एक शताब्दी पहले टैगोर द्वारा रचित इस नाटक का निर्देशन सुशांत मंडल ने किया। पश्चिम बंगाल के बधिर विद्या भवन के मूक-बधिर बच्चों के समूह ने यह नाटक पेश किया।
यह नाटक अमल नाम के बच्चे की कहानी है जो बीमार है और जिसे डॉक्टरों की सलाह पर उसके घर में ही रखा गया है। इस नाटक को जीवंत रूप में पेश करते हुए बच्चों ने दर्शकों का मन मोह लिया। नाटक के लगभग हर दृश्य के बाद दर्शकों ने जमकर तालियां बजायीं।
मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए प्रसिद्ध थियेटर कलाकर मोहन अगाशे ने इस मौके पर कहा, इन बच्चों की संग्यानात्मक क्षमताएं भले ही सीमित हों लेकिन उनके पास अन्य इंद्रियों की असाधारण शक्ति है जिससे आज सभी किरदार जीवंत लगे।
अगाशे एक मनोचिकित्सक भी हैं। इस लिहाज से उन्होंने कहा कि उन्हें लगता है कि शारीरिक रूप से अशक्त बच्च,े अपने अभिनय और भावों की अभिव्यक्ति के द्वारा भावनाओं को बेहतर रूप में दिखा सकते हैं।
निर्देशक सुशांत मंडल ने अगाशे की बात से सहमत होते हुए कहा, उन्हें :बच्चों को: निर्देशित करने की जरूरत नहीं पड़ती, वह बहुत तन्मयता से काम करते हैं। इस वजह से मूल नाटक के संवादों से भरे होने के बावजूद हमें पूरा विश्वास था कि हम इसे अच्छे तरीके से पेश कर लेंगे।
जारी भाषा