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हरियाली रहेगी बरकरार?
मध्य प्रदेश सरकार ने किसानों को बेहतर उपज दिलाने में मदद की है लेकिन सवाल यह है कि क्या इसमें निरंतरता बरकरार रहेगी?
शशिकांत त्रिवेदी / भोपाल April 18, 2013

राष्ट्रपति की ओर से शायद ही कभी आम लोगों को निमंत्रण मिलता है। ऐसे में मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले के बनाड़ा गांव के एक किसान गंभीर सिंह को जनवरी में देश के राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी की ओर से एक पत्र मिलने पर उनकी हैरानी का ठिकाना न रहा। देश के राष्ट्रपति की ओर से निमंत्रण मिलने की बात पर उन्हें बिल्कुल यकीन नहीं हुआ। सिंह ने समझा कि किसी ने उनके साथ मजाक किया है। कुछ समय बाद राज्य के कृषि विभाग के अधिकारियों एक कैबिनेट मंत्री बनाड़ा गांव आए और उन्होंने सिंह को बताया उन्हें वाकई राष्टï्रपति ने सम्मानित करने के लिए बुलाया है। सिंह दिल्ली जाने के लिए ट्रेन में बैठे तब भी उन्हें इस बात का यकीन नहीं था। आखिरकार, जब वह राष्ट्रपति भवन पहुंचे तो यह उन्हें किसी सपने से कम नहीं लगा। जहां उन्हें राष्टï्रपति ने राज्य के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के साथ कृषि कर्मण पुरस्कार देने के लिए आमंत्रित किया था। गंभीर सिंह खुशी-खुशी पुरस्कार और एक लाख रुपये नकद लेकर बनाड़ा लौटे। सिंह को यह सम्मान इसलिए दिया गया था क्योंकि उन्होंने अपनी 22 एकड़ (8.8 हेक्टेयर) जमीन पर रिकॉर्ड 74 क्विंटल प्रति हेक्टेयर गेहूं का उत्पादन किया था।

सिंह जैसे लोगों के बलबूते ही चौहान, राज्य में कृषि क्षेत्र की तस्वीर बदल रहे हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक राज्य की कृषि विकास दर ें 2012-13 में 14.28 फीसदी (अनुमानित) है जबकि 2011-12 में यह 18.91 फीसदी थी, जो एक रिकॉर्ड है। पहले के सालों के मुकाबले यह प्रदर्शन काफी बेहतर है और यही वजह है कि मध्य प्रदेश ने सकल घरेलू उत्पाद में 2007-08 के 4.69 फीसदी के मुकाबले 2011-12 में 11.81 फीसदी की वृद्घि दर्ज की है।

चौहान बड़े गर्व के साथ दावा करते हैं कि राज्य पंजाब के बाद देश में गेहूं के उत्पादन के लिहाज से दूसरे पायदान पर है। खेती और किसानी की इसी तरक्की को आधार मानकर चौहान के करीब राष्टï्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के सत्ता में आने पर उन्हें प्रधानमंत्री पद के मजबूत दावेदार के रूप में देख रहे हैं। यदि ऐसा होता है तो चौहान, गुजरात के मुख्यमंत्री के सीधे प्रतिद्वंद्वी होंगे।

पिछले साल भोपाल में बिजनेस स्टैंडर्ड द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में चौहान ने अपने साथ घटित कुछ घटनाओं का जिक्र किया जिसमे उन्हें काम करने की चुनौती दी गई। मसलन, उन्होंने बताया कि जब उन्होंने दिल्ली जाकर योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह आहलूवालिया से राज्य के लिए अतिरिक्त खाद्य सामग्री की गुजारिश की तो आहलूवालिया ने कहा कि पहले उन्हें राज्य की स्थिति को दुरुस्त करना होगा। चौहान ने कहा कि उन्हें दुखी होकर खाली हाथ लौटना पड़ा लेकिन उन्होंने यह निश्चय कर लिया कि वह राज्य में खेती और किसानों की दशा और दिशा दोनों सुधारकर ही दम लेंगे, नतीजा सामने है।

