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कोयले की राख में जिंदगी हुई खाक!
आर कृष्णा दास / रायपुर 04 26, 2013

कोयला खनन कई लोगों के लिए संपत्ति का प्रतीक हो सकता है, लेकिन छत्तीसगढ़ में धरमजयगढ़ के लोगों के लिए यह कस्बे से गुजरती मौत की तरह है। आर कृष्णा दास की रिपोर्ट :
शंकरलाल दनसेना हमेशा से यह चाहते थे कि सेवानिवृत्ति के बाद वह छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में धरमजयगढ़ में बस जाएं। यह कस्बा अपेक्षाकृत शांत है जहां जीवन ठहरा सा नजर आता है। भागदौड़ से दूर और वहां की हरियाली भी दनसेना को खूब लुभाती थी। वहां पतझड़ी पेड़ों की भरमार थी और पेड़ों से जब पत्ते झड़ते थे तो पूरा कस्बा हरा भरा नजर आता था। यही वजह है कि दनसेना पास के शहर खरसिया छोड़कर वहां आ गए थे। दनसेना अब 70 साल के हैं और स्कूली शिक्षक के पद से सेवानिवृत्त हुए उन्हें एक दशक बीत चुका है। वह पिछले एक दशक से धरमजयगढ़ में ही रह रहे हैं। हालांकि अब उन्हें अपने इस फैसले पर अफसोस होता है और वह सोचते हैं कि काश उन्होंने वहां बसने का फैसला ही नहीं किया होता।

थोड़ी सी मायूसी के साथ दनसेना कहते हैं, 'मैंने खरसिया में अपनी सारी संपत्ति बेच दी और अपना सारा पैसा धरमजयगढ में एक मकान और दुकान बनाने में लगा दिया ताकि मेरा बेटा मिथेश कंप्यूटर सर्विस सेंटर चला सके।Ó दरअसल दनसेना के अफसोस की वजह खुद धरमजयगढ़ है। इस कस्बे के नीचे 12 करोड़ टन कोयला दबा पड़ा बताया जाता है और यह 520 वर्ग किलोमीटर में फैले मांड-रायगढ़ कोलफील्ड में अनुमानित 1,900 करोड़ टन कोयला भंडार का हिस्सा है। अब जबकि धरमजयगढ़ का भंडार खनन के लिए दो निजी कंपनियों को सौंप दिया गया है तो कस्बे के 18,000 लोगों को अपना भविष्य असुरक्षित नजर आ रहा है। जैसे ही कोयले के ब्लॉक को क्षैतिज खुदाई के लिए तैयार किया जाएगा तो कस्बे के 15 में से 12 वार्ड खुद-ब-खुद उजड़ जाएंगे। इस फील्ड से पावर ग्रेड कोयला का खनन किया जा सकता है जिसे क्षैतिज खनन के जरिये ही निकाला जाना होगा।

इस तबाही की आशंका के बीच पूरे कस्बे में गुस्सा है। क्षैतिज खनन से पूरा शहर तबाह हो जाएगा क्योंकि दो कोयला ब्लॉक शाहपुर-दुर्गापुर और दुर्गापुर/सरिया धरमगढ़ के 70 फीसदी से अधिक इलाके में फैले हुए हैं। कस्बे के लोगों को यह भी पता है कि इस खनन योजना से उन्हें कोई आर्थिक लाभ नहीं होगा। इस इलाके में कोई बिजली संयंत्र नहीं बनाया जा रहा है। खनन के बाद कोयला यहां से कहीं और ले जाया जाएगा।

अमित कटारिया हाल ही में तबादला होने से पहले रायगढ़ के जिला अधिकारी थे। वह कहते हैं कि कोयला खदानें विकसित होने से इस कस्बे के विलुप्त होने का कोई संकेत नहीं है। वह कहते हैं, 'जिला प्रशासन कैसे एक कस्बे को उजडऩे दे सकता है जबकि उसने धरमजयगढ़ में बुनियादी ढांचा विकास की इतनी सारी परियोजनाएं हाथ में ले रखी हैं।Ó

