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न्याय की राह में बीमारी बनती है अपनों के प्रति वफादारी
एम जे एंटनी / नई दिल्ली August 31, 2014

किसी भी मुकदमे से संबंधित पक्ष की यह छिपी हुई लेकिन अनुचित इच्छा होती है कि निर्णायक मंडल या पीठ में उनका कोई हिमायती हो। अगर यह सपना हकीकत का रूप अख्तियार कर ले तो यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता की जड़ों को कमजोर करेगा। 'प्रतिबद्घ न्यायाधीशों' को लेकर होने वाला संघर्ष न्यायिक नियुक्ति विधेयक के संदर्भ में पुनर्जीवित हुआ है। मगर उच्चतम न्यायालय द्वारा बदलाव की हिदायत के बावजूद मध्यस्थों के मामले में निष्पक्षता के सिद्घांत का मखौल उड़ाया जा रहा है। सामान्य तौर पर एक स्वतंत्र मध्यस्थ की नियुक्ति अनुबंध की शर्तों के अनुरूप होती है। मगर तमाम सरकारी संस्थाओं द्वारा पेश किए गए अनुबंध में यह शर्त समाहित होती है कि मध्यस्थता का कार्य स्वयं उसके अधिकारियों द्वारा किया जाएगा। यह पूरी तरह से गैरवाजिब मांग है लेकिन सरकारी अनुबंधों का मोह ऐसा होता है कि निजी कंपनियां अनुबंध के कागजात पर कहीं भी दस्तखत करने को तैयार रहती हैं। जब विवाद उत्पन्न होता है तो क्या वे यह महसूस करते हैं कि सरकारी निगमों के अधिकारी खुद अपने मामलों में न्यायाधीश हैं।

एक ऐसे ही फैसले (नॉर्थ ईस्टर्न रेलवे बनाम ट्रिपल इंजीनियरिंग वक्र्स) पर उच्चतम न्यायालय ने पिछले सप्ताह फैसला सुनाया, जिसमें सरकार ने यही जोर दिया कि मध्यस्थ कोई राजपत्रित अधिकारी ही होना चाहिए और किसी भी प्रकार के रिक्त पद पर भी उसी विभाग के किसी अन्य राजपत्रित अधिकारी की नियुक्ति होनी चाहिए। इस मामले में रेलवे ने अदालत में लंबे समय से लंबित मामले के आधार पर एक ठेका निरस्त कर दिया। पटना उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय में नाकामी हाथ लगने के बाद ठेकेदार ने मध्यस्थता का विकल्प अपनाया। हालांकि मध्यस्थों की नियुक्ति अनुबंध को लेकर सरकार की सामान्य शर्तों के तहत ही हुई और इसके लिए रेलवे के अधिकारी ही मध्यस्थ नियुक्त हुए। मध्यस्थता कार्यवाही के अहम पड़ावों पर वे स्थानांतरित, प्रोन्नत और सेवानिवृत्त हुए। इसमें ठेकेदार के हित को दबाने के लिए ऊंचे स्तर पर सांठगांठ हो सकती है। किसी भी सूरत में इन लोक सेवकों को अपने करियर में आगे बढऩे के लिए अपने संस्थान के प्रति निष्ठा दिखानी ही पड़ती है।

इस मामले में मध्यस्थों की नियुक्ति 1996 में हो गई थी लेकिन वे अब तक विवाद को सुलझा नहीं पाए। ऐसे में ठेकेदार ने पटना उच्च न्यायालय में गुहार लगाई। अदालत ने एक पूर्व न्यायाधीश को मध्यस्थ बनाया। उच्च न्यायालय के इस फैसले पर रेलवे ने अनुबंध की शर्तों के उल्लंघन का हवाला देते हुए उच्चतम न्यायायल में याचिका दायर की। मध्यस्थता के प्रावधानों के अनुसार केवल रेलवे से जुड़े तीन अधिकारी इस मामले में फैसला कर सकते हैं। वहीं महाप्रबंधक बीच में ही मध्यस्थों को बदल भी सकता है। उच्चतम न्यायालय ने रेलवे की अपील खारिज कर दी और मध्यस्थ के तौर पर न्यायाधीश की नियुक्ति के फैसले पर मुहर लगाई। शीर्ष अदालत ने कहा कि इस तरह के विशेष हालात में अदालत इस नियम को रद्द कर सकती है।

