| सामंती लोकतंत्र! | | संपादकीय / September 21, 2012 | | | | |
करीब पांच सौ साल पहले जब इंगलैंड में सामंती शासन था तो कुलीनों की निजी सेना और पोशाक हुआ करती थीं। युद्घ के वक्त सम्राट धन और घुड़सवार सैनिकों के लिए उन्हीं पर आश्रित रहता था। सन 1485 में जब हेनरी सप्तम सत्ता में आया तो उसने यह सब बदल डाला। उसने विभिन्न सामंती शासकों के बीच 30 साल से अधिक समय से चल रहे युद्घ को समाप्त कर दिया। उसने निजी सेनाओं का खात्मा किया और उभरते मध्य वर्ग तथा कारोबारी समुदाय का समर्थन हासिल कर कुलीनों पर अपनी निर्भरता को कम किया। इस तरह उसने एक आधुनिक राष्ट्र की बुनियाद रखी। समकालीन भारत में भी कुछ ऐसा ही किए जाने की आवश्यकता है। यह तुलना तब स्पष्टï हो जाती है जब हम देखते हैं कि राज्यों के दिग्गज अतीत के कुलीनों की तरह व्यवहार कर रहे हैं। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी, बिहार में नीतीश कुमार, उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव, तमिलनाडु में जयललिता, गुजरात में नरेंद्र मोदी और मुंबई में बाल ठाकरे आदि इसके उदाहरण हैं। इनमें से हरेक के पास अपनी घुड़सवार सेना (पार्टियों के सांसद) और वर्दी है। दिल्ली में उनकी ताकत इस बात से तय होती है कि उनके पास कितने सांसद हैं। यह सामंतों के बीच हुए उसी पुराने युद्घ का आजकल का स्वरूप है।
कांग्रेस जहां हाउस ऑफ लैंकास्टर की भूमिका में है वहीं भाजपा प्रतिद्वंद्वी हाउस ऑफ यॉर्क की भूमिका में है। जब तक सम्राट इन कुलीनों पर निर्भर है (जिनमें से हरेक के पास अपने-अपने क्षेत्र में स्वायत्त सत्ता है) तब तक कोई केंद्रीय शक्ति मुखर नहीं हो सकती है। पुराने जमाने में इंगलैंड की निजी सेनाएं लूट मार में दक्ष हुआ करती थीं। ठीक उसी तरह हमारे आज के कुलीनों के कुछ घुड़सवार हत्या और बलात्कार के आरोपों में घिरे हुए हैं। वे अधिकारियों को 'लाइन पर लाने' के लिए मनचाहे तरीके से उनका स्थानांतरण करा देते हैं और सवाल पूछने वालों, यहां तक कि कार्टून बनाने वालों तक को स्वेच्छाचारी ढंग से गिरफ्तार करवा देते हैं। इसके अलावा और क्या-क्या होता है, आप जानते ही हैं। दिल्ली का सम्राट कुछ नहीं करता है क्योंकि अगर कुलीन अपना समर्थन वापस लेते हैं तो उसे गद्दी गंवानी पड़ेगी। आलम यह है कि उन कुलीनों के इलाके में सम्राट के दल का स्थानीय स्तर पर कोई वजूद ही नहीं है।
इसलिए उन्हें चुनौती भी नहीं दी जा सकती। जाहिर है, अगर हर राष्ट्रीय मुद्दा यूं ही कुलीनों के पास बंधक रहा और उनकी सहमति उस पर आवश्यक रही तो देश का शासन कैसे चलेगा? अब वे यहां तक चाहते हैं कि किसी राष्ट्राध्यक्ष की भारत यात्रा में भी उनकी सहमति ली जाए! इसका एक स्पष्ट तरीका है कुलीनों के घरेलू मैदान पर ही उनकी सत्ता को चुनौती देना लेकिन न तो सम्राट का दल और न ही मुख्य विपक्षी दल इस काम के योग्य नजर आ रहा है। दूसरा तरीका है उन कायदों को ही बदल दिया जाए जिनका इस्तेमाल करके राजा को सत्ताच्युत किया जा सकता है। जर्मनी की तर्ज पर पुराने शासक के जाने के पहले संसद में इस बात पर सहमति बने कि नया शासक कौन होगा। तीसरा तरीका होगा संविधान में संशोधन करना ताकि वे कुलीन जो एक शासक के काल में उसके साथ जुड़े रहे हों वे मध्यावधि में उसका साथ न छोड़े। अगर वे ऐसा करें तो उनके सिपहसालार (सांसद) छीन लिए जाएं।
हेनरी सप्तम ने लगभग ऐसा ही किया था जब उसने सभी कुलीनों को संसद के प्रति वफादारी की एक नई शपथ दिलाई थी। जाहिर है राष्ट्रीय राजनीतिक ढांचे को और अधिक सुसंगत बनाया जा सकेगा। समस्या यह है कि संवैधानिक बदलाव (जो ऊपर सुझाए गए तीन में से दो समाधानों के लिए आवश्यक है) के लिए भी उन्हीं सामंतों के सहयोग की आवश्यकता होगी जो केंद्र के तमाम मामलों में वीटो का अधिकार रखते हैं। हालांकि यह कोई ऐसी बाधा नहीं है जिसे हल नहीं किया जा सके क्योंकि इसमें सत्ता पक्ष और विपक्ष के समान हित जुड़े हुए हैं। अगर वे अपनी ताकत को एकजुट करें और कुछ अन्य लोगों को साथ ले सकें तो दो तिहाई बहुमत से इस काम को अंजाम दिया जा सकता है। हेनरी सप्तम (जो लैंकास्टर समूह से था) ने तो हाउस ऑफ यॉर्क की एक उत्तराधिकारी से विवाह कर सफलता हासिल कर ली थी। क्या हम भी ऐसी ही किसी घटना के बारे में सोच सकते हैं?
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