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आर्थिक समायोजन की कमी से समस्या बढ़ी
राजीव मलिक /  July 11, 2012

यह विडंबना ही है कि महज कुछ वर्ष पहले भारत के लिए सबकुछ ठीक चल रहा था और वह वैश्विक वित्तीय संकट से भी बेहद आत्मविश्वास के साथ उबर आया था लेकिन इस समय वह एशिया की निहायत कमजोर अर्थव्यवस्था बन चुका है। यह भी सच है कि एशिया के किसी अन्य देश ने अपनी आर्थिक समस्याओं को लेकर इस कदर गलत अनुमान नहीं लगाए और नही इस कदर नीतिगत गलतियां कीं। इन गलतियों ने पहले से चुनौतीपूर्ण बन चुके हालात को और अधिक बिगाड़ दिया, जटिलताएं बढ़ाईं और इनकी बदौलत सुधारात्मक कदमों में देरी हुई। इसी तरह किसी अन्य एशियाई देश में वृहद आर्थिक समायोजन को इतना गलत नहीं समझा गया जितना भारत में। अदूरदर्शी नीतियों तथा नीतिगत कदम नहीं उठाए जाने के कारण आर्थिक समस्याओं में और अधिक इजाफा हुआ। अस्थायी हल तलाश करने तथा कारण के बजाय लक्षणों पर ध्यान देने से भी हालात बिगड़ते चले गए।
भारत इस समय वैश्विक स्तर पर भरपूर नकदी वाले वातावरण में समायोजन की कोशिश कर रहा है। वैश्विक स्तर पर जोखिम के आने/ जाने के माहौल के बीच आशावाद तथा निराशावाद की लहरें आती जाती रहेंगी और उनका सामना घरेलू स्तर पर अनुकूल अथवा प्रतिकूल खबरों से हो सकता है। दरअसल बहुत अधिक बढ़ चुके चालू खाता घाटे की भरपाई के लिए अस्थिर विदेशी पूंजी पर बहुत अधिक निर्भरता ने भारत को जोखिम वाला बना दिया है। वहीं हाल के वर्षों में सुधारों की गैर मौजूदगी ने उसकी परेशानियों में और अधिक इजाफा किया है।
मौजूद वृहद आर्थिक समायोजन के जिस पहलू की सबसे कम सराहना की गई है वह है वैश्विक तरलता का असर। वर्ष 2003 और 2007 के बीच वैश्विक स्तर पर तरलता में जो इजाफा हुआ उसकी वजह से ऐसे वैश्विक और घरेलू कारक उत्पन्न हुए जिनकी बदौलत अप्रत्याशित आर्थिक विकास हुआ तथा शेयर बाजार में भी तेजी आई। यह सब तब हुआ जबकि इस अवधि में कच्चे तेल की कीमतों में चार गुना इजाफा हुआ।
समन्वित नीतिगत प्रतिक्रिया ने हमें वैश्विक वित्तीय संकट के असर से बचाया। लेकिन उसके बाद की वित्तीय अनियमितता ने आर्थिक चक्र को असामान्य बना दिया। जिसकी वजह विकास गति में कमजोरी के बावजूद मुद्रास्फीति में जबरदस्त तेजी देखने को मिली। इसके पश्चात भुगतान संतुलन पर दबाव देखने को मिला और रुपये में अभूतपूर्व मूल्यह्रास हुआ। आने वाले वर्षों में देश के भुगतान संतुलन को तीन मुख्य समायोजनों की आवश्यकता होगी जिनके लिए वैश्विक कारकों पर भरोसा नहीं किया जा सकता है।
पहली बात, चालू खाता घाटे को सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 4.2 फीसदी के मौजूदा स्तर से घटाकर 2-2.5 फीसदी के स्तर पर लाना होगा। दूसरा चालू खाता घाटे की भरपाई के लिए आने वाले वित्त का बड़ा हिस्सा लंबी अवधि का होना चाहिए जो जोखिम वाली वैश्विक पूंजी पर उतना अधिक निर्भर नहीं हो। तीसरी बात, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) को विदेशी मुद्रा भंडार में इजाफा करना होगा। विदेशी मुद्रा संग्रह की गति में नाटकीय बदलाव आया है। यह मुख्यतया इसलिए हुआ क्योंकि रुपये के प्रबंधन को लेकर आरबीआई के रुख में भी बदलाव आया है। परिणामस्वरूप विदेशी मुद्रा भंडार के कारण आयात को मिलने वाली मदद पर भी नकारात्मक असर हो रहा है।
