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गुजरात के आइडिया ने रोशन किया
ज्योति मुकुल /  May 24, 2013

गुजरात और मध्य प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सरकार होने के अलावा और भी कुछ समान है। ये दोनों राज्य अपनी जनता के लिए बिजली की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करना चाहते हैं। मार्च 2006 में गुजरात ने सभी उपभोक्ताओं को 24 घंटे और किसानों को कम से कम आठ घंटे बिजली की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए अपनी ज्योति ग्राम योजना को पूरा किया।
इस साल मध्य प्रदेश सरकार ने भी इसी तरह का कार्यक्रम शुरू करने का फैसला किया, लेकिन राज्य सरकार की इस योजना में खेती में इस्तेमाल के लिए 10 घंटे आपूर्ति का वादा किया गया था। शुरुआत में मध्य प्रदेश ने अलग फीडर (किसानों और अन्य उपभोक्ताओं के लिए अलग-अलग वितरण लाइन) की रणनीति अपनाई थी, जैसा गुजरात ने किया था और उसके बाद बिजली आपूर्ति के लिए दीर्घकालिक करार किए गए।
इस क्रम में राज्य बिजली कारोबार में कारोबारी कौशल को व्यवहार में लाने का प्रयास भी कर रहे थे। 2005 में गुजरात सरकार ने गुजरात बिजली बोर्ड से अलग ट्रेडिंग, उत्पादन, पारेषण और वितरण जैसे काम देखने वाली सात इकाइयों के लिए होल्डिंग कंपनी गुजरात ऊर्जा विकास निगम लिमिटेड (जीयूवीएनएल) का गठन किया था। इसी साल मध्य प्रदेश ने भी अपने बिजली कारोबार को नया आकार दिया था और सरकार के स्वामित्व वाली कंपनियों का गठन किया था। बाद में मध्य प्रदेश ने 11,491 करोड़ रुपये के कर्ज का पुनर्गठन भी किया था और अपनी वितरण कंपनियों के बैंकों से लिए अल्पकालिक कर्ज को अपने हाथ में ले लिया था।
तीन वितरण कंपनियों की होल्डिंग कंपनी एमपी पावर मैनेजमेंट कंपनी ने अब अटल ज्योति अभियान को अपने हाथ में ले लिया है जो राज्य के 72 फीसदी उपभोक्ताओं को 24 घंटे बिजली की आपूर्ति के काम से संबंधित है। इस कार्यक्रम के दायरे में भोपाल, रतलाम और जबलपुर सहित 10 जिले पहले ही आ चुके हैं।

अतिरिक्त उत्पादन
2000 में छत्तीसगढ़ के प्राकृतिक संसाधनों की बहुतायत वाले क्षेत्रों के साथ अलग राज्य बनने के बाद मध्य प्रदेश की उत्पादन क्षमता में खासी कमी आ गई थी। लेकिन जैसा कि जीयूवीएनएल के चेयरमैन और गुजरात के ऊर्जा विभाग के सचिव डी जे पांडियन कहते हैं, 'आप एक बाल्टी से पानी नहीं खींच सकते यदि कुएं में बिल्कुल भी पानी नहीं है।'
यदि कोई राज्य 24 घंटे बिजली आपूर्ति के मॉडल की ओर कदम बढ़ा रहा है तो उसे सबसे पहले दीर्घकालिक करार करने पड़ेंगे। मध्य प्रदेश ने ऐसा ही किया। एमपी पावर मैनेजमेंट कंपनी के प्रबंध निदेशक मनु श्रीवास्तव कहते हैं, '2007-08 की 14 फीसदी बिजली की कमी की स्थिति के बाद से हम 10 साल में दीर्घ और मध्यम अवधि करारों के साथ लगभग 19 फीसदी अतिरिक्त बिजली उत्पादन की उम्मीद कर रहे थे।' इस साल राज्य में 4 फीसदी अतिरिक्त बिजली पैदा होने का अनुमान है।
