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रिफाइनरी उद्योग मांगे सुधार
देवांग्शु दत्ता /  October 27, 2013

आर्थिक गतिविधियां दुरुस्त होने पर बिजली और परिवहन क्षेत्र आगे बढ़ता है। वर्ष 2013-14 में भारत में इस मोर्चे पर आंकड़े विषम रहे हैं। पहली छमाही में व्यावसायिक समेत अन्य वाहनों की बिक्री में कमी आई है, जो एक अच्छा संकेत नहीं है। अलबत्ता इसी अवधि में बिजली उपभोग और परिवहन ईंधन उपभोग में तेजी आई है, जिसे सकारात्मक माना जा सकता है।

राजकोषीय घाटा और व्यापार असंतुलन को देखते हुए कच्चे तेल और तेल शोधन (रिफाइनरी) क्षेत्रों में गतिविधियां भी दिलचस्प हैं। 2012-13 में भारत ने 144 अरब डॉलर मूल्य के 18.5 करोड़ टन कच्चे तेल का आयात किया था। 2013-14 में अप्रैल-अगस्त अवधि में भारत ने 8.15 करोड़ टन कच्चे तेल का आयात किया है, जो 2012 की अप्रैल-अगस्त अवधि के 7.49 करोड़ टन के मुकाबले कम है। जो अनुमान लगाए जा रहे हैं उनके अनुसार 2013-14 में आयात 19.6 करोड़ टन को पार कर जाएगा। यानी खपत में लगभग 5 प्रतिशत बढ़ोतरी होगी, क्योंकि घरेलू कच्चा तेल उत्पादन में गिरावट आएगी। डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर होने से रुपये में आयात पर खर्च 9-10 प्रतिशत बढ़ गया है। डॉलर में यह 3.5 प्रतिशत बढ़ोतरी है।

एक बड़े स्तर तक भारत में कच्चे तेल के आयात की भरपाई शोधन उत्पादों के निर्यात से होती है। पिछले कई सालों के दौरान भारत ने जबरदस्त शोधन क्षमता हासिल कर ली है। इस समय देश की कुल शोधन क्षमता करीब 21.5 करोड़ टन है।

2012-13 में भारत से 6.34 करोड़ टन उत्पादों का निर्यात हुआ जिनका मूल्य 509 अरब डॉलर था। इससे शुद्ध कच्चा तेल आयात खर्च कम होकर 85 अरब डॉलर रह गया था। अप्रैल-अगस्त अवधि 2013 में भारत ने 24 अरब डॉलर मूल्य का 2.8 करोड़ टन उत्पाद का निर्यात किया था। अगर निर्यात अनुमान के अनुसार ही बढ़ता रहा तो भारत 2012-13 के आंकड़े को पीछे छोड़ सकता है।

अगर कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव नहीं हुआ तो 2013-14 के लिए शुद्ध आयात बिल 2012-13 के मुकाबले कम या कमोबेश समान रह सकता है। भारत का शोधन उद्योग कई करणों से प्रतिस्पद्र्धात्मक रहा है।

पहला कारण तो भारत की भौगोलिक स्थिति है। भारत यूरोप, एशिया और पश्चिम एशियाई देशों से जलमार्ग से जुड़ा हुआ है, जिससे परिवहन खर्च कम आता है। दूसरा कारण श्रम की उपलब्धता है। भारत के अधिकांश शोध कारखानों में अपेक्षाकृत कम पूंजी खर्च होता है।

 सरकार की नीति भी उदार है। निजी क्षेत्र के शोधन कारखानों में 100 प्रतिशत तक विदेशी पूंजी निवेश की अनुमति है। सेज और निर्यातोन्मुखी इकाइयों में शोधन उत्पादों पर करों और आयात शुल्कों में छूट के प्रावधान हैं।

2013 और 2017 के बीच पेट्रालियम उत्पादों की मांग 17 प्रतिशत बढऩे की उम्मीद है जबकि 2017 तक शोधन क्षमता 22 प्रतिशत बढऩे का अनुमान है।
ऐसे में 12वीं पंचवर्षीय योजना में भारत को उत्पाद निर्यात के रूप में अपनी स्थिति मजबूत करनी चाहिए। हालांकि उधार निर्यातोन्मुखी नीतियों का लाभ अब तक निजी क्षेत्र को ही मिला है। सरकार निजी क्षेत्र के शोध उत्पाद निर्यातकों, तेल एवं गैस नीति के दूसरे प्रत्येक पहलू को छूट देने में उदार रही है लेकिन घरेलू शोधन एवं डाउनस्ट्रीम रिटेल आक्रामक नहीं रहा है।

साार्वजनिक शोध उत्पाद विपणनकर्ताओं की क्षमताएं अधिक हैं, क्योंकि इन सब की विस्तार की योजनाएं हैं। लेकिन ये इसलिए परेशान हैं क्योंकि उन्हें कम और नियंत्रित कीमतों पर उत्पादों की आपूर्ति करनी होती है। लिहाजा, हम उस दोहरी सोच में फंसे हैं कि निजी क्षेत्रों को विदेश में मुनाफा अर्जित करने के अवसर हैं, जबकि सार्वजनिक उपक्रमों को मोटा नुकसान उठाना पड़ता है।

पेट्रोलियम उत्पादों के आयात पर विदेशी मुद्रा खर्च कम करने का अधिक उत्पाद निर्यात रास्ता हो सकता है। दूसरा तरीका घरेलू कच्चे तेल और गैस का उत्पादन बढ़ाना है। इसके लिए अन्वेषण को प्रोत्साहित करने के लिए नीतियों की समीक्षा की जरूरत है। अगर तमाम मुद्दों का हल हो जाता है तो भारत काफी हद तक ऊर्जा सुरक्षा और आयात खर्च दुरुस्त कर सकता है।

अगर इनमें कुछेक की समीक्षा होती है तो इसका आंशिक लाभ होगा। इस क्षेत्र पर नजर रखनी भी खासा जरूरी है। बाह्यï खातों पर अधिक दबाव को देखते हुए अधिक सुधारों पर बल दिया जा सकता है।

Keyword: राजकोषीय घाटा और व्यापार असंतुलन,
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