कोल इंडिया लिमिटेड (सीआईएल) की सहायक इकाई साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड लिमिटेड (एसईसीएल) को शाहपुर-दुर्गापुर ब्लॉक आवंटित किया गया है जबकि मीडिया हाउस दैनिक भास्कर समूह द्वारा प्रवर्तित कंपनी डी बी पावर को दुर्गापुर/सरिया ब्लॉक के खनन का जिम्मा सौंपा गया है। एसईसीएल के एक प्रवक्ता ने दावा किया कि कंपनी को जो ब्लॉक आवंटित किया गया है वह कस्बे से तकरीबन डेढ़ किलोमीटर दूर है। प्रवक्ता ने कहा, 'ऐसे में यह कहना गलत होगा कि एसईसीएल की वजह से यह शहर बरबाद हो जाएगा, मगर हम दूसरी कंपनियों के बारे  में कुछ नहीं कह सकते हैं।Ó

डी बी पावर ने इस मसले पर पूछे गए सवालों का कोई जवाब नहीं दिया। हालांकि शहर के बीएसपी ट्राइबल कॉलेज के शिक्षक धीरेंद्र मालिया का कहना है कि कंपनी ने स्थानीय अधिकारियों के पास यह कहते हुए एक हलफनामा दाखिल किया है कि, 'वह धरमजयगढ़ नगर पालिका के इलाके में खनन का काम नहीं करेगी।Ó
मगर खनन का विरोध करने वाले कार्यकर्ताओं का कहना है कि डी बी पावर के लिए पूरे कस्बे में खनन का काम छोडऩा संभव नहीं है क्योंकि ऐसा करने पर यह परियोजना कंपनी के लिए व्यावहारिक नहीं रह जाएगी। कंपनी को खनन के लिए 9.1 करोड़ टन कोयला भंडार मिला है जिसमें से 3.4 करोड़ टन तो कस्बे के दायरे में ही आता है। डी बी पावर को उम्मीद है कि चांंपा-जांजगीर के सीमावर्ती जिले में बनने वाली 1320 मेगावॉट ताप विद्युत परियोजना को ईंधन मुहैया कराने के लिए सालाना 20 लाख टन कोयले का खनन करने की जरूरत होगी।

गुस्साए सामाजिक कार्यकर्ता कहते हैं कि डी बी पावर ने कस्बे को खनन के काम से दूर रखने का वादा एक रणनीति के तहत किया है ताकि यहां के लोगों को शांत करा कर खनन का काम शुरू किया जा सके। इस मसले पर जब आम सुनवाई हुई तो कस्बे के एक भी बाशिंदे ने डी बी पावर का समर्थन नहीं किया। सामाजिक कार्यकर्ता कहते हैं कि क्या अपने आप में यह काफी नहीं है। छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के संयोजक आलोक शुक्ला कहते हैं, 'एक गांव की तुलना में एक शहर उजडऩे को लेकर ज्यादा हल्ला मचता है इसलिए कंपनी लोगों का गुस्सा शांत करने के लिए शुरुआत में कस्बे को छूना नहीं चाहती है, मगर बाद में वह पूरे इलाके में अपना काम फैला देगी।Ó

रायगढ़ के एनजीओ जन चेतना के निदेशक रमेश अग्रवाल कहते हैं, 'अगर डी बी पावर लिमिटेड सही में धरमजयगढ़ को बचाना चाहती थी तो उसे संशोधित खनन योजना और पर्यावरण पर पडऩे वाले असर का एक नया आकलन जमा कराना चाहिए था।Ó कंपनी ने पुरानी योजना के आधार पर ही पर्यावरणीय मंजूरी मांगी थी जिसमें इस कस्बे को भी शामिल किया गया था। कंपनी यह दावा तो करती है कि शहर के दायरे में खनन का कोई काम नहीं किया जाएगा, वहीं दूसरी ओर अब तक कोई नई मंजूरी नहीं मांगी गई है। दिलचस्प रूप से एक 'धरमजयगढ़ बचाओÓ अभियान चलाया जा रहा है, मगर यह पर्यावरणविदों या सामाजिक कार्यकर्ताओं की ओर से नहीं चलाया जा रहा, बल्कि चर्च के पादरियों और कॉलेज के प्रोफेसरों का एक समूह इसे चला रहा है। उदाहरण के लिए भूगोल के शिक्षक मालिया ने मार्च 2011 में एक कोयला ब्लॉक को पर्यावरणीय मंजूरी देने के लिए एक आम बैठक में हिस्सा लिया था। मालिया इस वाकये को याद करते हुए कहते हैं, 'वहां मैंने पाया कि परियोजना का विरोध करते वक्त कस्बे के लोग तकनीकी मामलों को सामने नहीं रख पाते।Ó 