श्रीवास्तव कहते हैं कि राज्य ने बीते साल दीर्घकालिक करारों के माध्यम से अपने बिजली पूल में 1,052 मेगावॉट बिजली जोड़ी है। इस साल रिलायंस पावर की सासन अल्ट्रा मेगा बिजली परियोजना से 495 मेगावॉट अतिरिक्त बिजली जुड़ेगी।
इस साल के आखिर में मध्य प्रदेश में होने वाले चुनाव में इस कार्यक्रम को जाहिर तौर पर लोकप्रिय मुद्दा कहा जा सकता है, लेकिन प्राइस वाटरहाउस कूपर्स के प्रमुख (ऊर्जा) कामेश्वर राव कहते हैं कि ऐसे प्रयासों का सामाजिक और आर्थिक असर काफी ज्यादा होता है। वह कहते हैं कि पीडब्लूसी ने मध्य प्रदेश में एक सर्वे कराया था जिससे पता चलता है कि 24 घंटे बिजली आपूर्ति से बच्चों को ज्यादा समय तक पढ़ाई करने में मदद मिली है। इसके साथ ही महिलाओं की सुरक्षा में सुधार हुआ है और गांवों में ज्यादा आर्थिक गतिविधियों के लिए रास्ते खुले हैं।
राव कहते हैं कि ज्यादा बिजली आपूर्ति से शहरों को पलायन में भी कमी आई है, क्योंकि गांवों में ही बेहतर सामाजिक और आर्थिक गतिविधियों में इजाफा हुुआ है। वह कहते हैं, 'बहरहाल इसके लिए राज्य सरकारों के स्तर पर नीति निर्धारण, योजना, वित्तपोषण और निवेश के मामले में काफी काम करने की जरूरत होती है। अन्य राज्य इसे अपने यहां दोहरा सकते हैं, लेकिन यह इतना आसान नहीं होगा।'
निर्बाध बिजली राज्यों के लिए वितरण कंपनियों को बुकिंग में हो रहे नुकसान के बावजूद आपूर्ति करने के समान है। चुनाव से पहले ऊंची कीमत पर बिजली की हाजिर खरीद में अक्सर बढ़ोतरी देखने को मिलती है, जिसकी आपूर्ति बिना ज्यादा कीमत वसूले उपभोक्ताओं को की जाती है। पांडियन कहते हैं कि आपूर्ति को बनाए रखने के वास्ते राज्यों के लिए ऐसी संस्कृति विकसित करना जरूरी है, जिससे उपभोक्ता बिजली के लिए भुगतान को जारी रखें। गुजरात ने गरीबी रेखा से नीचे के उपभोक्ताओं को छोड़कर सभी उपभोक्ताओं के लिए बीते साल बिजली दर में 4.05 फीसदी और इस साल 8.34 फीसदी इजाफा किया। मध्य प्रदेश ने 2012-13 में महज 0.77 फीसदी ही बढ़ोतरी की।
दरों को अलग-अलग रखने का एक अन्य अहम पहलू है आपूर्ति की गुणवत्ता। इसीलिए गुजरात खेती के लिए प्रति घंटा हर किलोवाट के लिए 50-60 पैसे वसूलता है और गांवों में घरेलू इस्तेमाल के लिए 3.15 रुपये वसूले जाते हैं। पांडियन कहते हैं कि परमाणु ऊर्जा जो सबसे सस्ती होती है, को आदर्श रूप में खेती में इस्तेमाल किया जाना चाहिए।

पनबिजली के भरोसे
फिलहाल गुजरात और मध्य प्रदेश दोनों ही कृषि की मांग को पनबिजली इकाइयों के माध्यम से ही करते हैं। गुजरात के पास अपने इस्तेमाल के लिए 779 मेगावॉट और मध्य प्रदेश के पास 3,688 मेगावॉट पनबिजली है। श्रीवास्तव कहते हैं, 'हम कृषि मांग पूरी करने के लिए रात और सुबह पनबिजली का इस्तेमाल करते हैं।
