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आधी दुनिया का कड़वा सच
प्रियंका शर्मा और इंदुलेखा अरविंद /  January 20, 2013

राजधानी दिल्ली में एक 23 वर्षीय छात्रा के साथ सामूहिक बलात्कार और फिर उसे बर्बर तरीके से चोट पहुंचाने की घृणित घटना को बीते एक महीना हो चुका है। (बाद में छात्रा ने सिंगापुर के एक अस्पताल में दम तोड़ दिया था।) उस घटना की देश भर में जबरदस्त प्रतिक्रिया हुई। महिलाओं के साथ बलात्कार और छेड़छाड़ के विरोध में जुलूस निकाले गए, मोमबत्तियां जलाई गईं और धरना प्रदर्शन किए गए। उद्योग संगठन फिक्की ने महिलाओं की सुरक्षा के लिए एक टास्क फोर्स का गठन किया जो महिलाओं के लिए एक राष्ट्रीय सुरक्षा नीति तैयार करेगा। यह नीति उद्योग जगत के लिए होगी।
इतना सब कुछ होने के बावजूद दिल्ली में हुए बलात्कार की उस घटना के कुछ ही दिन बाद एक प्रमुख प्रबंधन कंपनी की ऑफिस कैब को नोएडा के एक इलाके में रोक दिया गया, उसमें कंपनी की चार महिला कर्मचारी सवार थीं। जिस जगह कैब को रोका गया वह अंधेरा इलाका था। सड़क पर चार पुरुषों ने ऑफिस की इस कैब का रास्ता रोका था। उन पुरुषों ने महिलाओं को घूरना शुरू किया, उन्हें डराने और उन पर हमला करने की कोशिश भी की। यह सब कुछ 10 मिनट तक चलता रहा। कैब में मौजूद सुरक्षा गार्ड के पास कोई हथियार नहीं था और वह असहाय सा इस बात का इंतजार कर रहा था कि कब ये चारों पुरुष खुद ही यह सब करना बंद करेंगे। तभी अचानक इस इलाके से एक दूसरी कैब गुजरी और वे चारों भाग खड़े हुए। कंपनी ने इस तरह की घटना से निपटने के लिए यह नियम बना दिया कि अब से सभी कैब एक साथ ही निकलेंगी। हालांकि इससे उन कर्मचारियों को खासी परेशानी उठानी पड़ेगी जिनकी शिफ्ट पहले खत्म हो जाती है। पर अगर छेड़छाड़ का शिकार हुए बिना सुरक्षित घर पहुंचना है तो यह कीमत तो चुकानी ही पड़ेगी।
कामकाजी महिलाएं अब इस तरह की छेड़छाड़ की आदी हो चुकी हैं। काम के सिलसिले में वे जब भी घर से बाहर निकलती हैं उन्हें इस तरह की घटनाओं से जूझना पड़ता है। ऑक्सफैम की ओर से 2011-12 में किए गए एक सर्वेक्षण के मुताबिक 17 फीसदी महिलाओं को काम पर कम से कम एक बार यौन प्रताडऩा का शिकार होना पड़ा है। ऐसे मामले अक्सर डर और शर्म के कारण सामने नहीं आ पाते, ऐसे में काफी हद तक मुमकिन है कि ऐसे मामलों की वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक होगी। महाराष्ट्र में महिलाओं के साथ दफ्तरों में यौन उत्पीडऩ के मामलों की प्रकृति, उनकी गंभीरता और उनके असर के बारे में राष्ट्रीय महिला आयोग को सौंपी गई एक सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक 37 प्रतिभागियों को अपने दफ्तरों में यौन प्रताडऩा का शिकार होना पड़ा है।
महिला एवं बाल कल्याण विभाग, महिलाओं की सुरक्षा का समर्थन करने वाली एक स्वयंसेवी संस्था जागो री, दक्षिण एशिया में संयुक्त राष्ट्र महिला विकास कोष और यूएन हैबिटेट के एक सर्वेक्षण 'सेफ सिटी फ्री ऑफ वॉयलेंस फॉर वूमन' से पता चलता है कि दिल्ली को असुरक्षित माने जाने की एक सबसे बड़ी वजह महिलाओं के साथ होने वाले यौन उत्पीडऩ के मामले हैं। यह सर्वेक्षण जनवरी से मार्च 2010 के बीच राजधानी दिल्ली में 5,010 महिलाओं और पुरुषों पर किया गया था। सर्वेक्षण के मुताबिक 85.4 फीसदी महिलाओं, 87 फीसदी पुरुषों और 93 फीसदी गवाहों का मानना है कि सार्वजनिक स्थलों में यौन उत्पीडऩ के मामले बहुत आम हैं।
