| मिलीभगत से जमीन कब्जाने के एक नहीं हजारों हैं बहाने | | अदालती आईना | | | एम जे एंटनी / September 21, 2012 | | | | |
एक तरफ जहां संसद की कार्यवाही में जब-तब गतिरोध आता रहता है, वहीं दूसरी तरफ हमारे पास जमीन अधिग्रहण अधिनियम,1894 सहित दूसरे कई बरसों पुराने कानूनों में बदलाव के लिए इंतजार करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है। औपनिवेशिक कानून की जगह लेने वाला विधेयक वर्षों से राजनीति और कुतर्कों के जाल में उलझा हुआ है। सार्वजनिक मकसद के लिए उपयोग की तुलना में अक्सर पुराने प्रावधानों का गलत इस्तेमाल होता है। इस मामले में उच्चतम न्यायालय का एक ताजा फैसला (पतासी देवी बनाम हरियाणा राज्य) काबिलेगौर है।
हरियाणा सरकार ने अपने खुद के वैधानिक निकाय द्वारा रोहतक जिले में आवासीय कॉलोनी विकसित करने के लिए जमीन अधिग्रहण किया। उस जगह एक महिला ने जमीन के छोटे से टुकड़े पर अपना मकान बना रखा था जो अधिग्रहण की प्रक्रिया के दौरान उसके हाथ से निकल गया। उन्होंने इसके खिलाफ पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय में गुहार लगाई। मगर अदालत ने इस तकनीकी आधार पर उनकी याचिका खारिज कर दी कि यह याचिका अधिनिर्णय के बाद दायर की गई।
मगर उच्चतम न्यायालय में जब यह मामला आया तो सर्वोच्च अदालत ने न केवल उच्च न्यायालय को इस मामले में गलत ठहराया कि उसने मामले को सही पैमाने पर नहीं परखा बल्कि सरकार को भी दोषी ठहराया कि उसने एक निजी कंपनी के हित में काम किया। माामले की तह में जाते हुए उच्चतम न्यायालय ने जमीन अधिग्रहण पर यह टिप्पणी की, 'राज्य सरकार की सत्ता के ताकत के जरिये हुई यह कपटपूर्ण कवायद गैरकानूनी है। इसमें कोई शक नहीं कि अधिसूचना में कहा गया कि जमीन सार्वजनिक मकसद के लिए अधिग्रहीत की जा रही है, लेकिन इस अधिग्रहण का असल मकसद भवन निर्माता को फायदा पहुंचाना था।
पतासी देवी की जमीन उस जमीन से घिरी हुई थी जिस पर कंपनी 'सन सिटी' का निर्माण कर रही थी। शुरुआत में सरकार ने उसके चारों तरफ की जमीन खरीदी और उसे इस कंपनी को हस्तांतरित किया।' फैसले में कहा गया, 'सार्वजनिक मकसद के लिए जमीन अधिग्रहण करने के नाम पर राज्य सरकार ने निजी कंपनी को जमीन देने के लिए अधिग्रहण किया। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो निजी कंपनी को जमीन उपलब्ध कराने के लिए राज्य सरकार ने जमीन अधिग्रहण अधिनियम के प्रावधान का बेजा इस्तेमाल किया।' इस बीच अदालत ने सरकार को अधिग्रहण प्रक्रिया में 'पक्षपात करने का दोषी' करार दिया। न्यायाधीशों ने कहा कि एक अधिकारी ने हद करते हुए 'दस्तावेज पर अंकित कुछ बातों को मिटाने के लिए व्हाइट फ्लूइड तक इस्तेमाल किया।' उनके मुताबिक इसके पीछे अधिकारी की यही मंशा रही होगी कि उच्चतम न्यायालय को सच पता न चले।
जमीन अधिग्रहण का यह कोई पहला मामला नहीं है जिसमें उच्चतम न्यायालय ने अनैतिक चलन पर अफसोस जाहिर किया हो। इसकी कई और मिसाले हैं। दो साल पहले जयपुर विकास प्राधिकरण बनाम महेश शर्मा मामले में दिए गए फैसले में अदालत ने कहा था, 'तथ्यों को जोड़कर देखने पर यही संकेत मिलेगा कि कुछ अधिकारियों और निजी फर्मों की संाठगांठ से सरकार के हाथ से कितनी जमीन और धन निकल गया।'
उसी साल एक सरकारी नवरत्न कंपनी से जुड़े मामले (महानदी कोलफील्ड्स बनाम माताई उरांव) को इस बात की 'नजीर' बताया गया कि कैसे सरकार और उसके विभाग 'कानून के तहत अपने सबसे बुनियादी कत्र्तव्य' का उल्लंघन करते हैं। सरकारी कंपनी ने सुरेंद्रगढ़ के किसानों को 23 साल तक मुआवजा देने के दावे को मानने से इनकार किया और जब तक अदालत ने दखल नहीं दिया तब तक कंपनी ने एक भी पैसा नहीं दिया।
इसमें सबसे बुरे मामलों में से एक था पंजाब राज्य बनाम गुरदयाल सिंह का जिसमें एक पूर्व मंत्री ने थोक बाजार बनाने के लिए कुछ लोगों की जमीन लेकर उन्हें नाराज कर दिया। हालांकि निचली अदालतों में वह लगातार हारते रहे फिर भी उन्होंने इस मामले को उच्चतम न्यायालय में ले जाने के लिए राज्य सरकार को राजी कर लिया। उच्चतम न्यायालय ने यह संज्ञान लेते हुए कि आदमी जितना छोटा हो, मामला उतना ही गंभीर है और इस तरह जमीन मालिक के हितों की रक्षा की। हरियाणा राज्य बनाम हरि राम मामले में उच्चतम न्यायालय ने कहा, 'अगर यह अदालत सरकार के गलत कदम को दुरुस्त नहीं करती तो शायद नागरिकों में यही धारणा बनेगी कि राज्य सरकार में सही आदमी के साथ संपर्क ही फायदे का सौदा है और न्यायिक प्रक्रिया असरदार नहीं है।'
यहां एक फैसले से लिए गए कुछ बिंदु हैं जिनके अनसार अधिकारी और नेता जमीन मालिकों को एक छोर से दूसरे तक में दौड़ाने और अपनी ऊर्जा और धन बर्बाद करने पर कैसे मजबूर करते हैं। पहला तो यही कि कलेक्टर जमीन की कीमत बहुत ही कम तय करता है। इसके बाद जो भी कीमत या मुआवजा तय होता है, उसे लंबे समय तक अपने पास ही रखा जाता है ताकि जमीन मालिक अधिक मुआवजे के लिए अदालत में अर्जी न लगा पाए। तब तक उस मुआवजे को चुनौती देने की अवधि खत्म हो जाती है। भगवान दास बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में दिए गए फैसले में न्यायाधीशों ने उत्पीडऩ के इन तरीकों का जिक्र किया। ऐसे मामलों की गलत व्याख्या की गई तो जमीन मालिकों के दावों को खारिज करने के और तरीके मिल जाएंगे।
कानून में स्पष्टता की हालत वाकई अच्छी नहीं है। मामले के गुण-दोष देखे बगैर निचली अदालतों का लापरवाह रवैया अपनाना वाकई खराब है। हर कोई उच्चतम न्यायालय का रुख नहीं कर सकता और न ही कोई और दांव ले सकता है। लगता है हमारे विधि निर्माता घोटालों और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को लेकर मच रहे शोर के बीच जमीन अधिग्रहण विधेयक को लगभग भूल ही गए हैं। शायद इसीलिए अधिग्रहीत जमीन के मामलों में गड़बड़ी होती जा रही है।
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