| कब खरीदें अपने सपनों का घर | | बैंक और बिल्डर ग्राहकों को लुभाने के लिए तमाम तरह की छूट दे रहे हैं, लेकिन थोड़ा और धैर्य दिखाना आपके लिए हो सकता है फायदेमंद | | | अमर पंडित / मुंबई September 16, 2012 | | | | |
रियल एस्टेट की कीमतों में तेज गिरावट को स्पष्ट कर पाना काफी मुश्किल है। परंपरागत तर्क यही रहा है कि अर्थव्यवस्था में मंदी आने और बिक्री नहीं होने से जायदाद की कीमतें कम होती हैं। लेकि न दो साल की मंदी के बाद भी रियल एस्टेट की कीमतें कम नहीं हुई हैं, लिहाजा ग्राहक दूरी बरत रहे हैं। त्योहार शुरू होने के साथ ही बैंक और बिल्डर दोनों ग्राहकों को लुभाने के प्रयासों में जुट गए हैं। बैंकों ने जहां आवास ऋण पर ब्याज दरें कम करने की घोषणा की है वहीं बिल्डर ग्राहकों को छूट की पेशकश कर रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या ये सारी चीजें पर्याप्त हैं? जवाब है नहीं और इसकी वजह भी है। हालांकि भारतीय रिजर्व बैंक ने अप्रैल के बाद से मुख्य दरों में कमी नहीं की है लेकिन अगले छह महीने या इससे कुछ अधिक समय में दरें कम होंगी। इसकी भी संभावना है कि बैंक ब्याज दरों में कमी कर मांग बढ़ाएंगे और ऐसा भी हो सकता है कि अगले एक से दो साल में दरें दहाई से नीचे रह सकती हैं।
इससे बचत को बढ़ावा मिलेगा और जाहिर है, खरीदारी क्षमता भी बढ़ेगी। 90 लाख रुपये के ऋण पर 1 प्रतिशत ब्याज कम होने से 20 साल की अवधि वाले ऋण पर 15 लाख रुपये की बचत हो सकती है। मौजूदा ब्याज दर 10.5 प्रतिशत है। अगर आप 9.5 प्रतिशत ब्याज पर आवास ऋण पाते हैं तो जरा सोचिए, आप कितनी बचत कर पाएंगे? जायदाद की कीमतें भी लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर नहीं रह सकती हैं।
अगर आप मकान खरीदने के अच्छे मौकों से चूक गए हैं तो पछतावा नहीं करें, क्योंकि आने वाले समय में कई मौके आएंगे। चाहे मकान खरीदना हो या निवेश हो, इनके लिए कोई भी कीमत अदा करना तर्कसंगत नहीं है। अगर आप 1 करोड़ रुपये का मकान खरीदते हैं तो भी कीमत 10 प्रतिशत कम होने से 10 लाख रुपये की मूल रकम और ब्याज के संदर्भ में कई लाख रु पये की बचत होगी। इससे मैं इस नतीजे पर पहुंचता हूं कि रियल एस्टेट की खरीदारी समय देख कर करनी चाहिए।
शेयर बाजार तो हरेक सेकंड हिचकोले खाता रहता है, इसलिए यहां निवेश के सही समय के बारे में कुछ कहना मुमकिन नहीं है, लेकिन रियल एस्टेट बाजार के साथ ऐसी बात नहीं है। मिसाल के तौर पर 1997-2006 मकान खरीदने के लिए अनुकूल था लेकिन कई लोग 2003 तक मकान खरीदने से दूर रहे। 2003 से रियल एस्टेट में लोगों के निवेश का रु झान बढ़ा। जब भी आसान तरीके से लोग मुनाफा कमाते हैं तो बाकी लोगों की भी ऐसा करने में रुचि बढ़ती है। किसी क्षेत्र में कृत्रिम तेजी ऐसी ही आती है और रियल एस्टेट क्षेत्र इससे अलग नहीं है। अक्टूबर 2007 में रियल एस्टेट में तेजी सर्वोच्च स्तर पर पहुंच गई थी हालांकि बिल्डर सहित कई लोग सितंबर 2008 तक इस बात को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे। हालांकि मार्च 2009 और जुलाई 2009 के बीच कई बिल्डरों ने छूट देने का सिलसिला शुरू कर दिया।
यहां तक कि सेकंडरी मार्केट (दूसरी बिक्री) में भी कीमतें कम हो गई थीं और मकान दिलचस्प दामों पर उपलब्ध थे। मई 2009 में शेयर बाजार के पटरी पर आने के बाद रियल एस्टेट की कीमतेंएक बार फिर जरूरतमंद लोगों की पहुंच से दूर हो गईं। ऊंची ब्याज दरें भी मकान खरीदने की चाह रखने वाले लोगों के लिए बाधा होती है। ब्याज दरें ऊपर जाने के साथ ही कीमतें भी आसमान छूने लगी हैं और लेन-देन पिछले चार साल के निम्रतम स्तर पर है। मकान खरीदार और बिल्डर दोनों फिलहाल इंतजार करने की हालत में दिखाई दे रहे हैं।
अगर आप इस समय मकान खरीदने के इच्छुक हैं तो अच्छा सौदा हासिल करने की पूरी कोशिश करें। आपके पास अगर अच्छी मात्रा में नकदी है तो अच्छा सौदा कर पाने में सक्षम होंगे। ऐसे मकान की तलाश करें जिनका निर्माण पूरा हो गया है या अगले कुछ महीने में हो जाएगा। आए दिन हम देख रहे हैं कि नकदी की कमी और अधिक कर्ज के कारण परियोजनाएं समय पर पूरी नहीं हो पा रही हैं। कुछ परियोजनाएं तो बीच में रोकी जा रहीं हैं।
मुंबई जैसे बड़े शहरों में नगर निगम की हरी झंडी नहीं मिलने के कारण परियोजनाएं रुकी पड़ी हैं। यह देखकर काफी हैरत होती है कि लोग 2016-2018 में पूरी होने वाली परियोजनाएं भी खरीद रहे हैं। इसके पीछे जो कारण बताए जा रहे हैं वे भी अजीब हैं जैसे बिल्डर बाजार मूल्य पर 15 प्रतिशत की छूट दे रहे हैं या बाद में मकान खरीदने में परेशानी हो सकती है आदि।
किसी परेशानी में घिरने से अच्छा है कि सुरक्षित तरीका अपनाएं। मंदी के समय रियल एस्टेट से बाहर निकलना आसान नहीं होता है। लोग पिछले कुछ महीने से कम कीमतों पर भी मकान बेचना चाह रहे हैं लेकिन उनके लिए ऐसा करना मुश्किल हो रहा है। चूंकि, रियल एस्टेट बाजार में प्रवेश का एक उपयुक्त समय होता है इसलिए इससे बाहर निकलने के लिए तेजी का इंतजार करना चाहिए जबकि खरीदारी ऐसे समय में करें जब कीमतें और ब्याज दरें दोनों कम होती हैं।
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