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आर्थिक चुनौतियां और रुपये का अवमूल्यन
राजीव मलिक /  August 08, 2012

भारत के सामने वृहद अर्थव्यवस्था से संबंधित चुनौतियों की कोई कमी नहीं है। इस बीच देश स्थानीय राजनीति की समस्याओं में भी गहरे तक उलझा हुआ है। मुद्रास्फीति से निपटने की मुख्य समस्या से निपटना वृहद आर्थिक असंतुलन के चलते अधिक जटिल हो गया है। सरकार ने राजकोषीय जिम्मेदारी निभाने में पर्याप्त ईमानदारी नहीं बरती है, विकास की गति कमजोर हो गई है और मुद्रास्फीति की समस्या लगातार बढ़ती गई है। इसका असर रुपये के मूल्य पर भी पड़ा है। अब सूखे की दस्तक ने परेशानियों में और अधिक इजाफा कर दिया है।
इस बीच वैश्विक स्तर पर नकदी की सहज उपलब्धि का भी हमें फायदा मिला है। स्थानीय स्तर पर तमाम नकारात्मक बातों के बावजूद चालू वित्त वर्ष के दौरान भारत में विदेशी मुद्रा की आवक अच्छी बनी रही और अब तक यह राशि 10.6 अरब डॉलर का स्तर पार कर चुकी है। इसके बावजूद हम इस बात की अनदेखी नहीं कर सकते हैं कि भारत को इसका फायदा इसलिए मिल रहा है क्योंकि कुछ अन्य देशों की स्थिति और अधिक खराब है, इसलिए नहीं क्योंकि भारतीय बाजार उनको अधिक आकर्षक प्रतीत हो रहा है। भारत के आर्थिक उदय का मार्ग अन्य एशियाई मुल्कों से एकदम अलग है। यह इस बात का भी उदाहरण है कि कैसे एक अनुकूल बाजार के नीति निर्माता गलत नीतियों के जरिये हालात खराब कर सकते हैं। इस वक्त भारत धीमी विकास दर और ऊंची महंगाई दर में उलझा हुआ है।
विभिन्न आर्थिक मानकों पर देखा जाए तो अभी भी अनुमानों को लेकर तमाम अंतर मौजूद है। अधिकांश अर्थशास्त्री और निवेशक यह मानते हैं कि अगले कुछ वर्षों तक देश की वृद्घि दर 5 से 6 फीसदी के दरमियान रहेगी। काफी कुछ इस पर भी निर्भर होगा कि सरकार इस मामले में किस तरह की सोच अपनाती है। लेकिन मुद्रास्फीति और ब्याज दरों को लेकर अनुमानों में उल्लेखनीय तब्दीली आई है। माना जा रहा था कि मुद्रास्फीति में नियंत्रण के बाद भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) को दरों में कटौती करने का मौका मिलेगा।
ब्याज दरों को लेकर अनुमान में भारी बदलाव आया है खासतौर पर रिजर्व बैंक के हालिया निर्देश के बाद। इससे जुड़ी चिंताओं को समझा जा सकता है क्योंकि जून में भरपूर गिरावट के बाद कच्चे तेल की कीमतों में जबरदस्त इजाफा हुआ है। इसके अलावा सरकार ईंधन कीमतों तथा राजकोषीय समायोजन के मोर्चे पर भी एक तरह की हिचकिचाहट का प्रदर्शन किया है। अंत में, खराब मॉनसून का असर महंगाई और विकास दर पर और अधिक प्रत्यक्ष रूप से देखने को मिलेगा। मुद्रास्फीति से निपटने की कवायद पहले से अधिक कमजोर हो चुकी है। यहां जोखिम इस बात का है कि राजनीति एक बार फिर आर्थिक समझदारी पर भारी पड़ जाएगी और सरकार बिना कमजोरियों को दूर किये वृद्घि दर में तेजी लाने का प्रयास करेगी। घरेलू बचत दर में आई कमी व सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 2 से 2.5 फीसदी के बराबर के चालू खाता घाटे के नये दायरे के साथ बढिय़ा निवेश की उम्मीद कम है। जबकि आर्थिक विकास के लिए कम मुद्रास्फीति और ऊंचा निवेश आवश्यक शर्त हैं।