मालिया को आभास हुआ कि लोगों को खनन और खदान के बारे में गलत सूचनाएं दी गईं और यही वजह है कि उन्होंने एक जागरूकता अभियान चलाया। शहर के ज्यादातर लोग आदिवासी हैं और वे बारीकियों को समझें, इसके लिए मालिया ने स्लाइड्स और तस्वीरों का इस्तेमाल करने का फैसला किया। मालिया ने जहां यह शो पेश किया वहां लोगों की भारी भीड़ जमा हो गई। सामाजिक पर्यावरण कार्यकर्ताओं के लिए मालिया एक लोकप्रिय व्यक्तित्व बन गए। मालिया कहते हैं, 'मेरी लड़ाई किसी एक व्यक्ति या कंपनी के साथ नहीं हैं, यह सिर्फ हमारे कस्बे को बचाने के लिए है।Ó

स्थानीय चर्च के पादरी फादर रंजीत केरकेट्टïा ने भी कोयला परियोजना के खिलाफ समर्थन जुटाने का बीड़ा उठाया है। वह कहते हैं, 'कई धार्मिक स्थल जिनमें शहर का सबसे बड़ा चर्च भी शामिल है, मलबे में तब्दील हो जाएगा।Ó 

धरमजयगढ़ को पहले उदयपुर के नाम से जाना जाता था और इसका नेतृत्व जमींदार कल्याण सिंह किया करते थे। 1852 में ब्रिटिश शासन ने सिंह और उनके दो भाइयों को नर बलि के आरोपों में गिरफ्तार कर रांची की जेल में बंद कर दिया। 1857 में जब विद्रोह हुआ तो सिंह के भाई धीरज और शिवराज जेल से भाग कर उदयपुर पहुंच गए। उन्होंने उदयपुर में दोबारा से कब्जा जमा लिया और लोगों से कहा कि वे ब्रिटिश शासन को कर न दें। उन्होंने लोगों से खुद कर जमा करना शुरू कर दिया। तब छोटा नागपुर के तत्कालीन जिला आयुक्त एडवर्ड टूइट डाल्टन ने लोगों को फरमान जारी किया कि वे धीरज को कर भुगतान बंद कर दें जो वहां का जमींदार बन चुका था।

मगर लोगों ने डाल्टन का विरोध किया और अपने नेता के साथ खड़े रहे। बाद में 1859 में ब्रिटिश सेना ने उदयपुर पर आक्रमण कर शिवराज को गिरफ्तार कर लिया जो धीरज की मौत के बाद वहां का जमींदार बन चुके थे। शिवराज को ब्रिटिश सरकार के खिलाफ विद्रोह करने का आरोपी करार दिया गया और उन्हें अंडमान की जेल में भेज दिया गया।मुमकिन है कि लोग अपने इतिहास पर नजर डालते हुए अपने कस्बे को 'बाहरी लोगोंÓ से बचाएंगे।

बढ़ रहा है गुस्सा

  • कोल इंडिया की सहायक कंपनी साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड लि. (एसईसीएल) को धरमजयगढ़ में शाहपुर-दुर्गापुर सहित मांड-रायगढ़ कोयला ब्लॉक में 92 खदानों का आवंटन किया गया है। सीआईएल की 8 सहायक कंपनियों में से एसईसीएल ने सबसे ज्यादा मुनाफा कमाया
  • दैनिक भास्कर मीडिया समूह प्रवर्तित डीबी पावर लि. बिजली क्षेत्र की एक नई कंपनी है। कंपनी छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा में 1,320 मेगावॉट क्षमता का पहला बिजली संयंत्र लगा रही है। डीबी को संयंत्र को कोयले की आपूर्ति के लिए धरमजयगढ़ के निकट दुर्गापुर/सरिया कोयला ब्लॉक का आवंटन हुआ है

 

Keyword: Coal, Mining, Comman Man Life,,
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