गंभीर सिंह भी अपनी उपलब्धि का श्रेय काफी हद तक राज्य सरकार को देते हैं। सिंह कहते है, 'स्थानीय कृषि और राजस्व अधिकारियों ने मुझे आधुनिक खेती के तरीकों पर अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने मुझे यह सलाह भी दी कि समय पर सिंचाई और खाद के पर्याप्त इस्तेमाल से अधिक उपज मिलेगी।Ó
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आखिर चौहान ने इतनी बड़ी सफलता हासिल करने के लिए क्या रास्ता अख्तियार किया? सबसे पहले उन्होंने सिंचाई में सुधार किया। उन्होंने कई तरह की योजनाएं मसलन महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत कपिलधारा और बलराम तालाब योजना की पेशकश की। इस योजना के तहत कई किसानों ने अपने खेतों में कुएं खुदवाए। पूरी कोशिश भूजल के इस्तेमाल को कम करने और सतह के जल के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की थी। बड़े बदलाव 2011-12 में हुए जब कोलार, कुंवर चेन सागर, बरियारपुर, रानी अवंतिबाई लोढ़ी सागर, बाणगंगा, बाघ, राजघाट और बनसागर जैसी सिंचाई परियोजनाओं के लिए 756,000 हेक्टेयर खेती योग्य जमीन ली गई। इसके अतिरिक्त किसानों की करीब 400 संस्थाओं का निर्माण हुआ ताकि वे 2,062 बड़ी, मझोली और छोटी सिंचाई परियोजनाओं का इस्तेमाल कर सकें साथ ही करीब तीन हजार जल स्रोतों का निर्माण भी कराया गया ताकि किसानों को सूखे के संकट से बचाया जा सके। राज्य सरकार ने इसके लिए 222.11 करोड़ रुपये का भारी निवेश किया।

वर्ष 2010-11 में मध्य प्रदेश में 12 लाख हेक्टेयर अतिरिक्त सिंचाई क्षमता बढ़ी और यह 2011-12 में 18 लाख हेक्टेयर हो गई।  किसानों को अब पंप चलाने और खेतों की सिंचाई करने के लिए बिजली की जरूरत है। मध्य प्रदेश सरकार द्वारा किसानों को 2004-12 (राज्य की कृषि आर्थिक समीक्षा 2013 के मुताबिक) के दौरान 1,800 करोड़ रुपये की सब्सिडी दी गई। इसके अतिरिक्त विभिन्न बिजली कंपनियों को 7,983 करोड़ रुपये का अनुदान दिया गया ताकि वे किसानों को सस्ती दरों पर बिजली मुहैया कराएं। एशियाई विकास बैंक से मिले 4,000 करोड़ रुपये के कर्ज की मदद से घरेलू और किसानों को अलग-अलग बिजली मुहैया कराने की व्यवस्था का काम अब लगभग पूरा होने वाला है। सरकार का कहना है कि यह काम इस साल मई तक पूरा हो जाएगा। बिजली मंत्री राजेंद्र शुक्ला के दावे के मुताबिक राज्य ने 9800 मेगावॉट बिजली की मांग को पूरा करने के लिए बिजली खरीदी। फिलहाल मध्य प्रदेश में 10,243 मेगावॉट बिजली उत्पादन की क्षमता है और यह इसे बढ़ाने के लिए 10,000 करोड़ रुपये का निवेश कर रही है।

विभिन्न योजनाएं मसलन वल्र्ड बैंक के फंड से चलाई जाने वाली डिस्ट्रिक्ट पॉवर्टी इनिशिएटिव प्रोजेक्ट के तहत छोटे और सीमांत किसानों की बीज उत्पादक कंपनियों के निर्माण के जरिये बीज बदलने की योजना की पेशकश भी की गई। इन किसानों को उत्पादन बढ़ाने के लिए अच्छे बीज भी दिए गए। ये कंपनियां प्रमाणिक बीज का उत्पादन भी करती थीं ताकि उन्हें किसानों को मुहैया कराया जाए। वर्ष 2010 में राज्य ने खाद का भंडार तैयार करना शुरू कर दिया ताकि किसानों को सही समय पर इसकी आपूर्ति कराई जा सके। नतीजतन खाद का उपयोग करने की रफ्तार बढ़ी है और यह 63.44 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर से बढ़कर 2011-12 में 84 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर हो गई है। इसके अतिरिक्त किसानों के लिए पूंजी के संकट को दूर करने के मकसद से आसान शर्तों पर लघु अवधि के कर्ज भी उन्हें मुहैया कराए गए। कर्ज वितरण की राशि 2003-04 के 1,237 करोड़ रुपये से बढ़कर 2011-12 में 7,447 करोड़ रुपये हो गई। खास बात यह है कि 2011-12 तक 71 लाख कि सान क्रेडिट कार्ड जारी किए गए।

