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जिंस बाजार में नरमी भारत के लिए अवसर
आकाश प्रकाश /  August 09, 2012

वैश्विक विश्लेषकों के बीच यह भावना बढ़ रही है कि गत एक दशक के दौरान वैश्विक जिंस कीमतों में हुआ इजाफा अब गिरावट पर है। हालांकि यह अभी भी बहस का विषय है क्योंकि निवेशकों में इसे लेकर बहस-मुबाहिसा जारी है। बहरहाल, अर्थव्यवस्था और परिसंपत्तियों पर इसके असर के बारे में चर्चा करना भी उपयोगी साबित होगा।
इस संबंध में मंदी का सिद्घांत एकदम सीधा सपाट है। वैश्विक जिंस बाजार में तेजी का मौजूदा दौर चीन के औद्योगीकरण तथा उभरते बाजारों के तेज विकास की बदौलत है। सीआरबी स्पॉट कमोडिटीज एक्सचेंज में वर्ष 2002 से अब तक 170 फीसदी से अधिक का इजाफा हुआ है। इससे पहले के दो दशकों के दौरान सूचकांक में तकरीबन 28 फीसदी की गिरावट आएगी। चीन के औद्योगिक विकास ने वैश्विक जिंस कीमतों को नई ऊंचाई पर पहुंचा दिया यह काफी हद तक उसी तरह था जिस तरह 1970 के दशक में जापान के विकास के वक्त हुआ था। चीन के विकास में निर्यात और निवेश का बड़ा योगदान रहा। इन दोनों ही क्षेत्रों में आ रही मंदी ने जिंस कीमतों को भी कम किया है। वर्ष 2000 से 2011 के बीच चीन में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) और निवेश का अनुपात 35 फीसदी से बढ़कर 48 फीसदी हो गया था। जिस समय देश में जीडीपी 10 फीसदी की दर से बढ़ रहा था उस वक्त निवेश में लगातार तेजी आ रही थी। चीन के संतुलित विकास मॉडल की तमाम चर्चा के बीच यह कहा जा सकता है कि इस स्तर पर निवेश और जीडीपी का अनुपात हमेशा कायम नहीं रह सकता। इस अनुपात में गिरावट आनी तय है वह भी एक ऐसे माहौल में जब जीडीपी विकास दर के भी दोहरे अंकों से घटकर 7 फीसदी के इर्दगिर्द आ जाने की संभावना है।
चीन ने भी विभिन्न क्षेत्रों में जिंस और ऊर्जा की खपत को किफायती बनाने के लिए स्पष्ट लक्ष्य तय कर रखे हैं। उसने पुराने और अक्षम हो चले संयंत्रों को या तो बंद कर दिया है या बदल डाला है। इससे आगे भी जिंस की खपत कम होने की संभावना है। निर्यात की बात करें तो वैश्विक अर्थव्यवस्था की स्थिति और चीन की घटती विनिर्माण लागत प्रतिस्पर्धा को देखते हुए ऐसा लगता नहीं है कि निर्यात में 25 फीसदी विकास का वक्त दोबारा लौट कर आएगा। ऐसे में जहां चीन में जिंस की खपत में कमी नहीं आएगी वहीं उसकी विकास दर में जरूर धीमापन आएगा। इससे कीमतें या तो स्थिर बनी रहेंगी या फिर उनमें थोड़ी कमी आएगी। जिंस की खपत को लेकर अगली बड़ी उम्मीद भारत से जुड़ी है। लेकिन उसे अभी इस मामले में चीन की रफ्तार पकडऩे में एक दशक से अधिक का वक्त लग सकता है। पिछले एक दशक के दौरान जिंस बाजार में जो तेजी थी उसकी मुख्य वजह चीन था लेकिन हमें इस अवधि में अमेरिकी डॉलर में आई कमजोरी को भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। खासतौर पर यह देखते हुए कि अधिकांश जिंसों की कीमत डॉलर में ही तय होती है। वर्ष 2002 से 2011 के दौरान जिंस में उछाल की अवधि में अमेरिकी डॉलर की कीमत में 25 फीसदी से अधिक की गिरावट आई।