यह निष्कर्ष पूर्वनिश्चित है कि आरबीआई को विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ाने की आवश्यकता होगी अथवा देश का बाह्य तरलता अनुपात आगे और बिगड़ेगा। ऐसे निष्कर्षों से सॉवरिन क्रेडिट रेटिंग  एजेंसियों की चिंता और बढ़ेगी। बहरहाल, विदेशी मुद्रा भंडार में इजाफा केवल तभी होगा जब भारत भुगतान संतुलन अधिशेष की स्थिति में पहुंचेगा और आरबीआई रुपये के अधिमूल्यन को रोकने के लिए हस्तक्षेप करेगा। भारत अभी उस स्थिति में नहीं पहुंचा है लेकिन चालू खाता घाटे को लेकर मौजूदा समायोजन उसी दिशा में बढ़ाया
गया कदम है। हम केवल सोने के आयात को नियंत्रित करने पर भरोसा नहीं कर सकते। हालांकि उसमें हो रहा इजाफा भी यही बताता है कि मुद्रास्फीति पर नियंत्रण में यकीन कम हो रहा है। वैसे भी सोने का आयात एक तरह से पूंजी के बहिर्गमन के समान है। अगर इसमें कमी आती है तो चालू खाता घाटे की स्थिति में सुधार होगा। चालू खाते पर इसके असर की अनदेखी नहीं की जा सकती। लेकिन जब तक उच्च मुद्रास्फीति पर नियंत्रण नहीं होता है तब तक घरेलू स्तर पर बचत के लिए लोग दूसरी राह तलाशते रहेंगे। 
कहने का तात्पर्य यह है कि दबाव के अधिकांश बिंदु रुपये की ओर ले जाते हैं। हाल के वर्षों में आरबीआई ने रुपये के प्रबंधन को लेकर दोनों सिरों पर काम किया। वैश्विक आर्थिक मंदी के पहले के वर्षों में मौद्रिक हस्तक्षेप की वजह से मुद्रास्फीति बढ़ी क्योंकि कुल भुगतान संतुलन अधिशेष का मौद्रीकरण किया गया। लेकिन उक्त संकट के बाद के समय में वृहद चालू खाता घाटे ने आक्रामक मौद्रिक हस्तक्षेप की जरूरत पूरी तरह खत्म कर दी। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि पूंजी की आवक ने चालू खाता घाटे की पूर्ति करनी आरंभ कर दी। लेकिन आरबीआई के इस रुख ने वास्तविक प्रभावी विनिमय दर (आरईईआर) के संदर्भ में रुपये का अधिमूल्यन होने दिया। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि भारत में महंगाई दर उसके अन्य कारोबारी साझेदार मुल्कों के मुकाबले अधिक थी। इस तरह देखा जाए तो मुद्रा के मूल्य में गिरावट आना समाधान का हिस्सा है न कि समस्या का। यह बात खासतौर पर सही है क्योंकि ऊंची ब्याज दरों के बावजूद मुद्रास्फीति का मुकाबला उस कदर नहीं किया जा रहा है जितना कि किया जा सकता है। आरबीआई राजकोषीय घाटे का मौद्रीकरण कर रहा है जिसकी बदौलत सरकारी बॉन्ड की कीमत कृत्रिम तौर पर नीची रखी गई है।
विनिमय दर में परिवर्तन का असर महंगाई पर पड़ता है लेकिन यह ध्यान में रखना चाहिए कि अधिक मात्रा में पूंजी आकर्षित करने का यह मतलब कतई नहीं होता है कि रुपये को ऊंची मुद्रास्फीति के मुताबिक समायोजित करने की कोई आवश्यकता ही नहीं है। यह देखते हुए कि आने वाले वर्षों में वैश्विक तरलता बहुत अधिक अनुकूल नहीं होगी ऐसे में भारतीय नीति निर्माताओं के पास एक विकल्प मौजूद होगा: या तो वे मुद्रास्फीति को निर्णायक रूप से नीचे लाएं या फिर मुद्रास्फीति पर कमजोर और बिना तालमेल के नियंत्रण पाने की जद्दोजहद में लगे रहें। दूसरी संभावना अधिक है। लेकिन अगर ऐसा किया गया तो रुपया सालाना मूल्यह्रास के भुला दिये गए दौर में वापस पहुंच जाएगा। हालांकि ऐसा नजरिया निवेशकों और विश्लेषकों को परेशान कर सकता है लेकिन इस पर विचार जरूर किया जाना चाहिए। हाल के वर्षों में विनिमय दर प्रबंधन से भारतीय नीति निर्माताओं को कम से कम यह सबक तो सीख ही लेना चाहिए था।

Keyword: growth india, economy,recession,
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