| कारोबारी जगत में क्यों कम है नारी की भागीदारी? | | श्यामल मजूमदार / July 12, 2012 | | | | |
फेसबुक के निदेशक बोर्ड में सारे पुरुष सदस्य हैं और इसमें शेरिल सैंडबर्ग को शामिल करने की घोषणा किसी भी नियमित घोषणा की तरह ही नजर आनी चाहिए। मगर ऐसा था नहीं। घोषणा के बाद सोशल मीडिया ने यह कहते हुए आपत्ति दर्ज की कि अब तक कंपनी के बोर्ड में कोई महिला सदस्य शामिल क्यों नहीं थी।
सैंडबर्ग को अब तक जो कुछ मिला है, उस पर उनकी भड़ास को 2010 में एक सम्मेलन में दिए गए उनके इस भाषण से समझा जा सकता है जिसमें उन्होंने कहा था, 'हमारे पास कुछ ही महिला नेतृत्वकर्ता क्यों हैं।' इस भाषण को यूट््यूब पर हाथों हाथ लिया गया और इसे 10 लाख बार देखा गया। पिछले पखवाड़े कॉरपोरेट जगत में निदेशक मंडल में महिलाओं को नजरअंदाज करने का मामला छाया रहा। कॉरपोरेट एशिया में महिलाओं पर किए गए एक अध्ययन में मैकिंजी ने कहा कि 70 फीसदी सीईओ के लिए महिलाओं और पुरुषों के बीच तालमेल बिठाना, उनकी रणनीति का हिस्सा नहीं है। एशिया में तकरीबन 50 फीसदी स्नातक महिलाएं हैं, मगर उनमें से कुछ ही मध्य स्तरीय प्रबंधन में जगह बना पाती हैं, शीर्ष स्तर की तो बात ही छोड़ दीजिए। कॉरपोरेट बोर्ड में औसतन 6 फीसदी सीटों पर महिलाएं बैठी हैं और कार्यकारी समितियों में महिलाओं की हिस्सेदारी 8 फीसदी है।
भारत में तो हालात और भी खराब हैं और महिलाओं की हिस्सेदारी के मामले में वह आखिरी तीन देशों में शामिल है। यहां कॉरपोरेट बोर्ड में महिलाओं की हिस्सेदारी महज 5 फीसदी है। कार्यकारी समितियों में तो महिलाओं का प्रतिनिधित्व महज 3 फीसदी ही है।कुछ प्रबंधन गुरुओं ने इस स्थिति से उबरने के लिए कोटा प्रणाली अपनाने की सलाह दी है। उनका कहना है कि महिलाओं के लिए कोटा प्रणाली को अनिवार्य बनाने से कारोबारी दिग्गजों के लिए यह सुनिश्चित करना आसान हो जाएगा कि उनके बोर्ड में महिलाओं की अच्छी खासी हिस्सेदारी है। नॉर्वे, फ्रांस, स्वीडन और स्पेन ने इसे अपनाकर कुछ हद तक सफलता हासिल की है। उदाहरण के लिए नॉर्वे में कॉरपोरेट बोर्ड में महिलाओं की हिस्सेदारी 2003 में 6 फीसदी थी जो अब बढ़कर 44 फीसदी हो गई है। स्वीडन में तो कॉरपोरेट बोर्ड में महिलाओं की एक चौथाई हिस्सेदारी है। इन उत्साहजनक आंकड़ों के दम पर ही जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल को यह कहने में कोई आपत्ति नहीं हुई कि उनके देश में कॉरपोरेट बोर्ड में पुरुषों का वर्चस्व एक घोटाले की तरह है और कंपनियों के पास इस समस्या को सुलझाने का आखिरी मौका है। अगर वे अब भी ऐसा नहीं कर पाते हैं तो उनके लिए कोटा अनिवार्य बनाया जा सकता है। ब्रिटेन में कॉरपोरेट बोर्ड में महिलाओं की हिस्सेदारी 12 फीसदी है और वहां किसी तरह को कोटा तय नहीं किया गया है। हालांकि ब्रिटेन में एफटीएसई 100 कंपनियों से कहा गया है कि वे 2015 तक बोर्ड में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ाकर कम से कम 25 फीसदी कर लें। अगर वे मौजूदा रफ्तार से यह काम करते रहे तो महिलाओं और पुरुषों की संख्या में संतुलन बिठाने में तकरीबन 70 साल लग जाएंगे।
