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दक्षिण कोरिया से सबक लेकर सुधार करे सरकार
ऐंडी मुखर्जी /  August 07, 2012

भारत मुद्रास्फीति-मंदी की स्थिति से कैसे बचे इसके लिए वह दक्षिण कोरिया से एक-दो सबक ले सकता है। मुद्रास्फीति-मंदी वह स्थिति है जिसमें महंगाई दर तो ऊंची बनी ही रहती है, साथ ही अर्थव्यवस्था की विकास दर में भी गिरावट आनी शुरू हो जाती है।
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ब्याज दरों में कटौती करने में समर्थ नहीं है क्योंकि अर्थव्यवस्था की विकास दर में गिरावट आ रही है जबकि महंगाई दर असहज रूप से ऊंची बनी हुई है। मॉनसून में अच्छी बारिश नहीं होने की स्थिति में खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ेंगी और महंगाई में और अधिक इजाफा होगा। कुछ महीने पहले कोरिया भी कमोबेश इसी समस्या से जूझ रहा था। वहां महंगाई दर लगातार केंद्रीय बैंक के तय लक्ष्य से ऊपर के स्तर के करीब बनी हुई थी जबकि बाहरी मोर्चे पर जो स्थिति थी वह मौद्रिक नीति में ढिलाई लाने के लिए प्रेरित कर रही थी।
भारत से इतर दक्षिण कोरिया ने मुद्रास्फीति-मंदी के जोखिम का अंदाजा लगा लिया था और उसने इससे बचने के लिए समय पर कदम भी उठाए। नॉलेज इकॉनामी मंत्रालय की अध्यक्षता में सरकार ने एक कार्य बल का गठन किया जिसने सिफारिश की थी कि चार तेल रिफाइनरियों एसके इनोवेशन, जीएस काल्टेक्स, हुंडई ऑयल बैंक और एस-ऑयल पर पकड़ ढीली की जाए। कुछ कारोबारियों ने गैस स्टेशनों के साथ सौदे करके ईंधन की खुदरा कीमतों को वास्तविक से कहीं ऊपर कर दिया था। इस सांठगांठ वाली व्यवस्था को खत्म करने के लिए सैमसंग टोटल पेट्रोकेमिकल्स को यह अनुमति दी गई कि वह अपनी गैसोलिन को सरकारी कंपनी कोरिया नैशनल ऑयल कार्पोरेशन को बेचे। इसके बदले में उसे उपरोक्त चारों रिफाइनरियों से असंबद्घ स्टेशन देने की बात कही गई। ऐसे स्वतंत्र पंपों के जरिये कारोबार के इच्छुक कारोबारियों को आसान कर छूट और ऋण सुविधा मुहैया कराने की बात भी कही गई।
शंकालु प्रकृति के लोगों ने कहा कि यह योजना कामयाब नहीं साबित होगी क्योंकि सैमसंग टोटल कोरिया की सबसे बड़ी कंपनी और फ्रांसीसी ऊर्जा कंपनी टोटल का संयुक्त उद्यम है और वह देश की कुल गैसोलिन मांग के एक फीसदी की ही पूर्ति कर सकती है। लेकिन बाजार की प्रतिस्पर्धा पर इसका असर पडऩे लगा है। स्थानीय बाजार में पेट्रोल की कीमतें 0.9 फीसदी तक गिर गईं। अन्य स्टेशनों की मौजूदगी में ये रिफाइनरी भी वैश्विक बाजारों में तेल के मूल्य में हुए इजाफे का बोझ अंतिम उपभोक्ता पर डालने में हिचकिचाने लगीं। सब्जियों आदि की आपूर्ति सहज बनाने के लिए गैस वितरण की प्रक्रिया को सुगम बनाने का असर भी कोरियाई अर्थव्यवस्था पर पड़ा।
आखिरकार कोरिया ने मुद्रास्फीति में तेज गिरावट के आंकड़े पेश करके लोगों को चौंका दिया। जून महीने में कीमतों में पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में महज 2.2 फीसदी का ही इजाफा हुआ। इससे बैंक ऑफ कोरिया को जुलाई में ब्याज दरों में कटौती करने का मौका मिला। मुद्रास्फीति की ताजा दर 1.5 फीसदी के इर्दगिर्द है। वहां मुद्रास्फीति संबंधी अनुमान 19 महीनों के निचले स्तर पर पहुंच गए हैं और इसका मतलब वहां मौद्रिक नीति में और नरमी लाई जा सकती है। हां, अगर वैश्विक स्तर पर इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं, वाहन और जहाजों आदि की मांग कम बनी रहती है तो कोरिया की निर्यात पर निर्भर अर्थव्यवस्था थोड़ी परेशानी में पड़ सकती है लेकिन इसके बावजूद देश के केंद्रीय बैंक के पास इस बात का पर्याप्त मौका रहेगा कि वह मंदी की चुनौती से निपट सके। भारत में आरबीआई को ऐसा मौका नहीं मिल रहा है क्योंकि मुद्रास्फीति का स्तर ऊंचा बना हुआ है।
