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आक्रोशित युवा और भविष्य
ईशिता आयान दत्त /  April 21, 2013

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस समर्थित छात्र संगठनों के बाद युवाओं ने ऐलान किया है कि उनमें सियासत को हिलाने की कूवत है क्योंकि राजनीति उनके भविष्य को प्रभावित करती है।की रिपोर्ट :


20 साल की उम्र में अगर कोई शख्स कम्युनिस्ट नहीं है तो वह बेवकूफ है। अगर 30 साल की उम्र तक कोई शख्स कम्युनिस्ट है तो वह उससे भी बड़ा बेवकूफ है :

जॉर्ज बर्नार्ड शॉ
अगर आप 20 साल की उम्र तक लिबरल नहीं हैं तो आपके पास दिल नहीं है। यदि 40 साल की उम्र तक आप कंजरवेटिव नहीं हैं तो आपके पास दिमाग नहीं है :

विंस्टन चर्चिल

वहीं कुछ महान लोगों का मानना है कि 20 साल की उम्र ऐसी होती है, जिसमें भले ही कोई राजनीति में भागीदारी न करे, लेकिन इसमें दिलचस्पी लेने लगता है। कुछ दिन पहले एसएफआई (स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया) से जुड़े सुदीप्त गुप्ता एक विरोध प्रदर्शन के दौरान रहस्यमय परिस्थितियों मारे गए। उनकी उम्र महज 22 साल थी।
गुप्ता की मौत का कारण स्पष्ट नहीं है। एसएफआई कार्यकर्ताओं का दावा था कि उन्हें बेरहमी से पीटा गया था, जबकि पुलिस और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने घोषणा की कि यह एक हादसा था। लेकिन समझा जाता है कि गुप्ता की मौत पुलिस हिरासत में हुई थी। वह कॉलेजों में चुनाव कराने के समर्थन में हो रहे प्रदर्शन में भाग ले रहे थे।
गुप्ता जिस मुद्दे जिस अभियान के समर्थन में चलाई जा रही मुहिम में शामिल थे, वह तृणमूल कांग्रेस सरकार द्वारा छह महीनों के लिए महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में चुनाव को टालने के वास्ते एडवाइजरी (परामर्श) जारी किए जाने के बाद शुरू हुआ था। राज्य सरकार ने इसके लिए आधिकारिक वजह यह बताई थी कि विभिन्न बोर्ड परीक्षाओं और पंचायत चुनावों के चलते महाविद्यालयों के चुनावों के लिए पर्याप्त बल उपलब्ध कराना मुश्किल हो जाएगा। मगर आधिकारिक व्याख्या के आगे की कहानी कुछ अलग ही बयां करती है, जिसका बर्नार्ड शॉ या चर्चिल को संभवत: अनुमान भी नहीं रहा होगा।

फरवरी में हरिमोहन घोष कॉलेज में नामांकन दाखिल कराए जाने के दौरान दो छात्र संगठनों तृणमूल कांग्रेस छात्र परिषद (टीएमसीपी) और कांग्रेस की छात्र इकाई के बीच हुए संघर्ष के दौरान एक उप निरीक्षक की हत्या कर दी गई थी, जो दखल देने की कोशिश कर रहा था। मगर जो हकीकत सामने आई, उसके मुताबिक इस संघर्ष का छात्र राजनीति या कॉलेज के चुनावों से बहुत ज्यादा वास्ता नहीं था। यह लड़ाई कोलकाता बंदरगाह के पास स्थित गार्डन रीच (कॉलेज क्षेत्र) पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए थी। इस हिसाब से हरिमोहन घोष पर नियंत्रण की बात महज सांकेतिक थी।

इस मामले में जो लोग गिरफ्तार किए गए थे, उनमें एक तृणमूल कांग्रेस का काउंसलर भी था।  हालांकि इसके बाद का घटनाक्रम खासा नाटकीय हो गया। दूसरी तरफ आरोपियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज किया जाना सत्तासीन दल के खिलाफ गया, जिसका खमियाजा कोलकाता के पुलिस आयुक्त को भुगतना पड़ा और मुख्यमंत्री ने उनका तबादला कहीं और कर दिया। इसकी वजह यह बताई गई कि वह इस मामले को सही से संभाल नहीं सके। लेकिन यही वह मुख्य घटना थी, जिससे छात्र राजनीति के खतरे जगजाहिर हो गए थे, जहां युवा और होनहार छात्र अक्सर मोहरे बन जाते हैं।

गार्डन रीच और सुदीप्त गुप्ता जैसे लगातार हुए घटनाक्रम अब घरों, टीवी चैनलों और कोलकाता के 'पारसÓ में बहस का विषय बने हुए हैं। यहां सोशल मीडिया को भी नहीं भूलना चाहिए। अहम सवाल यही है कि क्या छात्र संगठनों को राजनीतिक दलों से संबद्ध होना चाहिए या नहीं?

