| एमू ने 'पचाई' गाढ़ी कमाई | | देश भर में पक्षियों के नए कारोबार की भरमार देखी जा रही है और उसमें काफी निवेश हो रहा है लेकिन नियामक इससे बेपरवाह है | | | टी ई नरसिम्हन और एन सुंदरेश सुब्रमण्यन / September 16, 2012 | | | | |
तमिलनाडु में ऑस्ट्रेलिया के पक्षी एमू पर अवैध रूप से भारी निवेश करने का धंधा बड़े जोर-शोर से चलता रहा है। एमू उडऩे में असमर्थ है। एक अनुमान के मुताबिक इस पक्षी पर कम से कम 500 करोड़ रुपये का निवेश किया जा चुका है और अब यह धीरे-धीरे उत्तर भारत के अछूते और नए बाजार में भी अपनी राह बनाने की कोशिश में है।
ये पक्षी बड़ी तादाद में अब पंजाब, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, बंगाल और उड़ीसा जैसी जगहों में देखे जा रहे हैं। वैसे बेंगलूर और महाराष्टï्र के ग्रामीण इलाकों में जहां एमू नए नहीं हैं वहां नए फार्म खुल रहे हैं। नए निवेशकों को इन योजनाओं में निवेश के लिए 'तुरंत अमीर होने' के वादे के साथ लुभाया जा रहा है। जल्दी अमीर होने का यह फलसफा पहले भी आजमाया गया है। बेंगलूर के एक फार्म मालिक आनंद रंगरेज का कहना है, 'हर वक्त जब भी कोई जहाज डूबने लगता है तो वह नए क्षेत्र की ओर बढऩे लगता है। इसी तरह कारवां कई सालों तक बढ़ता रहता है।'
तमिलनाडु में इस घोटाले का खुलासा होने के बाद कई एमू फार्म मालिकों को अपने पैसे गंवाने पड़े। लेकिन हैरानी की बात है कि नियामकों ने इस पर अब तक चुप्पी साध रखी है। चेन्नई में पूर्व वित्तीय सेवाओं से जुड़े पेशेवर और स्वतंत्र सलाहकार आर बालकृष्णन का कहना है, 'भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) और भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) को इसके लिए जवाबदेह होना चाहिए।
अक्सर इस पर पर्दा डाल दिया जाता है क्योंकि इस पर किसी का ध्यान नहीं गया है। इस पर अखबारों में काफी कुछ लिखा जा रहा है। किसी मुद्दे पर ध्यान आकर्षित करने के लिए इससे ज्यादा क्या होना चाहिए।Ó सेबी के एक प्रवक्ता को ईमेल भेजकर यह पूछा गया कि क्या इस पर कोई कार्रवाई की गई है लेकिन इस पर कोई जवाब नहीं मिला। किसी नियामकीय कार्रवाई के बिना एमू फार्मिंग एक बड़ा खतरा है जो राष्टï्रीय स्तर के एक बड़े निवेश घोटाले में तब्दील हो सकता है और जिसमें हजारों करोड़ों रुपये के नुकसान की संभावना होगी।
किसानों का कहना है कि पिछले छह महीने में केवल पंजाब में 150,000 पक्षियों को बेचा गया है। पंजाब के जलालाबाद में गिल एमू फार्म चलाने वाले जसकरण सिंह ने बिजनेस स्टैंडर्ड से कहा कि उनके पास 100 बड़े एमू और 400 चूजे थे। उनका कहना है कि उम्र और आकार के हिसाब से एक जोड़ा 8,000 रुपये से 24,000 रुपये के बीच उपलब्ध है। मुख्यतौर पर मुर्गीपालन कारोबार से जुड़े कुछ अनुभवी खिलाडिय़ों का कहना है कि एमू कारोबार को समझना इतना आसान नहीं है क्योंकि इसमें अलग तरह से कारोबार होता है। देश की सबसे बड़ी पोल्ट्री कंपनी, सुगुना चिकेन जिसका कारोबार 4,200 करोड़ रुपये तक है, उसके अध्यक्ष बी सुंदरराजन का कहना है, 'मैंने 40 से ज्यादा देशों की यात्रा की है और मैंने कहीं भी यह नहीं पाया कि इसका गोश्त खाया जाता हो।'
जब उनसे यह पूछा गया कि क्या एमू की वसा का इस्तेमाल खाद्य तेलों में किया जाता है जिसका दावा एमू फार्म मालिक करते हैं तो इस पर सुंदरराजन का कहना है कि भारत में जानवरों की वसा का इस्तेमाल खाद्य तेल में नहीं किया जाता है। तमिलनाडु के इरोड में एमू पॉन्जी योजना तेज रफ्तार से चलाई जा रही थी, लेकिन सरकारी छापा पडऩे से उसे काफी झटका लगा। जापान में सबसे मशहूर गोश्त के तौर पर एमू का गोश्त बेचा जाता था।
