| नालको के लिए एफपीओ मूल्य निर्धारण होगा अहम | | जितेंद्र कुमार गुप्ता / July 15, 2012 | | | | |
सार्वजनिक क्षेत्र की अपनी कई प्रतिस्पर्धी कंपनियों की तरह घरेलू उद्योग में अपनी मजबूत स्थिति के साथ नालको ऋण-मुक्त कंपनी है और उसने बड़ी दीर्घावधि विकास योजनाएं तैयार की हैं। हालांकि नालको के इस साल प्रस्तावित एफपीओ को सुस्त कारोबार वृद्घि और धातु मूल्य निर्धारण परिदृश्य को देखते हुए अच्छी प्रतिक्रिया (यदि मूल्य निर्धारण आकर्षक नहीं रहता है) नहीं मिल सकती है। वहीं सकारात्मक बात यह है कि एल्युमिना कारोबार बढऩे की संभावना है जबकि कम लागत से कंपनी को मार्जिन मजबूत बनाने में मदद मिलेगी। इन दोनों का असर शेयर की कीमत में दिख चुका है।
नालको में सरकार की हिस्सेदारी फिलहाल 87.15 फीसदी है और 62 रुपये की ताजा बाजार कीमत पर 10 फीसदी हिस्सेदारी की बिक्री से लगभग 1600 करोड़ रुपये अर्जित हो सकते हैं।
विश्लेषकों का भी मानना है कि 2012-13 के अनुमानों पर आधारित परिचालन मुनाफे के मुकाबले मूल्यांकन 13 गुना आय और 6 गुना उद्यम वैल्यू पर कुछ महंगे हैं। हालांकि दीर्घावधि नजरिये से शेयर का मूल्यांकन बहीखाते में नकदी को देखते हुए कुछ उचित दिख रहा है। मौजूदा समय में नालको 4900 करोड़ रुपये की नकदी एवं निवेश से लैस है। वर्ष 2012-13 के अंत तक यह बढ़ कर 6,000 करोड़ रुपये हो जाएगा। हालांकि अधिक नकदी से रिटर्न रेशियो पर दबाव भी पड़ा है जिसे लेकर बाजार आमतौर पर चिंतित है। दरअसल, नालको के लिए रिटर्न रेशियो पिछले दो-तीन वर्षों में आकर्षक नहीं (नेटवर्थ पर रिटर्न एक अंक में है) रहा है। अल्पावधि व्यावसायिक परिदृश्य आकर्षक नहीं है जिसे देखते हुए निवेशकों के लिए लाभ काफी हद तक एफपीओ के मूल्य निर्धारण पर निर्भर करेगा।
बिजनेस मॉडल
व्यवसाय के मोर्चे पर भी नालको की अपेक्षाकृत मजूत स्थिति को लेकर कोई संदेह नहीं है। यह घरेलू एल्युमीनियम उद्योग में प्रमुख एकीकृत कंपनी है और कैप्टिव खदानों की वजह से अपने कई वैश्विक प्रतिस्पर्धियों की तुलना में भी लागत लाभ से लैस है।
वैश्विक एल्युमीनियम की कीमतों के बारे में बात करें तो अप्रैल 2011 में 2,700 डॉलर प्रति टन से गिर कर मौजूदा समय में ये कीमतें लगभग 1930-1960 डॉलर प्रति टन रह गई हैं। इससे वैश्विक कंपनियों को उत्पादन घटाने को बाध्य होना पड़ा है और कुछ को तो मौजूदा कीमतों पर नुकसान भी हो रहा है। हालांकि अब तक नालको मजबूती (हालांकि कम मार्जिन पर) के साथ परिचालन कर रही है और उसकी उत्पादन लागत लगभग 1850-1900 डॉलर प्रति टन पर है। हालांकि यदि कीमतों में और गिरावट आती है तो मार्जिन पर दबाव भी बढ़ जाएगा, लेकिन इसकी आशंका कम है, क्योंकि विश्लेषकों का कहना है कि वैश्विक रूप से आधी से अधिक एल्युमीनियम क्षमता पहले से ही नुकसान के साथ परिचालन कर रही है।
सुस्त कारोबार
फिर भी एल्युमीनियम कीमतें नालको के लिए अहम हैं, क्योंकि मध्यावधि में कारोबार वृद्घि के लिए अधिक गुंजाइश नहीं है। विश्लेषकों का कहना है कि हालांकि कंपनी की लगभग 50,000 करोड़ रुपये के निवेश से जुड़ी विस्तार योजनाएं की प्रगति उम्मीद के अनुरूप नहीं है। बार्कलेज के चिराग शाह ने इस कंपनी के बारे में अपनी एक ताजा रिपोर्ट में कहा है, 'ज्यादातर विस्तार योजनाओं की प्रगति सार्थक नहीं है और वे अभी भी शुरुआती चरण में हैं। अगले 4-5 वर्षों में किसी भी परियोजना के शुरू होने की उम्मीद नजर नहीं आ रही है। इसलिए हम कारोबार वृद्घि सुस्त रहने की उम्मीद कर सकते हैं।' विश्लेषकों को नालको का एल्युमीनियम कारोबार 416,000-414,000 टन प्रति वर्ष के मौजूदा स्तरों पर बने रहने की संभावना है। हालांकि कंपनी को हाल में जुड़ी एल्युमिना क्षमता से कुछ मदद मिल सकती है जो 50 लाख टन तक बढ़ कर 20 लाख टन सालाना हो गई है। कंपनी ने कहा है कि इनमें से ज्यादातर अतिरिक्त क्षमता अंतरराष्ट्रीय बाजार से संबद्घ होगी जहां प्राप्तियां बेहतर हैं। इससे अगले दो वित्त वर्षों के दौरान बिक्री लगभग 7-10 फीसदी तक बढ़ाने में मदद मिलेगी।
परिचालन बढ़त
बिक्री वृद्घि के विपरीत मुनाफा वृद्घि 30 फीसदी से अधिक के साथ बेहतर रहने की संभावना है। पिछले वित्त वर्ष में मार्जिन में कमी बड़ी चिंता थी और इससे शेयर पर नकारात्मक असर पड़ा था। कंपनी का शेयर मार्च 2011 के बाद से लगभग 50 फीसदी गिर चुका है।
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