| 'राजनीतिक भंवर में फंसे सुधार विधेयक' | | जारी रह सकते हैं गैर विधायी सुधार : विशेषज्ञ | | | दिलाशा सेठ / नई दिल्ली September 19, 2012 | | | | |
सुधार विधेयकों का भाग्य अब देश में चल रहे राजनीतिक तूफान में उलझ गया है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि गैर विधायी सुधार संबंधी उपाय आगे जारी रह सकते हैं। पेंशन सुधार, भूमि अधिग्रहण, अग्रिम अनुबंध, कंपनी, बैंक, बीमा, प्रत्यक्ष कर और अप्रत्यक्ष कर सहित कम से कम आठ विधेयक ऐसे हैं, जिन्हें या संसद में पेश किया जाना है या मंजूरी दी जानी है। दो दिन पहले वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने बैंकिंग, बीमा और पेंशन विधेयकों को पास कराने के लिए संसद की स्थायी समिति के विचार समायोजित करने के प्रति उत्सुकता दिखाई थी। हालांकि ऐसा अब संभव नहीं दिखता है।
जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के प्रोफेसर रवि श्रीवास्तव ने कहा, 'अभी तक इस संबंध में कोई सहमति बनती नहीं दिखती है। इसलिए जल्द इन विधेयकों को मंजूरी मिलने की उम्मीद कम ही दिखती है।' उन्होंने कहा कि स्पष्ट रूप से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार को कुछ भी करने का मौका नहीं देना चाहती है। विशेषज्ञों ने कहा कि भले ही भाजपा ने पेंशन फंड विनियामक और विकास प्राधिकरण (पीएफआरडीए) को समर्थन दिया है, लेकिन अब राजनीतिक हालात बिल्कुल बदल गए हैं।
इस विधेयक पर सरकार और वित्त पर बनी स्थायी समिति के बीच काफी मतभेद हैं, जिसकी अगुआई भाजपा नेता यशवंत सिन्हा कर रहे हैं। इनमें बीमा विधेयक भी शामिल है जिसमें निजी बीमा कंपनियों में एफडीआई सीमा को 26 फीसदी से बढ़ाकर 49 फीसदी करने का प्रस्ताव है। पेंशन विधेयक में बीमा कानून की तरह एफडीआई सीमा लागू की जा सकती है। वित्त वर्ष 2012-13 की पहली तिमाही के दौरान एफडीआई गिरकर 67 फीसदी रह गया। इस वित्त वर्ष के पहले तीन महीनों में एफडीआई गिरकर 4.4 अरब डॉलर रह गया, जबकि बीते साल इसी अवधि में यह आंकड़ा 13.4 अरब डॉलर था।
दो कर कानूनों वस्तु एवं सेवा कर और प्रत्यक्ष कर संहिता के लिए भी भाजपा का सहयोग जरूरी होगा। इसके अलावा जीएसटी को लागू कराने के लिए संवैधानिक संशोधन विधेयक के वास्ते कम से कम आधे राज्यों का समर्थन जरूरी होगा। जीएसटी पर चिदंबरम ने हाल में कहा था कि यदि राज्य सरकारों के साथ समझौता हो जाता है तो बाकी औपचारिकताओं में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा। बहरहाल सरकार को इस मामले में ज्यादा समस्या नहीं हो सकती, क्योंकि 29 राज्यों में 13 राज्यों में संप्रग की सरकार है। हालांकि पहली और बड़ी समस्या संसद में विधेयक को मंजूर कराना है। इसके लिए दोनों सदनों में दो तिहाई सदस्यों का समर्थन जरूरी होता है। एक विशेषज्ञ ने कहा कि जहां कांग्रेस के रणनीतिकारों को सामान्य बहुमत जुटाना मुश्किल हो रहा है, ऐसे में दो तिहाई बहुमत की बात कौन कर सकता है।
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