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विप्रो: मजबूती के लिए बड़े सौदों की दरकार
शीतल अग्रवाल / मुंबई September 16, 2012

जून जिमाही में अच्छा प्रदर्शन दर्ज करने के बावजूद विप्रो को अपने प्रतिस्पर्धियों से मात खानी पड़ रही है और अब यह शेयर वित्त वर्ष 2013 की अनुमानित कीमत/आय के 14 गुना पर कारोबार कर रहा है। यह उसके 5 वर्ष के ऐतिहासिक एक-वर्षीय औसतन पी/ई मल्टीपल की तुलना में 20 फीसदी नीचे है। हालांकि हालात में जल्द बदलाव आ सकता है, क्योंकि विश्लेषकों को कंपनी की आय वृद्घि में तेजी आने की संभावना दिख रही है।

विश्लेषकों को विप्रो के राजस्व में इस वित्त वर्ष में 17 फीसदी तक की वृद्घि का अनुमान है जो काफी हद तक उसके वित्त वर्ष 2012 के प्रदर्शन के अनुरूप है। हालांकि मुनाफे में 14 फीसदी तक का इजाफा होने की संभावना है जो वित्त वर्ष 2012 की तुलना में अच्छे सुधार को दर्शाता है। वित्त वर्ष 2014 में आय में 17 फीसदी तक का इजाफा होने की संभावना है। लागत किफायत के लिए कंपनी के निरंतर प्रयासों की वजह से उसका एबिटा मार्जिन वित्त वर्ष 2013 और वित्त वर्ष 2014 में 40-45 आधार अंक तक बढऩे का अनुमान है।

ज्यादातर विश्लेषकों का मानना है कि कंपनी इस वित्त वर्ष में अपने प्रतिस्पर्धियों के साथ मुकाबला करने में सफल रहेगी, क्योंकि बिक्री और विपणन गतिविधियों में उसके प्रमुख निवेश का लाभ मिलना शुरू हो गया है। आईआईएफएल के विश्लेषक संदीप मुथांगी का मानना है, 'हमें वित्त वर्ष 2013 की दूसरी छमाही में प्रतिस्पर्धियों की तुलना में विप्रो की वृद्घि दर में अस्थिरता में कमी आने की संभावना है। हम 413 रुपये के कीमत लक्ष्य के साथ इस शेयर पर सकारात्मक बने हुए हैं।'

विप्रो पिछले 18 महीनों से पुनर्गठन की कोशिश में लगी हुई है। कंपनी ने 6 वर्टिकलों के बीच अपने व्यवसाय को पुनर्गठित किया है और इसके अनुसार जिम्मेदारियों में भी बदलाव किया है। साथ कंपनी ने मुआवजा और प्रोत्साहन संरचना को भी बेहतर बनाया है। इन सब प्रयासों की वजह कंपनी को अपनी बाजार रणनीति में सुधार लाने में मदद मिली है। विप्रो को इन प्रयासों का शुरुआती लाभ मिलना शुरू हो गया है और उसके मौजूदा 10 करोड़ डॉलर के ग्राहकों में तेजी देखने को मिली है। इस वृद्घि का बड़ा हिस्सा उसके शीर्ष 10 ग्राहकों के शानदार योगदान से जुड़ा हुआ है। जून 2012 की तिमाही में विप्रो का राजस्व 24.4 फीसदी बढ़ कर 10,620 करोड़ रुपये रहा जबकि समायोजित शुद्घ मुनाफा सालाना आधार पर 18.4 फीसदी बढ़ (तिमाही आधार ये वृद्घि 8 फीसदी और 6.7 फीसदी थी) कर 1,580 करोड़ रुपये रहा।

अभी भी कंपनी को पिछली कुछ तिमाहियों से राजस्व वृद्घि के संदर्भ में अपने प्रतिस्पर्धियों से पिछडऩा पड़ रहा है। इसकी प्रमुख वजह विप्रो को मिलने वाले बड़े सौदों की सुस्त रफ्तार। कंपनी बिक्री और विपणन गतिविधियों में लगातार अपने निवेश में इजाफा कर रही है जिसमें दीर्घावधि में तेजी देखने को मिलेगी। विप्रो का बिक्री और विपणन खर्च (राजस्व के प्रतिशत के रूप में) मार्च 2011 से 130 आधार अंक तक बढ़ा है और अब यह 6.4 फीसदी पर है। बड़े सौदों में विप्रो की भागीदारी में अपेक्षित सुधार आया है और कंपनी पुनर्गठन से पहले की तुलना में अधिक सौदों के संदर्भ में कंपनियों की निर्णायक संक्षिप्त सूची में शामिल है। विश्लेषकों का मानना है कि बड़े सौदों के लिए कंपनी की कोशिशों का फल जल्द ही मिलने की संभावना है।

एचएसबीसी ग्लोबल के योगेश अग्रवाल और विवेक गेड्डा कहते हैं, 'हम बिक्री और क्लाइंट भागीदारों में लगातार निवेश में विश्वास रखते हैं और वित्त वर्ष 2013 की दूसरी तिमाही से सौदे मिलने की गति में सुधार आएगा और बेहतर वृद्घि के संदर्भ में इसका परिणाम वित्त वर्ष 2013 की दूसरी छमाही में दिखने की संभावना है।' दूसरी तरफ सौदों के लिए वित्त की धीमी व्यवस्था और कड़ी प्रतिस्पर्धा की वजह से खराब हो रहे परिदृश्य से कंपनी के लिए चुनौती बरकरार रहेगी।

भविष्य में विप्रो ने विकास की रफ्तार मजबूत बनाए जाने के लिए बीएफएसआई, ऊर्जा और यूटीलिटी, रिटेल और लाइफसाइंसेज एवं हेल्थकेयर  पर ध्यान केंद्रित करने की योजना बनाई है। जहां बीएफएसआई में मांग धीमी बनी रहेगी वहीं अन्य वर्टिकलों द्वारा प्रौद्योगिकी खर्च में अच्छी वृद्घि दर्ज किए जाने की संभावना है। 2011 में अमेरिका स्थित एसएआईसी के अधिग्रहण से विप्रो को ऊर्जा और यूटीलिटी व्यवसायों में अपनी स्थिति मजबूत बनाने में मदद मिली है जिसका उसके राजस्व में लगभग 14 फीसदी का योगदान है।

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