कई बार छेड़छाड़ की घटना में पीडि़त महिला या युवती को इस बात का अंदाजा नहीं होता कि इस तरीके से भी कोई उनके साथ बदतमीजी कर सकता है और कई बार उन्हें ये लगता है कि ऐसे मामलों में विरोध जता कर वे अत्यधिक संवेदनशीलता का परिचय दे रही हैं। बेंगलूर की इंटरवेव कंसल्टिंग की संस्थापक और सीईओ निर्मला मेनन बताती हैं कि अलग अंदाज में बात करना और दोहरे अर्थ वाले चुटकुले भी इसी श्रेणी में आते हैं। मेनन कहती हैं कि 'तुम सेक्सी दिख रही हो', 'क्या तुमने वैसी फिल्म देखी है?' (आशय उस फिल्म से होता है जिसमें आपत्तिजनक सामग्री होती है।), इस तरह के प्रश्न भी महिलाओं को असहज कर सकते हैं। चित्रांगदा सिंह और अर्जुन रामपाल की फिल्म इनकार कार्यस्थल पर यौन उत्पीडऩ के मसले पर बनी है और ऐसे संवेदनशील मामलों में कर्मचारियों का व्यवहार समझने के लिए वायकॉम 18 ने गहराई से एक सर्वेक्षण कराया था, जिस पर कंपनी ने तकरीबन 2 करोड़ रुपये खर्च किए। फिल्म के निर्देशक सुधीर मिश्रा बताते हैं कि इस सर्वेक्षण से जो बात सामने निकलकर आई वह बेहद चौंकाने वाली थी। मिश्रा बताते हैं, 'ज्यादातर कंपनियों में पुरुषों का वर्चस्व होता है। यहां अक्सर महिलाओं की शिकायतों और असहजता को गंभीरता से नहीं लिया जाता।'
महिलाओं के साथ होने वाले यौन उत्पीडऩ के बीच विरोध प्रदर्शनों का दौर तो जारी है मगर देश के कानून निर्माता अब तक 'सेक्सुअल हैरासमेंट ऑफ वूमन ऐट वर्कप्लेस ऐक्ट, 2012' को कानून में नहीं बदल पाए हैं। कोयला घोटाले के शोर शराबे के बीच लोकसभा में इस विधेयक को बीते साल सितंबर में ही पारित किया जा चुका है मगर इसे अब तक राज्यसभा से हरी झंडी नहीं मिली है। कानून के अभाव में फिलहाल हर दफ्तर में उन दिशानिर्देशों का पालन किया जा रहा है जो 1997 में विशाखा एवं अन्य बनाम राजस्थान सरकार मामले में उच्चतम न्यायालय ने जारी किया था। अदालत ने ये दिशानिर्देश उन पांच आरोपियों को दोषी ठहराते हुए जारी किए थे जिन्होंने सामाजिक कार्यकर्ता भंवरी देवी का बलात्कार किया था। इन दिशानिर्देशों के जरिये यौन उत्पीडऩ को परिभाषित किया गया है और कार्यस्थलों पर उन एहतियाती कदमों का जिक्र किया गया है जिन्हें अपनाकर ऐसे मामलों को रोका जा सकता है। साथ ही इस सिलसिले में शिकायतों के निपटान के लिए तंत्र के गठन की बात कही गई है। हर कंपनी के लिए अपने हर दफ्तर या शाखा में एक आंतरिक शिकायत निपटान समिति का गठन जरूरी है। इस समिति की अध्यक्षता किसी महिला के जिम्मे ही होनी चाहिए और इसमें महिला सदस्यों की संख्या आधी से कम नहीं होनी चाहिए।