समूचे प्रकरण में भारतीय नीति निर्माताओं के लिए यह सबक छिपा है: आपूर्ति क्षेत्र के गतिरोधों के बारे में केवल बात करने के बजाय उनको उन गतिरोधों की पहचान कर उनको तत्काल दूर करने की कोशिश करनी चाहिए। नये वित्त मंत्री पी चिदंबरम का यह कहना सही है कि भारतीयों के पास ऐसे अवसर नहीं हैं क्योंकि हमारे राज्य कृषि पर नियंत्रण रखते हैं और खपत के मामले में खाद्यान्न सबसे ऊपर हैं। इसके बावजूद उनको जरूर करनी चाहिए।
उदाहरण के लिए भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) ने सुझाव दिया था कि फलों और सब्जियों के मामलें में महंगाई की चुनौती को ध्यान में रखते हुए इन्हें उन उत्पादों की सूची से बाहर कर दिया जाना चाहिए जिनकी बिक्री बिचौलियों के जरिये होती है। यह एक अच्छी शुरुआत होती। इसकी उपयोगिता 1960 और 1970 के दशक में थी जब अनेक राज्यों ने कृषि उत्पाद विपणन समिति की व्यवस्था बनाई थी जिसकी बदौलत किसानों के लिए राज्य के बाहर कारोबार और सीधे खाद्य प्रसंस्करण कंपनियों को बिक्री करना मुश्किल हो चला था।
अब राज्यों ने इस प्रावधान में पर्याप्त छूट की व्यवस्था कर दी है तो यह आवश्यक है कि खाद्य कारोबार को सही तरीके से प्रोत्साहन दिया जाए और निजी निवेश तथा शीतगृह आदि की व्यवस्था करके खाद्य आपूर्ति शृंखला की कमियां दूर की जा सकें।
लंबे समय से लंबित वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) को पहली प्राथमिकता दी जानी चाहिए क्योंकि इसे लागू करने से कीमतों में कमी आएगी। ऐसा इसलिए होगा क्योंकि अनेक स्थानीय शुल्क हटेंगे जिसका असर अंतिम उत्पाद की कीमत पर पड़ेगा।
कोरिया ने जो काम अपने तेल क्षेत्र में किया उसे भारत में 'सुधार' की संज्ञा दी जाएगी। इस तरह उसे आने वाले समय के लिए टाल दिया जाएगा। आज के कामों केवल वही बातें शामिल की जाएंगी जो स्थिरता लाने के लिए आवश्यक हैं।
हमें यह समझना होगा कि जब सुधारों की लंबे समय तक अनदेखी की जाती है तो व्यवस्था अधिक से अधिक अस्थिर होती चली जाती है। आरबीआई इस बात को स्वीकार करेगा कि इस समय देश में मुद्रास्फीति की जो स्थिति है उसके लिए काफी हद तक आपूर्ति क्षेत्र की समस्याएं जिम्मेदार हैं लेकिन अगर ब्याज दरों में इजाफा जैसे मांग प्रबंधन कदमों के साथ इससे निपटने की कोशिश की गई तो यह विकास के लिए हानिकारक साबित होगा।
बिजली क्षेत्र का कुप्रबंधन इसकी एक और बानगी है। हाल ही में घटी ग्रिड फेल होने की घटनाओं को विश्व मीडिया में खूब तवज्जो मिली। क्या उसके लिए भी दशकों से लंबित सुधारों की कमी को जिम्मेदार माना जाना चाहिए या फिर यह केवल स्थायित्व बरकरार रखने से जुड़ी नाकामी थी?
दक्षिण कोरियाई सुधारों की एक उत्तर कथा भी है। जब राष्ट्रपति ली युंग बाक ने मौजूदा सांठगांठ वाली व्यवस्था को खत्म करने में निजी तौर पर रुचि दिखाई तो देश के प्रमुख नागरिकों के एक समूह ने एकजुट होकर घोषणा की कि वे जनता की तेल कंपनी बनाएंगे जो उत्पादों को मौजूदा से 20 फीसदी तक सस्ती दरों में बेचेगी। पांच दशक पहले हमारे देश में वर्गीज कुरियन नामक एक शख्स ने लाल बहादुर शास्त्री के आदेश पर दूध को लेकर ऐसा ही किया था। जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कारोबारी उत्साह पैदा करने की बात करते हैं तो क्या वह टाटा, अंबानी और अदाणी से इतर भी सोचते हैं?

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