बिजनेस स्टैंडर्ड - सरसों की बढ़ी मांग, पर किसानों को कम लाभ
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Monday, November 20, 2017 01:17 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|
 
होम निवेश खबर

सरसों की बढ़ी मांग, पर किसानों को कम लाभ
संजीव मुखर्जी / अलवर (राजस्थान) March 16, 2015

आर्थिक सिद्धांत कहता है कि जब आपूर्ति कम होती है तो कीमतें ऊपर जाती हैं। लेकिन राजस्थान के अलवर जिले के मौसमपुर गांव के 45 वर्षीय पूरण सिंह को अपनी सरसों की फसल से होने वाली आमदनी इस आर्थिक सिद्धांत पर खरी नहीं उतरती है। सरसों के तेल की मांग हर साल करीब 20 फीसदी बढ़ रही है।  लेकिन सरसों की कीमतों में मुश्किल से ही इतनी तेजी रहती है। अगर सब कुछ ठीक भी रहा तो सिंह जैसे किसान सरसों की कीमत 3,000 से 3,500 रुपये प्रति क्विंटल मिलने की उम्मीद करते हैं। ऑफ सीजन में बेचने पर 400 से 500 रुपये ज्यादा कीमत मिल सकती है।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक मार्च, 2014 के बाद सरसों तेल के दामों में करीब 20 से 30 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी हुई है। पिछले कुछ वर्षों से सरसों तेल की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं, लेकिन बेलगाम मिलावट के कारण सरसों की कीमतें बेलोच बनी हुई हैं। सिंह कहते हैं, 'अगर फसल गीली है तो इसकी कीमत बाजार दर से 100 से 120 रुपये प्रति क्विंटल ज्यादा मिलती है। लेकिन अगर यह सूख जाती है तो हमें इतना ही नुकसान होता है, क्योंकि सूखी सरसों का वजन घटता है।' उनके आधे खेत में सरसों और आधे में गेहूं है और ये यहां रबी सीजन में बोई जाने वाली प्रमुख फसलें हैं।  करीब आधे राजस्थान में रबी सीजन में सरसों की फसल क्यों बोई जाती है, इसकी वजह बताते हुए सिंह की पत्नी ने कहा, 'गेहूं में ज्यादा सुनिश्चित आमदनी मिलती है, लेकिन इसमें सरसों की तुलना में ज्यादा श्रम की जरूरत होती है और इसमें कम से कम बार सिंचाई की जरूरत होती है। सरसों को सर्दियों के दौरान केवल एक सामान्य बारिश की जरूरत होती है।'
आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 20140-15 में भारत का सरसों उत्पादन करीब 73.6 लाख टन रहने का अनुमान है, जो पिछले साल से 10 से 12 लाख टन कम है। हाल में बारिश होने से उत्पादन घटने की आशंका है।
अलवर की नई मंडी के एक कारोबारी अश्विनी कुमार कहते हैं, 'सरसों और इसके तेल की कीमतों के बीच आनुपातिक समानता न होने की वजह मिलावट है, जिससे सरसों के उत्पादन में गिरावट के बावजूद तेल की आपूर्ति कम नहीं होती है।
सरसों में तेल की वास्तविक मात्रा करीब 42 फीसदी है, जिसका मतलब है कि अगर सरसों का उत्पादन 73.6 लाख टन है तो सरसों के शुद्ध तेल की आपूर्ति 30 से 31 लाख टन होनी चााहिए। अग्रवाल का कहना है कि लेकिन बाजार में हर साल सरसों तेल की उलब्धता कभी भी 60 लाख टन से कम नहीं होती। इस अंतर की भरपाई सरसों तेल में कानूनी रूप से निर्धारित ज्यादा मात्रा में राइस ब्रान और पामोलिन तेल की मिलावट से होती है। राइस ब्रान और पामोलिन सरसों तेल में मिलाए जाने वाले मुख्य तेल हैं।
वर्ष 1998 में भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) द्वारा जारी दिशानिर्देशों के तहत रिफाइंड वनस्पति तेल बनाने के लिए सरसों तेल में 25 फीसदी तक राइस ब्रान और पामोलिन तेल मिलाने की स्वीकृति दी गई है। लेकिन कारोबारियों ने आरोप लगाया कि स्थानीय ब्रांडों में मिश्रण की मात्रा ज्यादा होती है।
अग्रवाल कहते हैं, 'स्थानीय कारोबारी ज्यादा मिलावट करते हैं। यही वजह है कि हर संभावित नाम से सरसों तेल मिलता है।' अग्रवाल तिलहन प्रसंस्करण करने वाली कंपनियों जैसे अदाणी विल्मर और पी मार्क को सरसों की आपूर्ति करते हैं। वह कहते हैं कि हर सप्ताह अलवर से सरसों तेल के तीन से चार रेलवे वैगन असम जाते हैं, जिनमें से करीब 60 फीसदी मिलावटी होता है। आमतौर पर एक रेलवे वैगन में 40 बॉक्स होते हैं, जिनमें प्रत्येक में 15 लीटर सरसों तेल के 4,000 टिन होते हैं। अग्रवाल कहते हैं, 'हमने कई बार प्रशासन से इसकी शिकायत भी की है।' उन्होंने कहा, 'क्या किसी स्थानीय ब्रांड का मान्यता प्राप्त प्रयोगशाला में परीक्षण होता है और मुझे पक्का विश्वास है कि एक भी इसमें खरा नहीं उतरेगा।'
पुरी ऑयल मिल्स के प्रबंध निदेशक विवेक पुरी कहते हैं कि सरसों तेल में स्वास्थ्य से संबंधित चिंता इसमें मिलावट होना है। पुरी ने कहा, 'अगर खुला तेल बेचने वाले भी खाद्य नियमन एवं मानकों का पालन करें तो यह गारंटी नहीं है कि तेल में मिलावट नहीं होगी, क्योंकि यह कई हाथों से होकर गुजरता है।'
लेकिन गरीब आदमी का यह तेल 100 रुपये प्रति लीटर से ऊपर बिकता है और आम आदमी को पैकेट बंद सरसों तेल का इस्तेमाल करने के लिए राजी करना मुश्किल है। पुरी का सुझाव है कि इस फसल को प्रोत्साहित करने के लिए नारियल तेल और अन्य विकास बोर्डों की तर्ज पर सरसों प्रोत्साहन बोर्ड बनाया जाना चाहिए। अलवर के एक अन्य किसान अजीत सिंह ने कहा, 'सरसों हमेशा रबी की द्वितीयक फसल नहीं हो सकती। अगर हमें लगातार बिजली मिले तो हम गेहूं और सरसों दोनों की उत्पादकता बढ़ा सकते हैं।'
गेहूं और सरसों रबी सीजन में उगाई जाने वाली दो प्रमुख फसलें हैं। इनकी बुआई नवंबर में शुरू होती है और फसल की कटाई फरवरी से शुरू होती है। इन फसलों की बुआई मॉनसून सीजन के बाद होती है, इसलिए रबी फसलें सिंचाई पर निर्भर होती हैं। सिंह का गांव दिल्ली से मुश्किल से 300 किलोमीटर दूर है, जहां बिजली की आपूर्ति दिन या रात में छह घंटे होती है। सिंह कहते हैं, 'अगर हमें बिना कटौती के कम से कम 8 से 12 घंटे बिजली मिले तो हमें सरसों से बेहतर उत्पाकदता और आमदनी मिल सकती है।'
Keyword: Mustard, Oil, Farmers,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या बायोएथेनॉल में पराली के इस्तेमाल से थमेगा वायु प्रदूषण?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS General News   Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.