| चुनावी राज्यों में रिटेल पर दाव नहीं लगाएंगे विदेशी! | | निवेदिता मुखर्जी / नई दिल्ली September 19, 2012 | | | | |
केंद्र सरकार ने बहुब्रांड खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) को मंजूरी देते हुए राज्यों को यह अधिकार दिया है चाहे तो वे अपने राज्य में इस पर रोक लगा सकते हैं। उद्योग प्रतिनिधियों और विश्लेषकों का मानना है कि इससे भारत में विदेशी निवेशकों की रफ्तार ढीली पड़ सकती है।
विश्लेषकों ने कहा कि अभी यदि कोई राज्य खुदरा क्षेत्र में एफडीआई का पक्षधर है, लेकिन कुछ ही समय बाद होने वाले चुनाव के बाद क्या स्थिति रहेगी। क्या उस समय सत्ता परिवर्तन के साथ ही खुदरा कंपनियों को अपनी दुकान बंद करनी पड़ेंगी? क्या इससे कानून व्यवस्था की स्थिति नहीं बिगड़ेगी। विश्लेषकों का कहना है कि इन्हीं प्रश्नों के कारण विदेशी निवेशकों का उत्साह ठंडा पड़ सकता है।
टेक्नोपार्क एडवाइजर्स के चेयरमैन अरविंद सिंघल ने बिजनेस स्टैंडर्ड से कहा, 'विदेशी खुदरा कंपनियों की दृष्टिï से इन कानूनों के तहत निवेश करना बेवकूफी होगी। इससे पहले से कारोबार कर रही कंपनियों की चिंताएं भी काफी बढ़ जाएंगी।' उन्होंने कहा कि विदेशी निवेशकों को राज्य सरकारों की दया पर छोड़ दिया गया है। सिंघल ने कहा, 'यह खुदरा शृंखलाओं द्वारा महत्त्वपूर्ण कारोबारी निर्णय लेते समय निर्णय को सीमित करने वाला कारक है।'
अभी से लेकर 2014 के अंत तक 16 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में चुनाव होने हैं। ऐसे में खुदरा शृंखलाओं को भारत के लिए कोई योजना बनाने से पहले राज्यों के राजनैतिक रुख का आकलन करना होगा। फिलहाल केवल 10 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने ही बहुब्रांड खुदरा क्षेत्र में एफडीआई का समर्थन किया है। एफडीआई का समर्थन करने वाले राज्यों में दिल्ली, महाराष्ट्र, हरियाणा, राजस्थान, उत्तराखंड, आंध्र प्रदेश, असम, मणिपुर, दमन व दीव और दादरा व नागर हवेली शामिल हैं।
जेपी मॉर्गन की एक विश्लेषण रिपोर्ट में कहा गया है कि बहुब्रांड खुदरा क्षेत्र में एफडीआई की नीति पैंटालून रिटेल सहित मौजूदा खुदरा कंपनियों के लिए 'सकारात्मक धारणा' है। लेकिन रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि राज्यों को इस पर रोक लगाने का अधिकार दिए जाने के कारण कंपननियां एक अलग गठजोड़ या साझेदारी ढांचे पर विचार कर सकती हैं।
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