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हालांकि इस प्रस्तावित कानून में भी कुछ कमियां हैं। विधेयक की धारा 10(1) पीडि़त की ओर से शिकायत दर्ज कराए जाने के बाद सबसे पहले पीडि़त और जिसके खिलाफ शिकायत दर्ज की गई है, के बीच समझौते की बात करती है। अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला संगठन की सचिव कविता कृष्णन कहती हैं, 'यह बिल्कुल भी स्वीकार करने योग्य नहीं है।' साथ ही विधेयक की धारा 14 झूठी शिकायत दर्ज कराने वाली महिलाओं को दंडित करने की बात भी करती है। ऐसे में महिलाएं एक बारगी शिकायत दर्ज कराने से कतराएंगी। कुछ मामलों में तो यौन उत्पीडऩ विरोधी समितियां बहुत बढिय़ा काम करती हैं मगर कृष्णन बताती हैं कि कई मामलों में ऐसा भी देखने को मिलता है कि समितियां केवल नाम के लिए कंपनी के हितों से अलग होती हैं और इनमें ऐसे सदस्यों की भरमार होती है जो शिकायतों को दबाने के इच्छुक होते हैं। ऑक्सफैम के सर्वेक्षण से पता चलता है कि यौन उत्पीडऩ के 121 में से 96 मामलों में बदनामी के डर से पीडि़त आरोपी के खिलाफ कोई औपचारिक कदम नहीं उठा पातीं।
शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई भी बड़ी मुश्किल से देखने को मिलती है। जब भारतीय प्रबंध संस्थान बेंगलूर की पूर्व चिकित्सा अधिकारी डॉ. चित्रा (नाम बदला हुआ है) ने संस्थान के मुख्य प्रशासनिक अधिकारी (जिनका व्यवहार जरूरत से कुछ अधिक ही दोस्ताना है) के खिलाफ छेड़छाड़ की शिकायत की। जेंडर सेंसिविटी कमेटी ने संस्थान के निदेशक को अंतिम सुझाव रिपोर्ट बनाकर सौंपने में एक साल से अधिक का समय लगा दिया। इस मामले में पीडि़ता एक परिवीक्षाधीन अधिकारी थीं, उन्हें तीन साल की सेवा के बाद नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया, जबकि कुछ ही दिन बाद उनकी नौकरी पक्की की जानी थी। आईआईएम बेंगलूर ने उनकी शिकायत और उनको बर्खास्त किए जाने के मामले से खुद को अलग कर लिया।
एक बीपीओ कंपनी में वरिष्ठï पद पर काम करने वाली एक महिला कर्मचारी ने हाल ही में कृष्णन से संपर्क साधा। उस महिला को अपनी कंपनी में सुरक्षा प्रमुख से यौन उत्पीडऩ का शिकार होना पड़ रहा था। उस बीपीओ कंपनी में ऐसी कोई इकाई नहीं थी जहां वह महिला अपनी शिकायत दर्ज करा सके। वह महिला इस डर से पुलिस में शिकायत दर्ज नहीं करा पा रही थी कि इससे न केवल उसकी नौकरी छिन जाएगी बल्कि इस तरह की शिकायत करने के बाद आगे दूसरी बीपीओ कंपनियों में भी उसे काम नहीं मिल पाएगा। दिल्ली में एक दूसरी महिला कर्मचारी ने शिकायत की कि उनके बॉस उन पर टिप्पणियां करते थे, उन्हें देर रात तक ऑफिस में रोक कर रखते थे, उन्हें अपनी पसंद के कपड़े पहनकर आने को कहते थे और उन्होंने उन पर दिल्ली से बाहर की यात्राओं पर साथ चलने के लिए जोर डालना भी शुरू कर दिया था। कृष्णन बताती हैं, 'ऐसे ही एक दिन जब उन्हें ऑफिस में देर तक रुकने को कहा गया तो महिला ने इसका विरोध किया और कंपनी के गार्ड और उनके बॉस ने उन्हें दफ्तर से बाहर जाने की इजाजत तब ही दी जब महिला ने नौकरी छोडऩे के लिए मिलने वाले मुआवजे के चेक को स्वीकार कर लिया जो कि उनके वास्तविक बकाये से काफी कम था। इस मामले में भी महिला ने पुलिस के पास कोई औपचारिक शिकायत दर्ज नहीं कराई क्योंकि उन्हें लगा कि इस तरह उनके परिवार का नाम खराब होगा।' कई बार कारोबार की जरूरतों का हवाला देते हुए भी यौन उत्पीडऩ के मामलों को दबा दिया जाता है। मीडिया में काम करने वाली प्रीति लखानी (नाम बदला हुआ है) को उनकी पत्रिका ने प्रायोजित परिशिष्ट के एक असाइनमेंट के लिए शहर से बाहर भेजा था। वहां