सरकार पहले से ही रक्षात्मक है और खराब मॉनसून को देखते हुए कहा जा सकता है कि राजकोषीय स्थिति और अधिक बिगड़ सकती है। वास्तविक विकास दर अब पहले जताए गए 7.6 फीसदी के अनुमान की तुलना में 2 फीसदी तक गिर सकती है। नये वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने अब तक तो सारी बातें ठीक ही कही हैं। लेकिन बातें करना आसान है, काम करना ही वास्तव में अधिक मायने रखता है। दुर्भाग्यवश एक क्षेत्र ऐसा है जिसमें निवेशकों की उम्मीद का ध्यान नहीं रखा गया है। वह है, मध्यम अवधि में रुपये को लेकर दृष्टिकोण। रुपये का भाग्य परिवर्तन वर्ष 2002 में शुरू हुआ। उस वक्त चालू खाता अधिशेष की स्थिति थी जो वर्ष 2004 के आरंभ तक चली। इसे मजबूती का संकेत माना गया लेकिन इसकी बदौलत घरेलू मांग की स्थिति कमजोर हुई और इस तरह व्यापार घाटा बढ़ा। वर्ष 2004-05 के बाद से चालू खाता घाटा नकारात्मक बना हुआ है।
वर्ष 2002-07 के बीच रुपये के अधिमूल्यन के लिए पर्याप्त वजहें मौजूद थीं। इसमें उच्च विकास दर, प्रबंधनीय दोहरा घाटा और मुद्रास्फीति जैसी बातें शामिल थीं। यकीनन वैश्विक स्तर पर आसान नकदी ने पूंजीगत सहायता उपलब्ध कराई तथा इसकी बदौलत चालू खाता घाटा की भरपाई करने में आसानी हुई। लेकिन ये सकारात्मक बातें हाल के वर्षों में अपना रुख बदल चुकी हैं और वास्तविक प्रभावी विनिमय दर (आरईईआर) के संदर्भ में देखा जाए तो रुपये का मूल्य ज्यादा बना हुआ है। निश्चित तौर पर डॉलर के मुकाबले 20 फीसदी तक का अवमूल्यन वाजिब रहेगा।
निकट भविष्य में वैश्विक स्तर पर व्याप्त जोखिम रुपये के लिए सकारात्मक हो सकता है लेकिन रुपये का भविष्य कम से कम अगले कुछ महीने तक तो इन बातों पर निर्भर करेगा: (1) भारत का भुगतान संतुलन (2) डॉलर के लिए नजरिया (3) वैश्विक स्तर पर जोखिम की दशा (4) अन्य कारोबारी साझेदारों के मुकाबले भारत का महंगाई से जुड़ा अंतर। चालू खाता घाटा जीडीपी के 3.5 फीसदी के स्तर पर बना हुआ है और इसका यह मतलब नहीं है कि इसकी भरपाई के लिए पर्याप्त विदेशी पूंजी हमें हासिल होती रहेगी। यकीनन पूंजी की आवक मायने रखती है। वर्ष 2003 और 2007 के बीच का वक्त याद कीजिए। उस समय रुपये में अधिमूल्यन का दबाव था जबकि चालू खाता घाटा भी बढ़ा हुआ था। बगैर अमेरिकी डॉलर अथवा यूरो पर कोई नजरिया व्यक्त किये रुपये पर विचार करने का चलन चल पड़ा है। हकीकत यह है कि विनिमय दर बहुत संवेदनशील होती है और रुपया डॉलर अथवा यूरो की गति से कतई अप्रभावित नहीं रह सकता। इन बातों के बीच अगर हम मान भी लें कि भारत भुगतान संतुलन की स्थिति में अधिशेष की स्थिति में रहेगा तो आखिर आरबीआई मौजूदा रुख को कब तक जारी रख सकेगा? यह बात अन्य कारोबारी साझेदारों के मुकाबले देश की बढ़ी हुई महंगाई दर को देखते हुए प्रासांगिक है। आमतौर पर उच्च मुद्रास्फीति से निपट रही अर्थव्यवस्था वाले देशों की मुद्राओं में अधिशेष की स्थिति नहीं रहती। हालांकि आर्थिक सुधारों का कार्यक्रम एक बार फिर शुरू होने पर रुपये के अधिमूल्यन को उचित ठहराया जा सकता है लेकिन अभी इसकी संभावना नहीं नजर आ रही है। रुपये के अधिमूल्यन का विचार इसलिए भी आ रहा है क्योंकि लोगों के सामने अभी 2002-07 का उदाहरण है। दरअसल वह समय एक अपवाद था। हकीकत में देश की बढ़ी हुई मुद्रास्फीति वर्ष 2002 के पहले के दिनों की वापसी खतरा पैदा कर रही है जब रुपये में गिरावट का क्रम था।
उम्मीदों पर किये जाने वाले समायोजन की दुखद प्रकृति के मद्देनजर कहा जा सकता है कि वास्तविक समायोजन की राह अनिश्चित है। मौजूदा आर्थिक चुनौतियां अलंघ्य नहीं हैं। बहरहाल, उनको हल करने के लिए जरूरी है कि सरकार सचेत हो और कदम उठाने की इच्छुक भी।

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