आम तौर पर यह माना जाता है कि कभी-कभी ही काम पर जाने वाला किसी सरकारी विद्यालय का शिक्षक देश के जीवन स्तर में उतना ही योगदान कर रहा है जितना कि कोई ऐसा व्यक्ति जो पूरी प्रतिबद्घता और परिश्रम से अपने काम को अंजाम दे रहा है। निश्चित तौर पर यह सही नहीं हो सकता है। लेकिन ऐसा ही है।
जीवन स्तर का सबसे सामान्य आर्थिक प्रतिनिधित्व करने वाले मानक यानी प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की बात की जाए तो सरकार द्वारा विभिन्न जन सेवाओं को मुहैया कराने पर पडऩे वाली लागत के आधार पर इनको एक समान आंका जाता है। इसका आकलन करते वक्त न तो किफायत का ध्यान रखा जाता है और न ही इस बात का कि सरकार को इस पर कितनी राशि खर्च करनी होगी।
अर्थशास्त्री एंगस डिएटन और ऐलन हेस्टन ने बेहद कुशलतापूर्वक इस बात का उल्लेख किया है कि कैेसे अप्रभावी और बरबादी की ओर जाने वाले सरकारी खर्च को भी जीवन स्तर में सुधार के खाते में डाल दिया जाता है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के फ्रांसेस्को ग्रिगोली और विश्व बैंक के एडुअर्डो ली के एक हालिया प्रपत्र में कहा गया है कि इस आकलन का सही तरीका यही है कि जीडीपी में से सरकारी खर्च के उस हिस्से को निकाल दिया जाए जो बेकार जाता है। अगर वैश्विक स्तर पर कभी ऐसा किया गया होता तो इसके परिणाम एकदम चौंकाने वाले होते।
विभिन्न देशों से प्राप्त हुए प्रमाणों को आधार बनाकर ग्रिगोली और ली ने शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में सार्वजनिक संसाधनों की बरबादी से जीडीपी को होने वाले नुकसान का आकलन किया है। दुर्भाग्यवश उनके आंकड़ों में भारत का नाम शामिल नहीं है। लेकिन इस बात पर विश्वास करने के पर्याप्त कारण मौजूद हैं कि भारत में सार्वजनिक क्षेत्र में होने वाली बरबादी पुर्तगाल (8 फीसदी) या दक्षिण अफ्रीका (6 फीसदी) के समान ठहरेगी बजाय कि दक्षिण कोरिया (1.5 फीसदी) अथवा सिंगापुर (शून्य फीसदी) के। यकीनन यह केवल मेरा अनुमान है। असल में इस बरबादी का स्तर क्या है? अगर इसे जानने का कभी कोई गंभीर प्रयास नहीं किया गया तो हम शायद इसे कभी नहीं जान पाएंगे। यह तो प्रति व्यक्ति जीडीपी को जीवन स्तर का मानक बनाने की केवल एक खामी है। विभिन्न देशों और अलग-अलग समय के दौरान लोगों के जीवन स्तर में सुधार की तुलना के लिए वास्तविक, मुद्रास्फीति के मुताबिक समायोजित आंकड़ों की आवश्यकता होती है। विभिन्न देशों की मुद्राओं में खरीद की क्षमता में अंतर के लिए गुंजाइश रखनी होगी। इन सब बातों के साथ नये किस्म की जटिलता और आकलन की समस्या का आगमन होगा। अगर किसी देश में आय का वितरण समान हो तथा दूसरे में एकदम अलग-अलग तो दो अलग-अलग देशों में समान प्रति व्यक्ति आय के बावजूद जीवन स्तर में फर्क हो सकता है।
वृहद आर्थिक आंकड़ों के आधार पर जीवन स्तर की जो तस्वीर बनती है वह अधूरी तो है ही कई बार वह भ्रामक भी हो सकती है। इसका एक वैकल्पिक तरीका यह हो सकता है कि किसी अर्थव्यवस्था के एक विशिष्ट क्षेत्र की बुनियादी तस्वीर पर नजर डाली जाए। प्रिंसटन विश्वविद्यालय के ओरले एशेनफेल्टर ने बिल्कुल ऐसी ही नीति अपनाई। वह दुनिया भर में मैकडॉनल्ड रेस्टोरेंट्स के कर्मचारियों की खरीदारी की क्षमता पर पर नजर रखते हैं।
