जब कोई अर्थव्यवस्था अथवा उद्योग संकट में होता है तो कर्जदाताओं के लिए समझदारी की बात यही है कि वे थोड़े धैर्य का परिचय दें। व्यवहार में इसका मतलब होता है ऋण का पुनर्गठन। इसका सीध लाभ बैंकों को मिलता है। इसके जरिये वे खुद की हकीकत से अधिक बेहतर तस्वीर पेश कर सकते हैं। अगर नियम कायदों का पालन किया जाए तो नियामक भी निस्संदेह इस वंचना का समर्थन करेंगे। वर्ष 2008 में आए वैश्विक वित्तीय संकट ने भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) को प्रेरित किया कि वह पुनर्गठन के मानकों और विभिन्न संस्थानों द्वारा अपने खातों को पेश करने के तौर तरीकों को और अधिक शिथिल बनाए। लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था की सेहत दुरुस्त नजर नहीं आ रही है और विकास की दर में धीमापन आ रहा है। समान रूप से चिंता की बात यह भी है कि देश के वित्तीय संस्थानों की हालत जितनी दिख रही है उससे कहीं अधिक खराब हो सकती है। अगर इन संस्थाओं के आंकड़ों का बारीकी से अध्ययन किया जाए तो समस्या उजागर हो जाती है। वर्तमान में बैंकिंग क्षेत्र में वर्तमान पुनगर्ठित संपत्तियों का मूल्य कुल गैर निष्पादित संपत्तियों (एनपीए) के मूल्य से अधिक है। लेकिन अगर पुनर्गठन के लाभ का दोबारा वर्गीकरण करने से इनकार नहीं कर दिया जाता तो यह एनपीए दोगुना से भी अधिक हो सकता था। अच्छी बात यह है कि आरबीआई सुधार पर विचार कर रही है। एक आंतरिक पैनल ने परिसंपत्तियों के पुनवर्गीकरण और प्रावधानीकरण को वापस लेने की अनुशंसा की है क्योंकि बैंक कर्जों के पुनर्गठन से लाभ अर्जित कर सकते हैं। मौजूदा हालात को ध्यान में रखते हुए यह काम दो वर्षों में किया जा सकता है। पैनल की यह भी अनुशंसा है कि मौजूदा पुनर्गठित परिसंपत्तियों के लिए पूंजी का प्रावधान बढ़ाया जाए। पैनल का यह भी कहना है कि किसी संस्थान के कर्ज को शेयरों अथवा तरजीही शेयरों में तब्दील किया जा सकता है। ये भी पुनर्गठन के तत्त्व हैं लेकिन इसे अंतिम उपाय के रूप में ही अपनाया जाना चाहिए। उसने यह भी कहा है कि इसके लिए कुल पुनर्गठित कर्ज के 10 फीसदी की सीमा तय की जानी चाहिए। यह बात महत्त्वपूर्ण है। बैंकों को उन उद्योगों के शेयर नहीं लेने चाहिए जिनमें अधिक संख्या में कंपनियों के पुनर्गठन करने की आशंका हो। इस प्रक्रिया के प्रवर्तकों के अनुकूल होने के बारे में भी काम करने की आवश्यकता है। उनको कर्ज पुनर्गठन प्रकिया का लाभ लेने के लिए और अधिक पूंजी लगानी चाहिए। संभवत: उनकी गारंटी को अनिवार्य बना दिया जाना चाहिए और अर्थव्यवस्था के बाहरी कारकों से प्रभावित होने की दशा में इसे माफ नहीं किया जाना चाहिए। ऐसे मामलों में जहां किसी बैंक को लगे कि पुनगर्ठित ऋण की हालत आगे ठीक नहीं होने वाली है तो वहां उसे बाहर निकलने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। कुछ लोग यह तर्क भी दे सकते हैं कि यह मानकों सख्त बनाने के लिए सबसे बुरा वक्त है। बढ़ी हुई प्रोविजनिंग के कारण कई बैंकों का नकारात्मक परिणाम पहले से खराब माहौल में इजाफा ही करेगा। यह तर्क अपर्याप्त है। आखिर बुरी खबर को छिपाने वाला चिकित्सक कोई अच्छा काम तो करता नहीं है। ऊंची प्रोविजनिंग का अर्थ है भुगतान के लिए कम संसाधनों की उपलब्धता और इससे किसी बैंक की वित्तीय स्थिति को मदद ही मिलेगी। इसमें कोई संदेह नहीं है कि कारोबारी कर्ज के पुनर्गठन से भ्रष्टाचार अथवा पक्षपात को बढ़ावा मिलता है। राजनीतिक संपर्क वाले कारोबारी अपनी गैर निष्पादित कर्ज पर अनुकूल और आसान शर्तें तय करवा लेते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में बैंक और जमाकर्ताओं का नुकसान होता है। इस कमी को शीघ्र दूर किये जाने की आवश्यकता है।
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