पनबिजली को ज्यादा खपत वाले घंटों में बिजली की कमी के समय भी इस्तेमाल किया जाता है।' इसके अलावा मध्य प्रदेश लगभग 1,500 मेगावॉट बिजली की अदलाबदली पंजाब और हरियाणा के साथ करता है। अक्टूबर की शुरुआत में रबी की बुवाई के समय जब मांग काफी ज्यादा होती है, मध्य प्रदेश इन दोनों राज्यों से उतनी मात्रा में ही बिजली वापस लेता है जो वह इन्हें गर्मियों में दे चुका होता है। हालांकि सरकारी स्वामित्व वाली बिजली कंपनियों के लिए अलग-अलग उपभोक्ताओं के लिए अलग बुनियादी ढांचा तैयार करना भी एक समस्या है। गुजरात और मध्य प्रदेश दोनों को ही इस बुनियादी ढांचे को तैयार करने और नए उपभोक्ताओं को सब्सिडी देने पर पर खासा खर्च करना पड़ा है। शुरुआत में गुजरात ने बजटीय आवंटन के माध्यम से लगभग 1,500 करोड़ रुपये खर्च किए। मध्य प्रदेश के मामले में श्रीवास्तव कहते हैं कि राज्य में वितरण कंपनियों की वित्तीय स्थिति में तीन साल बाद ही सुधार देखने को मिलेगा, जब तकनीक और व्यावसायिक नुकसान में कमी देखने को मिलेगी।
गुजरात की ज्योति ग्राम योजना के लिए पूंजी जुटाना भी बड़ी चुनौती थी। शुरुआती तौर पर राज्य सरकार ने 70 फीसदी रकम की व्यवस्था की थी, जबकि सार्वजनिक अंशदान के तौर पर पंचायतों, सहकारी संस्थाओं और अन्य स्थानीय संगठनों की तरफ से 30 फीसदी अंशदान की व्यवस्था की गई थी। हालांकि अक्टूबर 2004 में गुजरात सरकार को लक्ष्य हासिल करने के लिए सार्वजनिक फंडिंग की कमी की भरपाई के वास्ते आगे आना पड़ा था।
हालांकि ये बाधाएं गुजरात की बिजली कंपनियों की वित्तीय स्थिति को प्रभावित नहीं कर सकीं। उसकी चार कंपनियां को केंद्र सरकार की सबसे ऊंची रेटिंग ए प्लस हासिल है। मध्य प्रदेश की तीन बिजली कंपनियां बी रेटिंग के साथ तीसरे पायदान पर हैं। गुजरात को ज्योति ग्राम योजना के अध्ययन के लिए बिहार, पंजाब और कर्नाटक जैसे राज्यों में भी प्रतिनिधित्व मिला है। पांडियन उनके लिए कुछ सतर्कता की बात भी करते हैं।
उन्होंने कहा, 'मुफ्त बिजली ने इस क्षेत्र को बरबाद कर दिया है। हर उपभोक्ता को भुगतान करना चाहिए। यहां तक कि कृषि के लिए भी बिजली के लिए पैसा वसूला जाना चाहिए, भले ही वह सब्सिडीयुक्त हो।' दरों के माध्यम से वसूले गए हर एक करोड़ रुपये से 300 से 400 मेगावॉट ज्यादा बिजली मिल सकती है। इसके अलावा अच्छा पारेषण नेटवर्क और कुशल प्रबंधन भी जरूरी है। वास्तव में उपभोक्ता भी खुश हैं। वे कहते हैं कि बिजली कटौती पूरी तरह बंद हो गई हो, ऐसा नहीं है लेकिन हालात पहले से काफी बेहतर हैं। 24 घंटे बिजली आपूर्ति की योजना राजनीति से प्रेरित हो सकती है, लेकिन निश्चित रूप से बदलाव को लागू करने के लिए एक मजबूत इच्छाशक्ति की जरूरत होगी। यह एक तरह से उन दूसरे कर्ई राज्यों के लिए मिसाल साबित हो सकती है, जो फिलहाल बिजली की किल्लता का रोना रोते रहते हैं। खासतौर से गर्मियों के दौरान इन राज्यों की हालत और भी दयनीय हो जाती है।

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