अदालत ने पहली बार इस तरह का फैसला नहीं किया है। अदालत ने एक प्रमुख मामले भारतीय संघ बनाम सिंह बिल्डर्स सिंडिकेट में भी परंपरागत नियमों को पलटते हुए एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश को मध्यस्थ बनाया। मध्यस्थों ने इस प्रक्रिया को एक दशक से भी ज्यादा लंबा खींचकर 'प्रक्रिया का ही मखौल उड़ाया।' फैसले में कुछ तल्ख टिप्पणियां भी की गईं, 'हमने यह पाया कि एक ही पक्ष से मध्यस्थ चुनने के प्रावधान का दूसरे पक्ष द्वारा खासा विरोध होता है। मध्यस्थता एवं समझौता अधिनियम के तहत स्वतंत्रता और निष्पक्षता को सुनिश्चित करने के लिए सरकार, सांविधिक संस्थाओं और सरकारी कंपनियों को मध्यस्थता प्रावधानों से सेवारत अधिकारियों की अनिवार्यता खत्म कर मध्यस्थता में पेशेवर प्रक्रिया को प्रोत्साहित करना चाहिए।'

विदेशी कंपनियां देश में इस एकतरफा अनुबंध वाले चलन पर हैरान हो सकती हैं। बाइप्रोमाज बाइप्रोन ट्रेडिंग एसए बनाम भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (बीईएल) से जुड़े एक हालिया मामले में अदालत ने अनुबंध की शर्तों को किनारे रखते हुए मध्यस्थ की नियुक्ति की। अनुबंध की शर्तों के अनुसार विवाद की बातों को मध्यस्थता के लिए तय चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक (सीएमडी) को तय करना था। जब विवाद खड़ा हुआ तो विदेशी कंपनी ने स्वतंत्र मध्यस्थ नामित करना चाहा। वहीं मध्यस्थता की शर्तों का हवाला देते हुए बीईएल ने इसका विरोध किया। विदेशी कंपनी की आशंका को समझते हुए अदालत ने कहा, 'संबंधित तथ्य यही संकेत करते हैं कि इस मामले में नियुक्त मध्यस्थ से निष्पक्षता की उम्मीद कम है।'

एक अन्य मामले डेनेल (प्रोप्राइटरी) लिमिटेड बनाम बीईएल में अदालत ने बीईएल के सीएमडी के समक्ष यही दोहराया, 'जो एक सरकारी कंपनी है, जो अपने से ऊपर की संस्था के दिशानिर्देशों से बंधी हुई है। निजी कंपनी का पक्ष यही है कि वह रक्षा मंत्रालय द्वारा जारी निर्देशों के तहत बकाया के भुगतान की स्थिति में नहीं है। यह केवल यही दर्शाता है कि सीएमडी के पास अधिकार नहीं कि वह स्वतंत्र रूप से इस विवाद में कुछ फैसला कर सकें।' कुछ वर्षों पहले बीएसएनएल ने मोटोरोला के साथ अनुबंध करते हुए इस शर्त पर खासा जोर दिया, 'इस मामले में कोई विरोध नहीं होगा कि मध्यस्थ एक सरकारी अधिकारी है या फिर वह उस विषय पर काम करे, जो मामला अनुबंध से जुड़ा हो या एक सरकारी सेवक के तौर पर वह विवाद के किसी विषय या सभी पहलुओं पर अपनी राय व्यक्त करे।' उच्चतम न्यायालय ने बीएसएनएल की अपील खारिज कर दी। ऐसी गैरवाजिब शर्तें सरकार के साथ अनुबंध करने में आड़े आती हैं। अधिकारी अपने अधिकारों के प्रति बेहद आग्रही होते हैं। अब वक्त आ गया है कि इन अनुचित प्रावधानों को हटाकर निजी कंपनियों के लिए एक समान स्तर तय किया जाए।

Keyword: supreme court, justice, case,,
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