बनर्जी के कट्टïर समर्थक समझे जाने वाले चित्रकार जोगेन चौधरी कहते हैं, 'कॉलेज स्तर की राजनीति पार्टीबाजी से ज्यादा कुछ नहीं है। उनका कोई आदर्श नहीं है। राजनीतिक दल यह कहकर खुद का बचाव कर रहे हैं कि छात्रों को राजनीति के प्रति जागरूक बनाने का यही इकलौता रास्ता है। लेकिन छात्रों को पढ़ाई में अपना समय देना चाहिए। एक अच्छा छात्र ही एक कामयाब राजनेता बन सकता है।Ó चौधरी ने राज्य सरकार की पाठ्यक्रम सुधार समिति के एक सदस्य के रूप में अपनी राय दी है। हाल में प्रेसीडेंसी यूनिवर्सिटी में 'पार्टीबाजीÓ की कुछ घटनाएं देखने को मिली थीं। टीएमसीपी नेताओं और एक टीएमसी काउंसलर ने कथित तौर पर एसएफआई द्वारा नई दिल्ली में बनर्जी और पश्चिम बंगाल के वित्त मंत्री अमित मित्रा पर हमले के विरोध में विश्वविद्यालय में उपद्रव किया था और एक शताब्दी पुरानी बेकर प्रयोगशाला में तोडफ़ोड़ की थी। यह बाहरी गुटों द्वारा इस प्रतिष्ठित कॉलेज पर नियंत्रण स्थापित करने भी एक प्रयास था, जहां टीएमसीपी का कोई अस्तित्व नहीं है।
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यह आकलन करना मुश्किल नहीं है कि क्यों राजनीतिक दल युवाओं को लक्ष्य बनाते रहे हैं। एसएफआई के महासचिव ऋतव्रत बनर्जी कहते हैं, 'यदि राजनीति हमारा भविष्य तय कर सकती है तो हमें राजनीति के बारे में फैसला लेने का अधिकार है।Ó उनकी आवाज में जुनून साफ नजर आता है। संयोग से वह उन लोगों में शामिल थे, जो दिल्ली में योजना आयोग के दफ्तर के बाहर मुख्यमंत्री और राज्य के वित्त मंत्री के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे।

एसएफआई का गठन 1970 में हुआ था और 40 लाख कार्यकर्ताओं की सदस्यता वाला यह संगठन देश के सबसे बड़े छात्र संगठनों में से एक है। बंगाल, केरल और त्रिपुरा के अलावा आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश और राजस्थान में भी एसएफआई की मौजूदगी है। हालांकि 2011 में बंगाल में वाम दलों के हाथ से सत्ता जाने के बाद एसएफआई का प्रभाव कुछ कम हुआ है। बंगाल के 452 कॉलेजों में से 419 पर टीएमसीपी का परचम लहरा रहा है, जबकि अब एसएफआई का सिर्फ 12 कॉलेजों के छात्र संघों पर ही कब्जा है।

एसएफआई के बनर्जी कहते हैं, 'राज्य सरकार ने कॉलेज चुनावों को टाल दिया है और टीएमसीपी का पूरे बंगाल के कॉलेजों पर वर्चस्व है। एसएफआई लोकतंत्र की बहाली चाहता है। कॉलेजों की लड़ाई को गुंडों के माध्यम से जीता गया था, टीएमसीपी का कोई आदर्श नहीं है।Ó

वह सही हो सकते हैं। टीएमसीपी के लिए सब कुछ ममता बनर्जी ही हैं। टीएमसीपी के प्रदेश अध्यक्ष शंकु देव पांडा कहते हैं, 'हमारी आदर्श ममता बनर्जी हैं। हम टीएमसी की इकाई नहीं है, बल्कि हम बनर्जी में पूरा भरोसा रखते हैं।Ó दूसरे छात्र संगठन भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन (कांग्रेस की छात्र इकाई) से संबद्ध वेस्ट बंगाल छात्र परिषद की मौजूदगी यहां कम ही है।
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यह एक सांकेतिक संबंध है। जब टीएमसीपी के सदस्य कॉलेजों में शैक्षिक कर्मचारियों को पीट रहे थे, बनर्जी ने पक्षपाती लहजे में कहा था कि युवा गुस्से से भरे हुए हैं। उन्होंने कहा था, 'मैं भी एक छात्र नेता थी, मैं सब जानती हूं।Ó

रवींद्र भारती विश्वविद्यालय में राजनीतिक विज्ञान के प्रोफेसर सव्यसाची बसु राय कहते हैं कि कैडर आधारित दलों के लिए छात्र इकाइयां भर्ती की जमीन तैयार करती हैं। वह कहते हैं, 'छात्रों ने फ्रांस और वियतनाम युद्ध जैसे आजादी के राष्ट्रीय आंदोलनों की अगुआई की है।Ó बंगाल इस बात को भी अच्छी तरह समझता है। 1960 के दशक में जब नक्सली आंदोलन अपने चरम पर था, तब बंगाल में हर तरफ 'आमार नाम, तोमार नाम, वियतनाम, वियतनामÓ जैसे नारे गूंज रहे थे। ऐसा ही एक नारा था 'आमार बाड़ी, तोमार बाड़ी, नक्सलबाड़ी, नक्सलबाड़ी।Ó

उनमें कुछ ऐसे अच्छे और प्रतिभाशाली छात्र भी थे, जिन्होंने आंदोलन में शामिल होने के लिए कॉलेज तक छोड़ दिया था। जमींदार, कारोबारी, राजनेता और पुलिस को शत्रु वर्ग के रूप में देखा जा रहा था। जब कांग्रेस के मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रॉय ने सशस्त्र कार्यकर्ताओं से निबटने के लिए पुलिस को खुली छूट दे दी, तो दर्जनों की संख्या में उनको मार भी दिया गया था। बंगाल लहूलुहान हो गया था।

सत्यजित रे की फिल्म प्रतिद्वंद्वी (1970) का अपने समय का अभूतपूर्व दृश्य था। इसमें नायक सिद्धार्थ से एक नौकरी के साक्षात्कार के दौरान पिछले दशक की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना के बारे में पूछा जाता है। उसका जवाब होता है-वियतनाम युद्ध (चांद पर मानव के उतरने से भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण घटना)। लेकिन सिद्धार्थ को नौकरी नहीं मिलती है।
(साथ में देबलीना सेनगुप्ता ने भी सहयोग किया।)

Keyword: West Bangal , TMC, Youth, Presidency College, Student Movment, Left Parties,
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