत्रिपरिषद से हटाए गए मंत्रियों पर रहा है। हर्षवद्र्धन (स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण), रविशंकर प्रसाद (कानून एवं न्याय, संचार, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी), प्रकाश जावडेकर (सूचना एवं प्रसारण, पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन), रमेश पोखरियाल निशंक (शिक्षा) और संतोष कुमार गंगवार (श्रम एवं रोजगार) को हटाने के पीछे उनका प्रदर्शन ठीक न होने या उत्पन्न चुनौतियों से निपटने में नाकाम रहने को जिम्मेदार बताया गया है। 
 
इस लिहाज से उनके मंत्रालयों का दायित्व संभालने वाले नए मंत्रियों को उम्मीदों के भारी बोझ के साथ नई पारी शुरू करनी है। वे अंदाजा लगा रहे होंगे कि उनके पूर्ववर्ती मंत्री आखिर कहां पर और किस तरह नाकाम हुए? इसी के साथ यह सवाल भी उनके जेहन में आ रहा होगा कि क्या पिछले मंत्रियों की नाकामी को सरकार में बैठे दूसरे लोगों के साथ भी साझा नहीं करना चाहिए था? मामला कोविड-19 महामारी के प्रबंधन, टीकों को मंजूरी देने, सोशल मीडिया कंपनियों के बारे में नए सूचना प्रौद्योगिकी नियमों का क्रियान्वयन, कोविड के बाद की दुनिया में उपज रहे श्रमिक असंतोष से निपटने या मीडिया के साथ सरकार के संवाद की देखरेख का हो, इस बात की पूरी आशंका है कि नए मंत्रियों को अपने पूर्ववर्तियों की नाकामियां दूर करने के लिए रणनीति बनाने में मशक्क्त करनी पड़ेगी। इसकी वजह यह है कि पूर्ववर्ती मंत्रियों को जिन हालात में काम करना पड़ रहा था, उसकी जमीनी हकीकत में कोई बदलाव नहीं आया है और उनके पास उपलब्ध नीतिगत साधन भी न तो बदले हैं और न ही बेहतर हुए हैं।
 
आर्थिक मंत्रालयों का प्रभार संभालने वाले मंत्रियों का काम भी कम चुनौतीपूर्ण नहीं होगा। पूर्व आईएएस अधिकारी अश्विनी वैष्णव नए रेल मंत्री बने हैं। अहमदाबाद से मुंबई तक बुलेट ट्रेन की परियोजना जल्द पूरा करना, मालवहन गलियारे का निर्माण पूरा करना, नए रेल मार्गों का निजीकरण और रेलवे स्टेशनों का आधुनिकीकरण आसान काम नहीं होने वाला है। याद रखें कि वैष्णव के पास सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय भी होने से उन्हें ट्विटर के साथ जारी तनातनी से निपटने की बड़ी जिम्मेदारी भी निभानी है। इसके अलावा संचार मंत्री भी होने से उन्हें 5जी स्पेक्ट्रम से जुड़ी नीतिगत चुनौतियों से भी निपटना होगा। 
 
फिर हरदीप सिंह पुरी हैं जिनके नागरिक उड्डïयन मंत्री के तौर पर दो साल के कार्यकाल में एयर इंडिया के निजीकरण की दिशा में प्रगति सुस्त ही रही। बहरहाल अब उन्हें पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय का कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण दायित्व सौंपा गया है। कच्चे तेल की अंतरराष्टï्रीय कीमतें बीते दो साल में करीब 14 फीसदी बढ़ चुकी हैं और देश के कई शहरों में पेट्रोल एवं डीजल के खुदरा भाव 100 रुपये प्रति लीटर से भी ऊपर जा चुके हैं। बढ़ी कीमतों के असर को कम करने के लिए नए तेल मंत्री बहुत कुछ नहीं कर सकते हैं, वित्त मंत्री से अप्रैल-मई 2020 में की गई उत्पाद शुल्क वृद्धि को वापस लेने की मांग करने के सिवाय। उनके सामने दीर्घकालिक चुनौती घरेलू स्तर पर तेल उत्पादन बढ़ाने की होगी जो गत सात वर्षों में लगातार कम होता गया है। वर्ष 2014-15 में घरेलू तेल उत्पादन 3.59 करोड़ टन था लेकिन 2020-21 में यह घटकर 2.91 करोड़ टन रह गया। पुरी अपनी तरफ से नागरिक उड्डयन मंत्रालय का दायित्व संभालने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया को शुभकामनाएं दे सकते हैं जिन्हें एयर इंडिया के निजीकरण से जुड़े उलझे मुद्दों का हल निकालना है। वैसे इतना तो तय है कि खुद पुरी के सामने तेल एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय में विकट चुनौतियां होंगी। 
 
