| चीनी निर्यात पर लगेगा कर! | | रॉयटर्स / नई दिल्ली August 07, 2012 | | | | |
सरकार चीनी निर्यात पर कर लगाने और इस पर 10 फीसदी आयात शुल्क खत्म करने की सोच रही है। इसका मकसद चीनी का विदेश को निर्यात रोकना और घरेलू कीमतों पर लगाम लगाना है। सरकारी सूत्रों ने कहा कि सूखे से कृषि उत्पादन में गिरावट की आशंका के कारण यह कदम उठाया जा रहा है
घरेलू बाजार में उपलब्धता बढ़ाने के लिए सरकार अगस्त में 4,20,000 टन अतिरिक्त चीनी जारी करने की योजना बना रही है। घरेलू बाजार में चीनी की कीमतों में हाल में काफी तेजी आई है। हर महीने सरकार यह फैसला करती है कि खुले बाजार में मिलें कितनी चीनी बेच सकती हैं। पिछले महीने सरकार ने चीनी पर 10 फीसदी आयात शुल्क लगाया था।
एक स्रोत ने कहा, 'कीमतों को नियंत्रण में रखने के लिए हम इस तरह के कुछ उपाय अपनाने की योजना बना रहे हैं। कीमतों में बढ़ोतरी हमारे मुताबिक नहीं है, मेरे विचार से यह सही सीमा में नहीं है।' भारत का बेंचमार्क चीनी वायदा जनवरी के बाद 22 फीसदी चढ़ चुका है। शुक्रवार को लगातार तीसरे दिन चीनी वायदा का अनुबंध रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंचा। चीनी वायदा में भी उतार-चढ़ाव जारी है, जो डेरिवेटिव कारोबार की नीतियां तय करने वाले वायदा बाजार आयोग (एफएमसी) का ध्यान खींच रहा है। भारत विश्व का सबसे बड़ा चीनी उपभोक्ता है और ब्राजील के बाद दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक। देश को तीन साल में पहली बार सूखे का सामना करना पड़ रहा है। चीनी का उत्पादन प्रमुख उत्पादक राज्य महाराष्ट्र में 2012-13 के सीजन में गिरने की आशंका है।
लेकिन अगले साल भी भारत के पास सरप्लस स्टॉक होगा, क्योंकि अन्य राज्यों में ज्यादा गन्ने की बुआई हुई है। ज्यादा उत्पादन और घरेलू बाजार में कम कीमतों की वजह से सरकार ने मई में चीनी के निर्यात को नियंत्रण मुक्त कर दिया था। सीमा खत्म करने से पहले सरकार 30 सितंबर को समाप्त होने वाले चीनी वर्ष के लिए 20 लाख टन चीनी के निर्यात को स्वीकृति दे चुकी थी, जिससे मिल अपने भारी स्टॉक को कम कर सकें।
उसके बाद मिलों ने 14 लाख टन चीनी का निर्यात दर्ज किया, जिसमें से 8,50,000 टन चीनी की खेप पहले ही भेजी जा चुकी है। सूत्रों ने कहा कि सितंबर में समाप्त होने वाले चालू सीजन में चीनी कंपनियों ने 259 लाख टन चीनी का उत्पादन किया है और कुछ गन्ने की पेराई कर रही हैं। अक्टूबर से अगले 12 महीनों में मिलों के 250 लाख टन चीनी उत्पादन की संभावना है, जो देश की वार्षिक मांग से करीब 40 लाख टन अधिक है।
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