इन देशों को शुभकामनाएं, मगर क्या कोटा लाने से कोई मकसद पूरा हो पाएगा। जवाब साफ है-नहीं। आप किसी भी कंपनी के सीईओ से यह सवाल पूछ लीजिए, चाहे वह कोई महिला ही क्यों न हो, हर किसी से एक ही जवाब मिलेगा: इस तरह महिला बोर्ड सदस्य बड़ी आसानी से आलोचना की शिकार होंगी। हो सकता है कि उनके बारे में ऐसा कहा जाए कि वे जहां हैं, वहां के लायक नहीं हैं और सिर्फ इसलिए उस जगह पर हैं क्योंकि उन्हें संख्या पूरी करनी है। एक कॉरपोरेट बोर्ड में ऐसे रवैये के लिए जगह नहीं है। इसीलिए बोर्ड में महिलाओं के लिए आरक्षण को कई लोग सिरे से खारिज कर रहे हैं।
अगर फेसबुक मामले की बात करें तो जुकरबर्ग इस पूरे अनावश्यक विवाद को टाल सकते थे। सैंडबर्ग जिस लायक हैं, उन्हें वह पहले ही दे दिया जाना चाहिए था। हालांकि किसी को यह पता नहीं कि जुकरबर्ग ने ऐसा क्यों नहीं किया। ऐसे में सैंडबर्ग की नियुक्ति को कॉरपोरेट बोर्ड में महिला अधिकारों की जीत कहना कहीं से भी ठीक नहीं है।
सीईओ महिलाओं के लिए किसी 'ग्लास सीलिंग' की विचारधारा को भी नकारते हैं। यहां उस विचारधारा की बात की जा रही है जिसके तहत चोटी के पुरुष अधिकारी इस कोशिश में लगे रहते हैं कि बोर्ड में उनका ही साम्राज्य बना रहे। कॉरपोरेट बोर्ड यह कहते हैं कि जब वे बोर्ड सदस्यों का चयन कर रहे होते हैं तो वह इस बात को लेकर परेशान रहते हैं कि कहीं उनकी सोच में भी पुरुषों के चयन वाली बात ही न हावी रहे। आपको लग सकता है कि यहां बातें बढ़ा चढ़ाकर पेश की जा रही हैं, मगर मैकिंजी ने इसकी असल वजह बताई है। जिन प्रतिभागियों को इस सर्वेक्षण में शामिल किया गया उन्होंने बताया कि महिलाओं पर घर और ऑफिस का दोहरा बोझ होता है और यही वजह है कि शीर्ष प्रबंधन महिलाओं और पुरुषों की संख्या संतुलित करने से हिचकता है। दरअसल वरिष्ठ प्रबंधकों से यह उम्मीद की जाती है कि वे कभी भी और कहीं भी काम के लिए तैयार रहेंगे। कुछ और वजहे भी हैं जैसे कि महिलाएं खुद को बढ़ावा देने से कतराती हैं, वे पुरुषों के मुकाबले कम महत्त्वाकांक्षी होती हैं, महिला आदर्शों की कमी और नेटवर्किंग के मामले में महिलाओं का पुरुषों से कमजोर होना।
एक बड़ी कंपनी के एचआर प्रमुख का कहना है: भारतीय दफ्तरों में लिंग भेद को कोसना एक फैशन सा बन गया है, मगर सच्चाई तो यह है कि इसके लिए कुछ हद तक महिलाएं भी जिम्मेदार हैं। बीबीसी की एक रिपोर्ट का उद्घरण पेश करते हुए वह कहते हैं कि इसकी एक वजह सिंड्रेला कॉम्पलेक्स है। यानी कि कोई महिला चाहे कितनी भी सफल क्यों न हो, कहीं न कहीं वह यह चाहेगी कि उसे मुश्किल हालात से निकालने के लिए कोई राजकुमार आएगा। कारोबारी दुनिया के दरवाजे पूरी तरह से खुले हुए हैं, मगर महिलाएं एक संतुलित जीवन की तलाश में यहां कदम रखने से कतराती रही हैं। सच्चाई इन्हीं विचारों के बीच कहीं है। कॉरपोरेट भारत निश्चित तौर पर ज्यादा से ज्यादा महिलाओं को शामिल करना चाहेगा, मगर उन्हीं को जिन्होंने अतीत में खुद को साबित किया है और पेशेवर विकास के लिए प्रयास किया है। पुरुष उम्मीदवारों के आकलन के लिए भी यही शर्तें हैं।
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