अमेरिका के उच्चतम न्यायालय ने हाल में ओबामा प्रशासन के सबसे महत्त्वपूर्ण कानून पर अपनी मुहर लगा दी। यह कानून है किफायती उपचार अधिनियम जो अब 'ओबामाकेयर' के नाम से मशहूर हो गया है। सीधे शब्दों में कहें तो यह कानून सभी अमेरिकियों के लिए स्वास्थ्य बीमा कोअपरिहार्य बना देता है और जिनके पास यह नहीं होगा, उनसे जुर्माना वसूला जाएगा। यह हर्जाना रिपब्लिकन और डेमोक्रेट पार्टियों के बीच विवाद का केंद्र बन गया है। रिपब्लिकन इसे जोर-जबरदस्ती करार दे रहे हैं। मामला अमेरिकी उच्चतम न्यायालय में चला गया जिसने 28 जून को यह फैसला सुनाया कि नया कर लगाना सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है। हालांकि फैसले के बाद यह हर्जाना 'कर' कहलाएगा, यह निर्णय अमेरिका में स्वास्थ्य परिदृश्य को बदल सकता है।
तकरीबन 5 करोड़ अमेरिकियों के पास कोई स्वास्थ्य बीमा योजना नहीं है। कुछ स्वास्थ्य कारणों के चलते कई लोगों के लिए बीमा कराने में मुश्किल आती है। भारी तादाद में लोग अपने नियोक्ता द्वारा खरीदे गए समूह स्वास्थ्य बीमा के दायरे में ही होते हैं लेकिन मौजूदा अनिश्चित समय में कोई भी इसकी अनदेखी नहीं कर सकता। इसका अर्थ यही होगा कि भारी तादाद में लोगों को निजी स्वास्थ्य बीमा भी लेना होगा। ओबामाकेयर ऐसे ही लोगों के लिए है। निश्चित रूप से सरकार को सब्सिडी देनी ही होगी ताकि सभी बीमे का खर्च वहन कर सकें। अमेरिका में स्वास्थ्य सेवाएं बेहद महंगी हैं। वहां अस्पतालों और डॉक्टरों के बीच यह प्रवृत्ति देखी जाती है कि उपचार के मामले में अति हो जाती है। डॉक्टर विभिन्न परीक्षण का सुझाव देते हैं और बेहद महंगी दवाइयां सुझाते हैं। अमेरिकी स्वास्थ्य खर्चों पर अदालती लड़ाई में भी भारी रकम खर्च डालते हैं-यह रुझान साफ संकेत करता है कि स्वास्थ्य सेवाएं आम आदमी की पहुंच से बहुत दूर होती जा रही हैं। ओबामाकेयर के तहत बीमा कंपनी को किसी दवा के आधिकारिक जेनेरिक संस्करण के लिए भुगतान करना होगा। यदि मरीज चाहता कि उसका उपचार ब्रांडेड दवाओं से हो तो इस मामले में खर्च की भरपाई उसे खुद ही करनी होगी। इस तरह भविष्य में किफायती जेनेरिक दवाओं का ही वर्चस्व होगा।
जेनेरिक दवाएं बनाने वाली भारतीय कंपनियों के लिए यह बहुत बड़ा अवसर होगा। अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा बाजार है और वैश्विक दवा बिक्री का 50 फीसदी अमेरिका में ही होता है। इसलिए जब ओबामाकेयर पूरी तरह से अस्तित्व में आ जाएगा तब भारतीय दवाओं के लिए भारी व्यापारिक गुंजाइश बनेगी। मगर इस राह में कुछ डर भी हैं। कुछ गैर-प्रशुल्कीय बाधाएं शायद अधिकांश भारतीय दवा कंपनियों को अमेरिका से दूर कर दें। अधिकांश दवा कंपनियों के नए उत्पाद फिलहाल बाजार में संघर्ष कर रहे हैं, इसलिए वे हरसंभव तरकीब आजमा रही हैं जो सस्ती दवाएं बनाने वाली भारतीय और चीनी कंपनियों से मुकाबला करने में काम आ सकती है। उन्होंने एक सुझाव यही दिया है कि उन्हें पेटेंट वाली दवा के आधिकारिक संस्करण को पेश करने के लिए एक सहायक कंपनी बनानी होगी। इसमें और भी बहुत कुछ हो सकता है, दवा निर्माताओं के तौर पर भारतीय कंपनियां अपने हितों की रक्षा के लिए कुछ भी कर सकती हैं।
