| सरकार बचाने की जुगत में जुटी कांग्रेस | | ताजा राजनीतिक घटनाक्रम को देखते हुए कांग्रेस की बढ़ी मुश्किलें, एकजुट होकर संकट से उबरने की कोशिश | | | बीएस संवाददाता / नई दिल्ली September 19, 2012 | | | | |
इस बात में कोई संदेह नहीं है कि कांग्रेस पूरी तरह से हिल गई है। इसका कारण केवल यह नहीं है कि तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार से समर्थन वापस ले लिया है बल्कि इससे भी कि इसका कितना व्यापक प्रभाव पडऩे वाला है।
कांग्रेस के एक मुख्यमंत्री कहते हैं, 'यदि एक ताजा सर्वे में कही गई बात सही है और कांग्रेस यदि सत्ता से बाहर हो जाती है तो सभी लोगों को यह तय करना होगा कि वह किस तरह के भारत में रहना पसंद करेंगे। ऐसा लग रहा है कि यहां हर कोई एक दूसरे के विरोध में खड़े हैं और हमारी नीतियां दिशाहीन लग रही है। ऐसें में क्या सुधारों को मदद मिलेगी? या फिर क्या भारत का भला होगा?'
ऐसा हमेशा देखा गया है कि जब भी कांग्रेस पर संकट आता है, पार्टी के तमाम नेता इससे उबरने में एकजुट होकर लग जाते हैं। बातचीत की प्रक्रिया, मनाने और फिर समझौते के प्रयास तेज हो जाते हैं। वहीं सरकार, ज्यादातर सांसद और मंत्री पूरी तरह से आश्वस्त रहते हैं और संसद में किसी भी संभावित स्थिति का सामना करने के लिए तैयार रहते हैं।
पार्टी की कई तरह की पीड़ा है। इस साल नवंबर में गुजरात में होने वाले विधानसभा चुनाव में पार्टी को हार की आशंका है। राष्टï्रपति चुनाव में हुए फायदे को वह भूल गई है। उसने उस समय सहयोगी गंवाने के बजाय राष्टï्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) में भी सेंधमारी की थी। एक मुख्यमंत्री ने कहा कि सहयोगी दलों के सामने झुककर और अपनी विश्वसनीयता गंवाकर तमाम समझौते किए गए, जिससे पार्टी को लगता था कि वह संसद के सदन में मजबूत हो जाएगी, लेकिन इसने कांग्रेस के रुख को कमजोर किया है। दिलचस्प है कि कांग्रेस अपने सहयोगी दलों को देख रही है और बचाव की कोई कोशिश नहीं कर रही है।
संकट के दो दिनों के दौरान सिर्फ आज कृषि मंत्री शरद पवार सामने आए और उन्होंने खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के फैसले का बचाव किया। वह कृषि मंत्री हैं और बैकएंड निवेश से इससे कृषि क्षेत्र को फायदा होगा, जिसे देखते हुए नीति बनाई गई है। कांग्रेस भी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) जैसे सहयोगियों को लेकर थोड़ी असहज है, जिसके चलते कृषि विपणन सुधारों का मसला अटका पड़ा है। वहीं दूसरी ओर राष्ट्रपति चुनाव में पवार ने ममता बनर्जी को मौन समर्थन देने का काम किया। जब ममता राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी के रूप में प्रणव मुखर्जी का विरोध कर रही थीं, तब भी संप्रग के जिम्मेदार सहयोगियों के बीच चर्चा हुई थी।
कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या उत्तर प्रदेश है। यदि वह समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव के साथ किसी तरह का समझौता करती है और उसके साथ जाती है तो इससे उसे प्रदेश की राजनीति में कभी भी उभरने का मौका नहीं मिलेगा। यानी कांग्रेस का जो हाल तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में है वही हाल उत्तर प्रदेश में भी हो जाएगा। अगर वह ऐसा नहीं करती है कि उसे केंद्र में मुलायम का समर्थन नहीं मिलेगा और उसे केंद्र की सत्ता गंवानी पड़ सकती है। कांग्रेस प्रबंधन के लिए एक और दुखद बात यह है कि इस पूरे घटनाक्रम से कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी पूरी तरह से अदृश्य हो गए हैं। ऐसे में संकट की घड़ी में पार्टी को उबारने और आगे पार्टी का नेतृत्व करने की उनकी क्षमता पर सवाल उठ सकते हैं।
उधर अहमदाबाद में वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा ने कहा, 'हम इस फैसले पर पीछे नहीं हटने जा रहे क्योंकि हम 'रोलबैक' शब्द में यकीन नहीं करते। यह फैसला हर राज्य के साथ विचार विमर्श के बाद किया गया।' उन्होंने यह भी विश्वास जताया कि संप्रग सरकार अपना कार्यकाल पूरा करेगी। उन्होंने कहा, 'मैंने ममता बनर्जी से तीन बार बातचीत की और उन्हें पत्र भेजे जैसा कि मैंने सभी मुख्यमंत्रियों को भी चिट्ठियां लिखी थीं। उसके बाद भी मैंने उनसे बातचीत की।'
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