राज्य में भूमि रिकॉर्ड के कमिश्नर द्वारा जारी तीसरे और अंतिम पूर्वानुमान के मुताबिक रबी का उत्पादन 2011-12 के 1,838 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के मुकाबले 2012-13 में 2,098 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर रह सकता है। पिछले साल के 176.87 लाख टन के उत्पादन की तुलना में इस साल अनुमानत: 212.62 लाख टन उत्पादन हो सकता है। इसी तरह 2012-13 के दौरान खरीफ उत्पादन 1,383 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर रहने का अनुमान है जो 2011-12 के दौरान 1,096 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर था और उम्मीद है कि यह 127.64 लाख टन के मुकाबले 164.06 लाख टन हो सकता है। सोयाबीन का उत्पादन भी रिकॉर्ड स्तर पर 82 लाख टन रह सकता है।

अगर कोई दो सालों के आंकड़ों का विश्लेषण करे तो उसे अंदाजा होगा कि 2010-11 और 2011-12 के दौरान फसल का रकबा क्रमश: 209.44 लाख हेक्टेयर और 215 लाख हेक्टेयर हो गया जबकि इसी दौरान उत्पादन 254 लाख टन से बढ़कर 304 लाख टन हो गया और प्रति हेक्टेयर के लिहाज से उत्पादन 1,213 किलोग्राम और 1,436 किलोग्राम रहा। कृषि विभाग के प्रधान सचिव आर के सवाई का कहना है, 'दुर्भाग्य से ओले और बिना मौसम बारिश हो जाने से करीब 3.5 लाख हेक्टेयर क्षेत्र प्रभावित हुए। अगर ऐसा नहीं होता तो हम बड़ी आसानी से पिछले साल का आंकड़ा भी पार कर गए होते।Ó
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लेकिन बनाड़ा के पास ही एक अन्य गांव बराखड़, कृषि क्षेत्र की बेहतरीन तस्वीर का एक दूसरा पहलू उजागर करता है। यहां के एक किसान गुलाब सिंह के पास दो एकड़ से भी कम जमीन है और मौसम की अनिश्चितता से उनका संकट दोगुना हो जाता है। वह कहते हैं, 'बिना मौसम बारिश होने से मेरी फसल बरबाद हो गई है। गेहूं की चमक भी नहीं रही है ऐसे में सरकार के खरीद केंद्र के कर्मचारी इन्हें खरीदने से मना कर रहे हैं। अब मैं क्या करूं?Ó यह कहानी अकेले गुलाब सिंह की न होकर आस-पास के 25 से ज्यादा गांव के किसानों की है।

हाल ही में विधान सभा में पेश किए राज्य के कृषि आर्थिक समीक्षा 2013 के मुताबिक, पिछले कु़छ सालों में कृषि क्षेत्र में असमान वृद्घि दर देखने को मिली। समीक्षा में यह बात सामने आई कि दो सालों के बीच वृद्घि दर में बड़े अंतर के बावजूद कृषि क्षेत्र के सकल घरेलू उत्पादन का योगदान 20.3 फीसदी और 21.8 फीसदी पर लगभग स्थिर रहा।

हालांकि राज्य के अधिकारी उतने चिंतित नहीं हैं। राज्य के कृषि विभाग के निदेशक डी एन शर्मा का कहना है, 'सरकार न केवल कृषि विस्तार योजनाओं को लेकर काफी सक्रिय है बल्कि इसने सिंचिंत क्षेत्र में भी विस्तार किया है और यह कुछ साल पहले के 7.5 लाख हेक्टेयर की तुलना में बढ़कर 24 लाख हेक्टेयर हो गया है।Ó वह कहते हैं, 'कई मामलों में हमारी कृषि सब्सिडी बढ़कर 75 फीसदी हो गई है। इसके अलावा बेहतर ग्रामीण सड़कें बनाने के लिए भी काफी कोशिश की गई है।Ó वह सस्ते कृषि ऋण, नियमित बिजली की आपूर्ति, फसलों की पैदावार पर बेहतर मुनाफा मिलने जैसी खूबियां भी गिनाते हैं। उनका कहना है, 'किसान सरकार के पास एसएमएस, कॉल सेंटर और दूसरे संचार माध्यमों के जरिये सीधे बातचीत कर सकते हैं।Ó