मसलन, अगले साल से भारतीय दवा कंपनियों को कोई जेनेरिक दवा पेश करने के लिए संयुक्त राज्य खाद्य एवं औषधि प्रशासन (यूएसएफडीए) की मंजूरी के लिए अधिक शुल्क चुकाना होगा। वहीं अमेरिका स्थित दवा विनिर्माता इकाइयों के लिए यह शुल्क कम होगा। इसके पीछे तर्क यही दिया जा रहा है कि जब इस तरह के आवेदन आएंगे तो उन्हें प्रमाणित करने के लिए यूएसएफडीए के अधिकारियों को भारत का दौरा करना होगा। इससे खर्च बढ़ जाएगा। इसे वसूलने का एक तरीका यही होगा कि विदेशी कंपनियों से आवेदन के समय अधिक शुल्क लिया जाए। यह तार्किक लगता है लेकिन भारतीय दवा क्षेत्र इसे प्रवेश बाधा के रूप में देखता है। एक ओर जहां बड़ी कंपनियां ऊंचा शुल्क दे सकती हैं और उनमें से कुछ इस समस्या से निजात पाने के लिए अमेरिका में फैक्टरी भी खरीद सकती हैं लेकिन भारी संख्या वाली छोटे और मझोले आकार की भारतीय दवा कंपनियां इससे बुरी तरह बुरी तरह प्रभावित होंगी।
केवल अमेरिका में ही नहीं बल्कि सभी पश्चिमी देशों की सरकारें स्वास्थ्य सेवाओं पर बढ़ते खर्च को कम करने के लिए संघर्ष कर रही हैं। सभी को यही महसूस होता है कि जेनेरिक दवाएं ही इस समस्या का हल हो सकती हैं। यही वजह है कि फ्रांस में तो कुछ साल पहले यह चलन भी शुरू हो गया था कि यदि किसी डॉक्टर ने कोई पेटेंट वाली दवा लिखी है और यदि केमिस्ट के पास उसका जेनेरिक संस्करण उपलब्ध हो तो वह ग्राहक को उसकी पेशकश कर सकता है।
फिर भी भारतीय दवा निर्माता कंपनियों के लिए यह बड़ा कारोबारी अवसर होना चाहिए। मगर उन्हें अपनी राह आसान नहीं लग रही। यूरोपीय संघ ने पिछले वर्ष यह अनिवार्य कर दिया था कि सभी आयातित दवाओं पर निर्यातक देशों के दवा नियामकों की संस्तुति होनी चाहिए जो यह पुष्ट करती हो कि वे दवाएं यूरोपीय संघ के मानकों के अनुरूप हैं। भारतीय कंपनियां जानती हैं कि दवा महानियंत्रक से इस तरह की स्वीकृति हासिल करना कितना मुश्किल है। इससे यूरोपीय संघ को होने वाले निर्यात पर संकट के बादल छा गए। उद्योग जगत अब जाकर कुछ हरकत में आया है और उसने सरकार से संपर्क साधा है।
फिलहाल सभी निगाहें अमेरिका और इस बात पर लगी हुई हैं कि अगले कुछ वर्षों में ओबामाकेयर कैसे लागू होता है। इस पर राय बंटी हुई है। हर कोई इस हालात को बेहद दिलचस्पी के साथ देख रहा है। आईपीएसओएस/रॉयटर्स के एक सर्वेक्षण में यह बात सामने आई है कि उच्चतम न्यायालय के फैसले के बाद ओबामाकेयर को लेकर बनी नकारात्मक धारणा कुछ कमजोर हुई है। मगर विपक्ष भी अपनी बात बुलंद करने में जुटा है। राष्ट्रपति पद के रिपब्लिकन उम्मीदवार मैट रोमनी ने कहा है कि यदि नवंबर में वह राष्ट्रपति चुने जाते हैं तो सत्ता में आने पर इस कानून को बदल देंगे। रोमनी के चुनाव अभियान प्रबंधक ने दावा किया है कि अदालत के फैसले के बाद उन्हें 24 घंटे में 46 लाख डॉलर का चंदा मिला। भारतीय कंपनियों के लिए इस बाजार में संभावनाएं तो बहुत हैं लेकिन सवाल यह है कि क्या उन्हें टिकने दिया जाएगा?
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