निर्यातकों को बासमती के निर्यात में उछाल की उम्मीद
कोमल अमित गेरा / चंडीगढ़ August 19, 2012
चावल के निर्यात में सक्रिय कंपनियां मसलन सतनाम ओवरसीज लिमिटेड (कोहिनूर ब्रांड चावल) और एल टी ओवरसीज (दावत ब्रांड) इस सीजन में बेहतर प्रदर्शन को लेकर आशान्वित हैं। उनका मानना है कि वैश्विक बाजार में ऊंची कीमतें और खरीफ सीजन में धान की बुआई में आई तेजी से निर्यात के लिए चावल की उपलब्धता बेहतर रहेगी।
पिछले साल भारत से 32 लाख टन बासमती का निर्यात हुआ था और इस साल 40 लाख टन बासमती के निर्यात का अनुमान है। निर्यात के लिए बेहतर गुणवत्ता वाले धान के उत्पादन की रणनीति के तहत अमीर चंद एक्सपोट्र्स (एरोप्लेन ब्रांड बासमती चावल के मालिक) ने किसानों के साथ सीधी खरीद की व्यवस्था की है।
सतनाम ओवरसीज लिमिटेड (कोहिनूर ब्रांड चावल) के संयुक्त प्रबंध निदेशक सतनाम अरोड़ा ने कहा कि वैश्विक बाजार में बासमती चावल की मांग बढ़ रही है और भारतीय निर्यातक इस साल इसमें बड़ा हिस्सा हासिल करने के बारे में सोच रहे हैं।
एल टी ओवरसीज लिमिटेड के प्रबंध निदेशक वी के अरोड़ा ने कहा - 'मुझे नहीं लगता कि बासमती की खेती पर बारिश का बहुत असर पड़ेगा। बासमती की विभिन्न किस्मों की कीमतें 1000 डॉलर से 1500 डॉलर प्रति टन है। पिछले साल यह 800 से 900 डॉलर प्रति टन था। ईरान बड़े आयातक के तौर पर सामने आ रहा है और हम अफ्रीकी महाद्वीप में नए बाजार की तलाश कर रहे हैं। बासमती के ब्रांड के तौर पर दावत का प्रदर्शन बेहतर है और हमें निर्यात में 20 फीसदी की उछाल की उम्मीद है।'
अमीर चंद जगदीश कुमार एक्सपोट्र्स लिमिटेड (एरोप्लेन ब्रांड चावल) के चेयरमैन जे के सूरी ने कहा - 'पिछले कुछ सालों में बासमती चावल के प्रति जागरूकता बढ़ी है और इस वजह से मांग में भी उछाल आई है। बासमती के तौर पर पूसा 1121 को स्वीकार किए जाने से बासमती चावल के निर्यात का दायरा बढ़ा है। यहां तक कि अफ्रीकी देश भी अब बासमती चावल की मांग कर रहे हैं।'
उन्होंने कहा - छोटे बाजारों के लिए ऑर्गेनिक चावल की खरीद की खातिर हमने किसानों के साथ पुनर्खरीद की व्यवस्था की है। यह कारोबार इस साल बढऩे की संभावना है क्योंकि अफ्रीका में बासमती के नए बाजार उभर रहे हैं और बासमती चावल के कारोबार को बढऩे में ईरान काफी मदद कर रहा है। वैश्विक बाजार में बासमती की कीमतें 800 से 1400 डॉलर प्रति टन है और ये कीमतें बासमती की किस्मों पर निर्भर करती हैं। अत्यधिक आपूर्ति के चलते पिछले साल इसकी कीमतें 800 डॉलर प्रति टन के आसपास थी।
मॉनसून में देरी और बारिश में कमी के चलते धान के रकबे में गिरावट की संभावना जताई गई थी, लेकिन सरकारी एजेंसियों के ताजा आंकड़ों में कहा गया है कि 233.68 लाख हेक्टेयर में धान की बुआई हो चुकी है जबकि इसका सामान्य रकबा 240.89 लाख हेक्टेयर होता है। ऑल इंडिया राइस एक्सपोट्र्स एसोसिएशन के अध्यक्ष महिंदर पाल जिंदल के मुताबिक, इस साल कम बारिश के बावजूद बासमती चावल की पैदावार प्रभावित नहीं होगी क्योंकि इसकी खेती मुख्य रूप से पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश की सिंचित कृषि भूमि में होती है। हालांकि गैर-बासमती चावल के उत्पादन में गिरावट आ सकती है।
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