पीयूष गोयल और धर्मेंद्र प्रधान दोनों ने ही अपने प्रभार में काट-छांट होते हुए देखा है। अब गोयल के पास उद्योग एवं वाणिज्य और कपड़ा के अलावा उपभोक्ताा मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण का प्रभार है। इसी तरह प्रधान से भी तेल मंत्रालय छिन गया है लेकिन अब उनके पास मानव संसाधन विकास जैसा मंत्रालय है जिसमें शिक्षा, कौशल विकास और उद्यमिता भी शामिल हैं। इन दोनों मंत्रियों के विभाग जिस तरह से पुनर्गठित किए गए हैं उसमें खासा तर्क नजर आता है। नए श्रम मंत्री बनाए गए भूपेंद्र यादव के भी सामने चुनौतियां होंगी। श्रम कानूनों में किए गए बदलावों का विरोध कर रहे श्रमिक संगठनों को मनाने में यादव को अपना पूरा कौशल दिखाना होगा ताकि नए श्रम कानूनों को तेजी से लागू किया जा सके।
 
आर्थिक एवं सामाजिक-आर्थिक नीति के नजरिये से देखें तो मोदी मंत्रिमंडल के व्यापक फेरबदल का सबसे बड़ा असर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और गृह मंत्री अमित शाह के विभाग पर पड़ेगा। कुल 30 कैबिनेट मंत्रियों में से सिर्फ छह के विभागों में कोई बदलाव नहीं हुआ है- राजनाथ सिंह (रक्षा), एस जयशंकर (विदेश), अर्जुन मुंडा (आदिवासी मामले), गजेंद्र शेखावत (जल शक्ति), प्रह्लाद जोशी (संसदीय कार्य) और मुख्तार अब्बास नकवी (अल्पसंख्यक मामले)। बाकी सभी कैबिनेट मंत्रियों के विभाग या तो बदले गए या फिर उनका बोझ कम किया गया है। 
 
सिर्फ दो कैबिनेट मंत्री ही ऐसे हैं जिन्हें ज्यादा जिम्मेदारियां दी गई हैं। अमित शाह को नवगठित सहकारिता मंत्रालय दिया गया है। साफ है कि मोदी सरकार ने सहकारिता क्षेत्र के विकास पर अपनी ऊर्जा लगाने का फैसला कर लिया है। सहकारिता क्षेत्र का भारत के 35 फीसदी चीनी उत्पादन और 10 फीसदी दुग्ध उत्पादन में अहम योगदान है और वित्तीय क्षेत्र में भी उसकी मौजूदगी तेजी से बढ़ रही है। नियमन एवं वित्तीय आवंटन के अहम मुद्दों को जल्द से जल्द निपटाना होगा। राजनीतिक रूप से भी देखें तो गृह मंत्री के स्तर पर सहकारी समितियों पर ध्यान देना सत्तारूढ़ पार्टी के लिए चुनावी रूप से फायदेमंद हो सकता है। 
 
सीतारमण का विभाग बिना किसी शोरशराबे के ही मजबूत कर दिया गया। फेरबदल की घोषणा के ऐन पहले ही सार्वजनिक उद्यम विभाग को वित्त मंत्रालय के अधीन कर दिया गया। इस तरह कंपनी मामलों के मंत्रालय के साथ वित्त मंत्री के जिम्मे छह विभागों की देखरेख होगी।  इसका क्या मतलब है? सार्वजनिक उद्यम विभाग सभी केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रमों की मुख्य एजेंसी है जो उनके लिए सभी नीतियां बनाता है। सरकार पहले ही सार्वजनिक उपक्रमों के निजीकरण और उनकी परिसंपत्तियों की बिक्री का ऐलान कर चुकी है, लिहाजा इस अहम विभाग को वित्त मंत्रालय के अधीन लाना बेहद महत्त्वपूर्ण है। पहले सार्वजनिक उपक्रमों के विनिवेश की प्रक्रिया विभिन्न मंत्रालयों के बीच मतभेद होने से अक्सर बाधित हो जाती थी लेकिन अब सार्वजनिक उद्यम विभाग के वित्त मंत्रालय का हिस्सा बन जाने से सीतारमण के सामने ऐसी कोई समस्या नहीं आनी चाहिए। इस तरह वह निजीकरण और सार्वजनिक उपक्रमों की परिसंपत्ति बिक्री के बारे में की गई अपनी बजट घोषणा पर अमल कर सकती हैं। 
 
कुल मिलाकर, मोदी ने इस व्यापक फेरबदल से अपनी वित्त मंत्री के विभाग विस्तार से निजीकरण और अपने गृह मंत्री को सहकारिता का नया मंत्रालय सौंपकर सहकारिता क्षेत्र के निर्माण पर खास जोर दिया है। इस संदर्भ में देखें तो गृह मंत्री और वित्त मंत्री के विभाग को मजबूत करना एक ऐसा संदेश है जिसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।