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दो साल : कम कमाल, ज्यादा सवाल
कविता चौधरी /  05 19, 2013

करीब दो साल पहले तृणमूल कांग्रेस पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन की अग्रदूत बनकर उभरी थी। उसने तीन दशक तक राज्य की सत्ता पर काबिज वामपंथियों को हराया था। शानदार जीत के बाद तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी 20 मई 2011 को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बनीं। वास्तविक 'परिवर्तनÓ यानी बदलाव की उम्मीद में ममता बनर्जी और उनके मंत्रिमंडल को जनता का भरपूर समर्थन हासिल हुआ।

तब सियासी जानकारों ने यही सोचा कि राज्य मेंं नया सवेरा हुआ है और वामपंथी कुलीनतंत्र की सत्ता और भ्रष्टïाचार से मुक्ति मिलेगी। हालांकि कुलीनतंत्र को थोड़ा झटका लगा भी लेकिन सारदा चिट फंड घोटाले ने इस बात को साबित कर दिया कि अभी भी बंगाल की राजनीति भ्रष्टïाचार और सत्ता लोभ से बाहर नहीं निकल पाई है। सारदा चिट फंड घोटाला सामने आने के बाद से अब तक 14 लोग आत्महत्या कर चुके हैं।

तृणमूल के एक वरिष्ठï कार्यकर्ता की मानें तो, 'सारदा घोटाले ने पार्टी के लिए नई विभाजन रेखा पैदा कर दी है।Ó उन्होंने कहा, 'ममता की पहचान उनकी ईमानदारी है और उनका यह दिखावा सबके सामने आ चुका है।Ó टीएमसी के पूर्व केंद्रीय मंत्री ने कहा, 'तृणमूल कांग्रेस की पहचान गरीबों की आवाज उठाने वाली पार्टी के तौर पर है और सारदा चिट फंड घोटाले से इसी वर्ग को सर्वाधिक आघात पहुंचा है।Ó तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) नेतृत्व के खिलाफ खुलेआम बगावत करने वाले सांसद कबीर सुमन ने कहा, 'टीएमसी अन्य संगठित दलों की तरह नहीं है। इसकी शुरुआत एक जनआंदोलन के तौर पर हुई। पार्टी की ताकत उसके कार्यकर्ता हैं और मेरी मुखालफत नेतृत्व के खिलाफ है न कि दल के खिलाफ।Ó

नई तृणमूल
इस कड़ी में सुमन ही एकमात्र ऐसे शख्स नहीं हैं। टीएमसी के एक अन्य नेता का कहना है, 'आलम यह है कि बनर्जी गैर राजनीतिक व्यक्तियों मसलन कुणाल घोष और डेरेक ओ ब्रायन (राज्यसभा सदस्य) जैसे लोगों से घिरी हुई हैं और इन लोगों ने पार्टी पर अपना शिकंजा कसना शुरू कर दिया है।Ó पुराने पार्टी कार्यकर्ता कहते हैं, 'पार्टी खड़ी करने वाले लोगों मसलन शिशिर अधिकारी और शोभनदेव चट्टोपाध्याय जैसे लोगों को पार्टी किनारे लगा चुकी है और नए लोगों ने उनकी जगह कब्जा कर लिया है।Ó कुछ समय पहले तक सौगत रॉय ने एक सार्वजनिक सभा में कहा था कि वर्ष 2009 से पहले के तृणमूल कार्यकर्ताओं और उसके बाद पार्टी में आने वाले लोगों के बीच 'स्पष्ट विभाजन होना चाहिएï।Ó रॉय का इशारा निश्चित तौर परोक्ष रूप से उद्योगपति के डी सिंह और क्विज मास्टर डेरेक ओ ब्रॉयन की तरफ था।

इस समय पार्टी में जिस एक व्यक्ति की तूती बोल रही है वह मुकुल रॉय हैं। पूर्व रेलमंत्री मुकुल रॉय ममता बनर्जी के साथ पार्टी के शुरुआती दिनों से जुड़े हुए हैं और उनके सबसे नजदीकी और भरोसेमंद हैं। सूत्रों की माने तो इसका फायदा उठाते हुए रॉय पार्टी में एक दूसरे के खिलाफ नेताओं को खड़ा कर रहे हैं। एक अन्य टीएमसी नेता का कहना है, 'राज्य का कोई भी ऐसा जिला या प्रखंड नहीं है जहां रॉय ने सत्ता का समानांतर केंद्र न खड़ा कर रखा हो।Ó पार्टी में चर्चा है कि आखिर रॉय ने कैसे हल्दिया में टीएमसी के कद्दावर नेता शुभेंदु अधिकारी के खिलाफ काम किया जिसकी वजह से पिछले साल जून में निकाय चुनाव में पार्टी को हार का सामना करना पड़ा।