बालकृष्णन ने इस बात पर सहमति जताई, 'मुझे नहीं लगता है कि यहां कोई कारोबारी मॉडल है। एक कारोबारी मॉडल को न्यायसंगत ठहराने लायक एमू के गोश्त की खपत भी नहीं है। यहां सबसे पहले चूजे को बेचा जाता है और जब कोई नया व्यक्ति इस कारोबार में आता है तो वे पुराने व्यक्ति से फिर से चूजे खरीद लेते हैं और उसे किसी और को दे देते हैं।'
एमू फार्म कंपनियों की वेबसाइटों के दावे में भी वह आत्मविश्वास नजर नहीं आता है। उनमें से एक का कहना है कि तीन महीने के एमू पक्षी के 10 जोड़े की कीमत 150,000 रुपये होगी। उन्हें रखने के लिए बाड़ा तैयार करने की लागत 35,000 (एक ही बार) और उनके चारे की लागत 1, 20, 000 रुपये है। वेबसाइट के मुताबिक, 'इस मॉडल परियोजना के मुताबिक एक वक्त का कुल निवेश 305,000 रुपये होगा। इस मॉडल परियोजना से हर साल 300,000 रुपये की आमदनी होगी। आज का बाजार भाव प्रति अंडा 1,500-1,600 रुपये है। यह आमदनी 30 सालों तक बरकरार रहेगी क्योंकि एमू 30 साल से ज्यादा वक्त तक अंडे देगा।Ó जब भी इन फार्मों पर कोई इच्छुक ग्राहक आते हैं तो उन्हें यह आश्वासन दिया जाता है कि अगर वे अपने पैसे वापस चाहते हैं तो फार्म उनके एमू को फिर से खरीद सकते हैं।
एक 39 वर्षीय किसान एस सेल्वन से एक एमू फार्म मालिक ने 6 लाख रुपये के निवेश के लिए संपर्क किया और उन्हें पहले ही साल 2.5 लाख रुपये वापस करने का वादा भी किया। उन्हें यह भी कहा गया कि एमू के गोश्त की कीमत बाजार में 550 रुपये प्रति किलोग्राम है और हरेक अंडे की कीमत 1,200 रुपये है। हालांकि इनमें से कोई भी बात हकीकत नहीं लगती है। नतीजतन सेल्वन उन 25,000 लोगों में शामिल हैं जिन्होंने तमिलनाडु के दक्षिण में हुए इस घोटाले में अपनी पूंजी खोई है।
सेलम और इरोड के जिले में करीब 250 एमू फार्म हैं और इन फार्मों में 15,000 से ज्यादा एमू पक्षी हैं। इन पक्षियों की जिंदगी और उनके भविष्य के बारे में कुछ भी नहीं कहा जा सकता है क्योंकि इन फार्मों के मालिक या तो जेल में हैं या फिर कहीं छिपे फिर रहे हैं।
इरोड जिले में जांच करने वाले इरोड जिला राजस्व अधिकारी एस गणेश का कहना है, 'उन्होंने केवल वित्तीय मुनाफे के बारे में सोचा लेकिन उन्होंने कभी इसकी पड़ताल नहीं की कि उन्हें मुनाफा कैसे मिल सकता था और अब वे अपनी इस गलती की कीमत चुका रहे हैं।' उनके प्राथमिक अनुमान के मुताबिक 25,000 से ज्यादा लोग फार्म मालिकों से धोखा खा चुके हैं और यह घोटाला पहले ही 500 करोड़ रुपये के आंकड़े को पार कर चुका है।
किसान अब एमू के तेल पर अपनी निगाहें जमाए हुए हैं क्योंकि इस पक्षी का मांस मार्जिन देने के लिए पर्याप्त नहीं है। एमू के वसा से निकला हुआ तेल अनुमानत: 300 रुपये प्रति 100 मिलीलीटर के हिसाब से बिकता है। कुछ कंपनियां मसलन नाबार्ड के फंड से चल रही कंपनी, एपी ईएमयू प्रोसेसर और विलायन ने संभवत: एमू तेल के लिए प्रसंस्करण की सुविधा तैयार की है। एमू फार्म का जिक्र 'बैंकों के लिए उपयुक्त मॉडल परियोजना' नाबार्ड वेबसाइट के एनिमल हसबैंडरी के तहत किया गया है।
नाबार्ड के अधिकारियों ने चेन्नई के क्षेत्रीय कार्यालय को पूछताछ के लिए निर्देश दिया। लेकिन चेन्नई के अधिकारियों ने जवाब नहीं दिया। नाबार्ड वेबसाइट के मुताबिक शुतुरमुर्ग परिवार के पक्षियों में यहां केवल एमू ही आते हैं। इसके अलावा दक्षिण अमेरिका से रिन्या, न्यू गिनी से कासोवेरी और न्यूजीलैंड से किवी आते हैं। शुक्र है कि अब तक इन पक्षियों के फार्म के बारे में कोई बात सामने नहीं आई है।
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