मुद्रा अवमूल्यन और अधिमूल्यन से जुड़ा द इकनॉमिस्ट पत्रिका का बिग मैक सूचकांक 25 वर्ष पुराना है। एशेनफेल्टर ने वर्ष 1988 में इस कहानी में एक नया मोड़ ला दिया। उन्होंने मैकडॉनल्ड के कर्मचारियों को हर घंटे के हिसाब से मिलने वाले वेतन के बारे में सूचना जुटानी शुरू कर दी। उनको मिलने वाले मेहनताने की दर को बर्गर की कीमत से बांटकर यह संकेतक तैयार किया गया। बिग मैक पर ऑवर (बीएमपीएच) इस बात का संकेतक है कि वहां मिलने वाले प्रति घंटे मेहनताने से कितने बर्गर खरीदे जा सकते हैं।
यह श्रमिकों की खरीद क्षमता का एक कच्चा लेकिन सशक्त संकेतक है जो विभिन्न देशों और परिवर्तनों के साथ इसका तुलनात्मक अध्ययन करता है। यह कच्चा इसलिए है क्योंकि लोग अनेक तरह की वस्तुएं और सेवाएं ग्रहण करते हैं केवल बर्गर नहीं।
फिर भी यह मानक सशक्त है क्योंकि सांख्यिकीय लिहाज से यह दोष मुक्त है। एशेनफेल्टर का विश्लेषण कुछ ऐसी बातों की पुष्टि करती है जिनको हम पहले से जानते हैं। उदाहरण के लिए वर्ष 2007 में अमेरिका, चीन और भारत में बीएमपीएच का स्तर क्रमश: 2.41, 0.57 और 0.35 था। दूसरी तरह से देखा जाए तो अमेरिका के एक बड़े शहर में मैकडॉनल्ड्स में काम करके एक घंटे के मेहनताने में तकरीबन ढाई बिग मैक खरीदे जा सकते थे जबकि चीन में इस राशि में आधे से थोड़ा अधिक बिग मैक जबकि भारत में आधे से कम महाराजा बर्गर खरीदा जा सकता था।
लोगों को यह उम्मीद रही होगी कि चीन के मैकडॉनल्ड्स कर्मियों की खरीद की क्षमता भारतीय कर्मचारियों की तुलना में अधिक होगी लेकिन यह सामान्य अनुभव की बात है कि चीन के 30 वर्षों से भी अधिक पुराने विकास के मॉडल में खपत के बजाय निवेश पर जोर दिया गया है। इसलिए चीन में कम वेतन चकित करने वाला नहीं है। वर्ष 2000 से 2007 के दौरान भारत, चीन और रूस में कामगारों की खरीद क्षमता में इजाफा हुआ जबकि विकसित देशों में यह रुकी रही। इसमें भी चकित होने वाली कोई बात नहीं है। उभरते बाजारों के साथ निवेशकों के लगाव को याद रखने की आवश्यकता है। खासतौर पर ब्राजील, रूस, भारत और चीन के साथ। लेकिन वर्ष 2007 से 2011 के बीच कुछ चौंकाने वाली बातें हुईं।
गत वर्ष के अंत तक अमेरिका में बीएमपीएच वर्ष 2007 के स्तर से बढ़कर 91 तक पहुंच गया। मॉर्र्गेज संकट और सुधार के अभाव में आर्थिक परेशानियों के मद्देनजर यही उम्मीद की जा रही थी कि गत चार वर्षों के दौरान अमेरिका में मैकडॉनल्ड्स के कर्मचारियों की वास्तविक खरीद क्षमता में कमी आई होगी। बहरहाल, ऐशनेफेल्टर के आंकड़ों के मुताबिक भारत में मैकडॉनल्ड्स के कर्मचारियों की खरीद क्षमता में अपने अमेरिकी साथियों की तुलना मे अधिक गिरावट आई। भारत में भी वेतन तो बढ़ा लेकिन बर्गर की कीमतों में अधिक तेजी से इजाफा हुआ। संयोगवश चीन में भी बर्गर की कीमतों में इसी अनुपात में इजाफा हुआ लेकिन वहां काम करने वालों के वेतन में दो गुना इजाफा हुआ। इस तरह उनकी वास्तविक खरीद क्षमता भी बढ़ी। यह देखना रोचक होगा कि ऐशेनफेल्टर इस वर्ष कैसे आंकड़े पेश करते हैं। हमारे देश की अर्थव्यवस्था अपना जादू गंवा चुकी है। चीन में मंदी 2012 की बड़ी खबर है। क्या इसका असर कामगारों की क्रय शक्ति पर पड़ेगा?
एशेनफेल्टर का विश्लेषण उन लोगों के लिए एक अच्छा प्रस्थानबिंदु है जो देश में जीवन स्तर की हकीकत से रूबरू होना चाहते हैं। खासतौर पर शहरी निम्र मध्य वर्ग के जीवन स्तर से। आज मैकडॉनल्ड्स में एक घंटे काम करके आप एक तिहाई महाराजा बर्गर भी नहीं खरीद सकते। ऐसे में यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि आखिर पिछले चार साल में गड़बड़ी कहां हुई है और इसका जिम्मेदार किसे ठहराया जाना चाहिए।
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