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अगले कुछ सालों में बैंकों को झेलनी पड़ सकती हैं अतिरिक्त चुनौतियां
देवांग्शु दत्ता /  November 17, 2013

भारतीय बैंकिंग उद्योग बदलाव की दहलीज पर खड़ा है। अब उन बदलावों पर चर्चा करने की जरूरत है जो आने वाले कुछ सालों में संभावित हैं। पहली बात यह कि नए बैंक लाइसेंस आवंटित होने वाले हैं जिनसे प्रतिस्पद्र्धा बढ़ेगी।

दूसरी बात यह कि बेसल 2 नियमों को पूरा करने के लिए पूरे बैंकिंग क्षेत्र को अधिक रकम की दरकार होगी। तीसरी बात यह है कि बैंकों को नए साधनों जैसे स्वैप्स और दूसरे डेरिवेटिव पर विचार करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। चौथी बात यह है कि एनपीए की पहचान के लिए आरबीआई नियम कड़े कर रहा है। पांचवीं बात यह कि नए माध्यम जैसे मोबाइल से रकम का हस्तांतरण अधिक लोकप्रिय हो सकते हैं।

इन सभी बातों पर विचार करें तो बैंकिंग क्षेत्र एक नई दिशा में जाएगा। इससे मौजूदा बैंकों को परिचालन और पूंजी आवंटन में अधिक सक्षमता दिखानी होगी। सरकारी बैंकों को जिस तरह हस्तक्षेप का सामना करना पड़ता है, उससे ये निजी बैंकों के मुकाबले काफी पीछे छूट सकते हैं। टियर 1 पूंजी जुटाना एक बड़ी चुनौती होगी। इसके लिए हिस्सेदारी कम करनी पड़ सकती है जो सरकारी बैंकों के लिए एक बड़ी चुनौती होगी। पूंजी मुहैया कराते हुए मौजूदा हिस्सेदारी का स्तर बनाए रखने के लिए सरकार के पास पर्याप्त रकम नहीं है। निजी बैंकों को रकम की उतनी जरूरत नहीं होगी और अधिक मूल्यांकन को देखते हुए वे बिना किसी खास परेशानी के रकम जुटा सकते हैं।
बैंकिंग क्षेत्र में स्वैप बढ़ रहा है।

पूंजी खाते पर अधिक खुलेपन को देखते हुए अधिक से अधिक कंपनियां और बैंक अपने साधन का इस्तेमाल कर सकते हैं। मान लें कि कंपनी ए मुद्रा एक्स में अधिक सहजता से ऋण प्राप्त सकती है और कंपनी बी मुद्रा वाई में ऐसा ही सुविधा पा सकती है। अगर ए को मुद्रा वाई में ऋण चाहिए और बी को एक्स में ऋण चाहिए तो स्वैप उनके लिए लाभदायक हो सकता है और इससे इन्हें लागत कम करने में भी मदद मिलेगी। लेकिन स्वैप जोखिम भरे होते हैं और सही ढंग से प्रबंधन नहीं होने की स्थिति में जबरदस्त नुकसान हो सकता है।

जोखिम लिए बिना स्वैप के इस्तेमाल का दूसरा तरीका नहीं है और इस प्रक्रिया में गलतियां भी होंगी। बैंकों को इस खंड में अपनी क्षमताओं में इजाफा करना होगा। निवेशकों को मौजूदा डेरिवेटिव पोजीशन को सूक्ष्मता से देखना पड़ेगा और सतर्कता बरतनी होगी।
गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों की पहचान संबंधी नियम कड़ा कि या जाना स्वागत योग्य कदम है। इससे बही-खाता साफ-सुथरा रखने में मदद मिलेगी।
लेकिन कुछ झटकों के सामने आने के बाद एक संक्रमण काल शुरू होगा।

मोबाइल के जरिये रकम हस्तांरण की सुविधा से ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकिंग प्रक्रिया में बदलाव संभव है। ऐसे लोग जो अब तक औपचारिक बैंकिंग सुविधा के दायरे में नहीं हैं उन्हें इससे खासा लाभ होगा। अफ्रीका के एक बड़े हिस्से जहां बैंकिंग सेवा नहीं पहुंची है, वहां मोबाइल के जरिये रकम हस्तांरण से खासी मदद मिली है। नियामकीय स्तर पर मोबाइल बैंकिंग को फंजिबल बनाने की अनुमति प्राप्त करनी होगी।

तात्पर्य यह कि अगर आपके पास कैश बैलेंस के साथ प्रीपेड मोबाइल है तो आप यह रकम हस्तांतरित करने और निकासी करने में सक्षम होना चाहिए। इससे कई खुदरा परिचालन के लिए नकद रकम की जरूरत नहीं होगी। आरबीआई के गवर्नर ने स्पष्टï कर दिया है कि वह मोबाइल मनी को वास्तविकता में तब्दील होते देखना चाहते हैं और केंद्रीय बैंक द्वारा दिशानिर्देश जारी होने के बाद सदस्य बैंकों को यह समझना होगा कि कैसे उन्हें इसमें आगे बढऩा है । अफ्रीका में जिस तरह मोबाइल मनी ने जोर पकड़ा है उसे देखते हुए अगर सही तरीके से लागू किया जाए तो इसका विकास काफी तेजी से हो सकता है।

अगले कुछ सालों में बैंकिंग प्रणाली को कुछ चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। कुछ बैंक इनसे निपटने में औरों की तुलना में अधिक सक्षम होंगे।
निकट अवधि में बढ़ती महंगाई, कमजोर मुद्रा और कुछ बाह्यï कारकों की वजह से ब्याज दरें ऊंचे स्तर पर रह सकती हैं। आरबीआइ गवर्नर रघुराम राजन ब्याज दरें एक बार फिर बढ़ा सकते हैं। वह इनमें कमी तो निश्चित तौर पर नहीं करेंगे।

विकास दर कमजोर पडऩे के संबंध में लोगों की एक राय को मानते हुए अगले 12-18 महीनों के दौरान बैंकों के ऋण आवंटन में अधिक बढ़ोतरी नहीं होगी। इन सारी बातों के मद्देनजर कीमतों के रुझान किस तरह देखे जा सकते हैं? अगले कुछ साल मुश्किलों भरे हो सकते हैं जो अवसर की तरह ही भय का वातावरण भी पैदा कर सकते हैं। ऐसा भी समय आ सकता है जब कुछ खास बैंकिंग शेयरों के मूल्यांकन में भारी कमी आ सकती है। आने वाले कुछ महीनों की बात करें तो मूल्यांकन बढऩे के बजाय कम रह सकता है।

Keyword: भारतीय बैंकिंग उद्योग,,
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