जिंस कीमतों में मंदी आने की बात को आपूर्ति की प्रचुरता की संभावना से भी बल मिला है। वर्ष 2001 तक दो दशक के दौरान जिंस की कमजोर कीमतों के बाद कीमतों को मजबूत होने में 2-3 वर्ष का समय लगा, उसके बाद ही खनन कारोबारियों को यकीन हुआ कि ये कीमतें वास्तविक हैं। चूंकि खनन की अधिकांश परियोजनाएं भारी होती हैं इसलिए किसी नई वस्तु का उत्पादन शुरू होने में 5-7 वर्ष का समय आराम से लग जाता है। चूंकि जिंस कीमतों में तेजी के शुरुआती दौर में शुरू हुई अनेक परियोजनाओं में अभी भी उत्पादन का काम पुरजोर तरीके से चल रहा है इसलिए यह कहा जा सकता है कि जिंस तेजी के चरम दौर में शुरू हुई परियोजनाएं आने वाले कई वर्षों तक आपूर्ति करती रहेंगी। जाहिर है आपूर्ति बरकरार रहने का असर मांग
पर पड़ेगा।
इस संबंध में आखिरी तर्क वित्तीय पूंजी प्रवाह से ताल्लुक रखता है। पिछले पूरे दशक के दौरान ङ्क्षजस किसी परिसंपत्ति की तरह ही लुभावनी बन गई है और अनेक वित्तीय निवेशक इस क्षेत्र में सक्रिय हैं। गत पांच वर्षों के दौरान जिंस फंड में जो राशि निवेश की गई है वह दोगुनी बढ़कर 400 अरब डॉलर से अधिक हो गई है। इस बीच अगर जिंस कीमतों में नरमी आएगी तो इसमें होने वाले निवेश में भी मंदी आएगी। नियामक भी अब इस क्षेत्र की सटोरिया गतिविधियों के कारण मांग चढऩे पर अंकुश लगाने के लिए प्रतिबद्घ हो चले हैं।
हालांकि यह कोई नहीं कह रहा है कि यहां से जिंस कीमतों में अचानक गिरावट आएगी। अल्पावधि में नकदी उपलब्घता बढऩे के साथ इसमें इजाफा भी देखने को मिल सकता है। अगर यह मान लिया जाए कि जिंस कीमतों में आई तेजी खत्म होने वाली है तो इसके भी कई परिणाम होंगे। सबसे पहले, भारत एक बड़ा आयातक है और जिंस कीमतों में गिरावट का उसको सही मायनों में फायदा मिलेगा। इससे राजकोष और रुपये पर से दबाव हटेगा और कंपनियों का मुनाफा बढ़ेगा। इससे उभरते बाजारों के बीच भारत और अधिक आकर्षक बनकर सामने आएगा। खासतौर पर तब जबकि उसकी तुलना दिग्गज जिंस उत्पादकों  ब्राजील, रूस और इंडोनेशिया जैसे देशों से होगी। कमजोर जिंस बाजार वाले माहौल में भारत का विकास संबंधी परिदृश्य मजबूत होगा। यह बात अन्य उभरते बाजारों से एकदम उलट है।
वृहद स्तर पर देखें तो जिंसों की कीमतों में नरमी आने से शेयर बाजारों को भी एक परिसंपत्ति के रूप में तेजी मिलनी चाहिए । शेयर बाजार का अध्ययन किया जाए तो उनमें उस समय बेहतर प्रदर्शन करने का रुझान रहा है जिस समय जिंस बाजार मजबूत नहीं था। ऐसे में जिंस के कमजोर प्रदर्शन के दौर में शेयर एक बार फिर पसंदीदा परिसंपत्ति बनकर उभर सकता है। पिछले एक दशक के दौरान शेयरों ने कोई खास प्रतिफल नहीं दिया है। ऐसे में अगर जिंस कीमतों में कमजोरी के बाद शेयर बाजार अच्छा प्रदर्शन कर पाने में सफल होते हैं तो यह कहा जा सकता है कि भारत में शेयर बाजारों का वक्त सुधरने का संयोग बन रहा है। अब इसे बिगाडऩा पूरी तरह हमारे ही हाथ में है। दरअसल हम पिछले कुछ वर्षों के दौरान ऐसा करते भी रहे हैं। छह फीसदी से कम की विकास दर और 8 फीसदी मुद्रास्फीति तथा 56 रुपये प्रति डॉलर रुपये के साथ हमारे जागने का वक्त आ चुका है।

Keyword: growth, development, gdp,
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