इसके अलावा अब राज्य सरकार निजी कंपनियों को कृषि क्षेत्र में निवेश के लिए आमंत्रित करने की योजना भी तैयार कर रही है। इसके लिए गैर सरकारी संगठनों का सहयोग भी लिया जाएगा। राज्य के कृषि विभाग के प्रमुख सचिव आर के स्वाई कहते हैं, 'इससे राज्य के कृषि क्षेत्र में ज्यादा से ज्यादा निवेश आकर्षित होगा। हम इस पहल के मुताबिक 12वीं योजना में कम से कम 1,000 करोड़ रुपये का निवेश कृषि क्षेत्र में कर सकते हैं। हालांकि दाल के उत्पादन, बीज बदलने की दर, किसानों को समय पर सस्ते कर्ज मुहैया कराने और फसल बीमा योजना से जुड़ी मुश्किलों को दूर करने जैसी चुनौतियां अब भी बरकरार है।Ó

सरकार भले ही अपनी कोशिशों के लिए खुशी जाहिर कर रही हो लेकिन उसके द्वारा जुटाए गए आंकड़े विशेषज्ञों के गले नहीं उतर रहे हैँ। इंदौर स्थित सोयाबीन प्रोसेसर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (सोपा) को भी सरकार के सोयाबीन उत्पादन के आंकड़े अविश्वसनीय लगते हैं। सोपा के प्रवक्ता राजेश अग्रवाल कहते हैं, 'सोपा ने इस साल 65 लाख टन सोयाबीन के उत्पादन का अनुमान लगाया है। लेकिन सरकार के 82 लाख टन सोयाबीन उत्पादन का अनुमान आश्चर्यजनक है और यह विश्वास से परे है।Ó

कृषि विभाग के पूर्व निदेशक और किसानों की आत्महत्या की जांच के लिए मध्य प्रदेश मानवाधिकार आयोग द्वारा नियुक्त समिति के एक सदस्य जी एस कौशल का कहना है, 'कृषि से जुड़े ज्यादातर आंकड़े, राजस्व कर्मचारी (पटवारी) जुटाते हैं। उनमे से बहुत से खेतों में जाते ही नहीं हैं और अंदाजे से सर्वेक्षण की खानापूर्ति करते हैं। अगर खेती की विकास दर इतनी ही तेज है तो किसानों के आत्महत्या करने के मामले मध्य प्रदेश में आखिर क्यों बढ़ रहे हैं? किसानों की आत्महत्या के मामलों में राज्य का स्थान पूरे देश में चौथा है।Ó

वह कहते हैं, 'अगर आप कृषि विभाग के आंकड़ों को ही देखें तो पाएंगे कि पिछले कई सालों से गेहूं उत्पादन का लक्ष्य 160 लाख टन पर स्थिर है। अगर 18 फीसदी या इससे ज्यादा की वृद्घि दर सही है तो वे अब इसे बरकरार रखने में असफल क्यों हैं? पिछले 10 सालों में मैंने यह देखा कि 10,000 किसानों ने आत्महत्या की है और यह तादाद बढ़ती ही जा रही है क्योंकि किसानों की लागत उनकी उपज से मिलने वाली रकम के मुकाबले काफी ज्यादा है।Ó

कौशल का अपना तर्क है। वह कहते हैं, 'खाद के ज्यादा इस्तेमाल को बढ़ावा मिलने से उपज बढ़ी है। क्या प्रदेश को  कैंसर राज्य में बदलना है? मैंने हाल में विदिशा जिले में यह देखा कि एक कैंसर जागरूकता कैंप में आने 45 लोगों में से 14 लोगों को यह रोग हुआ था। क्या ऐसा पंजाब और हरियाणा में नहीं हो रहा है? मैंने कई दफा सरकार को सलाह दी कि वे खाद के इस्तेमाल को बढ़ावा न दें।Ó

प्रदेश के कृषि मंत्री रामकृष्ण कुसमारिया कहते हैं, 'जैविक खेती करने के मामले में रकबे के हिसाब से देश में अव्वल है। हमने किसी भी तरह के ट्रांसजेनिक परीक्षणों और बीजों पर रोक लगा रखी है। अगर इस साल राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में बेमौसम बारिश होने से फसल खराब नहीं होती तो हमारी खेती की विकास दर 20 फीसदी से अधिक होती।Ó कुसमारिया का कहना है कि सरकार अब दूसरे चरण में सुधार कार्यक्रमों पर जोर दे रही है ताकि किसानों को बाजार से जोड़ा जा सके। गंभीर ङ्क्षसह अब घर वापस आ चुके हैं। पुरस्कार के पैसे भी अब खत्म हो चुके हैं। लेकिन दूसरे किसानों की तरह वह आश्वस्त नहीं हैं कि ये अच्छे दिन कब तक रहेंगे।

Keyword: MP, Irrigation, MP Agriculture,
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