बनर्जी से होता बौद्घिक मोहभंग
नंदीग्राम और सिंगुर आंदोलन के दौरान सुमन ने अपने आप को पार्टी के करीब पाया और वर्ष 2009 में वह औपचारिक तौर पर पार्टी में शामिल हो गए। सुमन ने कहा, 'वह पहली बार था जब लेखकों, कलाकारों और बुद्घिजीवियों को लगा कि वे टीएमसी के करीब हैं। मैंने वर्ष 2008 में समर बागची और कल्याण रूद्र जैसे वैज्ञानिकों को पार्टी से जोड़ा।Ó बाद में महाश्वेता देवी, समीर आईच और अन्य बुद्घिजीवियों को दरकिनार कर दिया गया और आखिरकार उन्होंने अपने आपको पार्टी से दूर रखने का फैसला किया। महज कुछ ही कलाकार मसलन सुवप्रसन्ना जैसे लोग पार्टी से जुड़े रहे।

सारदा से लगा झटका
दक्षिण 24 परगना के कुल्पी में सरकार प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक और डायमंड हार्बर में टीएमसी के शिक्षा प्रकोष्ठï के प्रमुख मोइदुल इस्लाम लंबे समय से चिट फंड कंपनियों का मामला उठाते रहे हैं। उनका पंजीकृत संगठन गोरिबोर टका बचाओ (गरीबों का पैसा बचाओ) समिति करीब ऐसी 130 से अधिक कंपनियों के खिलाफ आवाज उठाता रहा है। इस्लाम ने कहा, 'मुख्यमंत्री समेत पार्टी के स्थानीय नेताओं के पास बार बार शिकायत के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं की गई।Ó

आगामी चुनाव
इस्लाम जैसे कार्यकर्ता पंचायत चुनाव पर सारदा चिट फंड घोटाले के असर को लेकर चिंतित हैं। इस्लाम का कहना है, 'पार्टी को अपूरणीय नुकसान हुआ है। खिसके आधार को वापस पाना चुनौती होगी।Ó पार्टी के हालिया दिशानिर्देश के तहत किसी भी सारदा एजेंट को प्रत्याशी नहीं बनाया जाएगा। बंगाल में अल्पसंख्यकों की आबादी 25 फीसदी है और पिछले चुनावों के दौरान इनके अधिकांश मत टीएमसी को मिले थे। लेकिन इस बार ऐसा ही होगा, कहना मुश्किल है।

पार्टी का भविष्य
सुमन कहते हैं कि टीएमसी के लिए एकमात्र उम्मीद यह है कि वह गलतियों को दूर करे। अगर ऐसा नहीं किया तो टीएमसी के जो भी पुराने कद्दावर हैं (जिनमें से अधिकांश 'कांग्रेस घरानेÓ से संबंधित हैं) वे पुराने रास्ते पर लौट सकते हैं। इन सबके बावजूद सुमन का दीदी पर 'भरोसाÓ कायम है। ममता बनर्जी को असाधारण योद्घा करार देते हुए दुखी स्वर में सुमन कहते हैं, 'वह दिशा से पूरी तरह से भटक चुकी हैं और जमीनी हकीकतों से पूरी तरह कट चुकी हैं।Ó जब तक आंतरिक नेतृत्व में कोई बदलाव नहीं होता है तब तक आंदोलन से कोई लाभ नहीं होगा।

 

फरवरी 2012 : एएमआरआई अस्पताल हादसे के बाद ममता ने कहा, 'मैं उद्योग चाहती हूं, हत्यारा उद्योग नहीं।Ó मारवाड़ी समुदाय के कारोबारियों ने इसे धमकी की तरह लिया
मार्च 2012 : किरायों में बढ़ोतरी के कारण केंद्रीय रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी को मंत्रालय से बाहर कराया गया
मई 2012 : एक टीवी स्टूडियो में ममता बनर्जी ने कुछ छात्रों को 'माओवादीÓ तक कह डाला, जब उन्होंने राज्य की कानून व्यवस्था पर सवाल खड़े किए
जून 2012 : कलकत्ता उच्च न्यायालय ने सिंगुर भूमि पुनर्वास अधिनियम 2012 को खारिज कर दिया
अप्रैल 2012 : ममता का कार्टून बांटने पर जाधवपुर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर गिरफ्तार
अप्रैल 2013 : पुलिस हिरासत में एसएफआई के छात्र नेता सुदीप्त गुप्ता की मौत
अप्रैल 2013 : प्रेसीडेंसी कॉलेज/विश्वविद्यालय की ऐतिहासिक प्रयोगशाला में टीएमसी की छात्र इकाई ने की तोडफ़ोड़
अप्रैल 2013 :
ममता ने सारदा घोटाले के पीडि़तों के लिए 500 करोड़ रुपये का राहत कोष बनाने की घोषणा की, रकम जुटाने के लिए सिगरेट पर 10 फीसदी अतिरिक्त कर लगाया

Keyword: Mamta Banarjee, ममता बनर्जी, Mamta Gov, West Bengal Gov,
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