इस 26 वर्षीय महिला ने क्लाइंट के दफ्तर में एक मार्केटिंग अधिकारी से अपना नंबर साझा किया क्योंकि जब तक असाइनमेंट पूरा नहीं हो जाता उन दोनों को आपस में संपर्क में रहना था। दिल्ली की इस महिला ने बताया, 'वह मुझे अक्सर एसएमएस भेजा करता था। मैं शायद ही कभी उसके एसएमएस का जवाब देती थी।' वह बताती हैं, 'मैं जब उससे आखिरी बार मिली तो अचानक ही उसने मुझे कस कर गले लगा लिया। इससे पहले कि मैं कुछ समझती और कोई प्रतिक्रिया दे पाती उसने मेरे गाल पर चुंबन कर दिया था।' लखानी वहां से दौड़ती हुई बाहर निकलीं और जल्द ही अपने संपादक को इस घटना के बारे में बताया। लखानी कहती हैं, 'उन्होंने मुझे यह सब भूल जाने को कहा। आखिरकार वह (मार्केटिंग अधिकारी) हमें लाखों का विज्ञापन जो दे रहा था।'
इसका एक दूसरा पहलू भी है: जो सदस्य यौन उत्पीडऩ के मामलों की जांच करते हैं वे कंपनी के मालिक को खुश करने के लिए ऐसे मामलों को ज्यादा तूल देने से कतराते हैं। मुंबई में महिलाओं के अधिकारों के लिए लडऩे वाले समूह मजलिस में कानूनी मामलों की संयोजक ऑद्रे डी मेलो कहती हैं कंपनियों में यौन उत्पीडऩ समितियों के सदस्य अक्सर अपने वरिष्ठों के खिलाफ फैसला देने से कतराते हैं। यही वजह है कि इन समितियों के सदस्य अक्सर बड़े सबूतों की मांग करते हैं जो ऐसे मामलों में पेश किया जाना आसान नहीं होता है। उच्चतम न्यायालय की अधिवक्ता पिंकी आनंद कहती हैं कि कंपनियां ऐसे मामले अपने यहां ही सुलझा लेने की कोशिश करती हैं और कंपनी की साख पर बट्टा न लगे इसके लिए वे कोशिश करती हैं कि ऐसे मामले अदालत न पहुंच पाएं।
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जब कभी कोई कार्रवाई की भी जाती है तो वह औपचारिकता मात्र ही होती है। मुंबई में एक टेलीविजन चैनल के लिए काम करने वाली अदिति कुमार (परिवर्तित नाम) के साथ ऑफिस की एक पार्टी में उनके ही कनिष्ठ सहकर्मी ने सबके सामने छेडख़ानी की। महिला ने यह मामला प्रशासन के पास उठाने का फैसला किया। कुमार को याद है, 'मेरे पुरुष सहकर्मियों ने मुझे धमकी दी कि अगर मैंने शिकायत की तो मुझे समस्याएं पैदा करने वाली कर्मचारी के तौर पर अलग-थलग कर दिया जाएगा।' कुछ ही दिनों बाद कंपनी की एक वरिष्ठï महिला मानव संसाधन अधिकारी ने कुमार से उस रात की हर छोटी से छोटी बात का जिक्र करने को कहा। यह पूरी पूछताछ कुमार को असहज करने के लिए काफी थी।  कुमार ने बताया, 'उन्होंने मुझसे यह तक पूछा कि मैंने उस रात क्या पहन रखा था और कहीं मेरे उस व्यक्ति के साथ कोई संबंध तो नहीं हैं, ऐसे जैसे इससे उस व्यक्ति को उस घटना का लाइसेंस मिल जाता।' उस व्यक्ति को नौकरी से निकाला नहीं गया बल्कि उनसे इस्तीफा सौंपने को कहा गया। कुछ सालों बाद एक दूसरे चैनल में जब कुमार ने अपने बॉस की असहज और भद्दी टिप्पणियों पर एतराज जताया तो इसका असर कुमार के काम पर नजर आने लगा। उनके बॉस ने उनका भुगतान देर से करना शुरू कर दिया, उन्हें महत्त्वपूर्ण बैठकों से दूर रखा जाने लगा। कुमार के पास नौकरी छोडऩे के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं था।

Keyword: Women, Employee, Security,
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