सरकार के जेनेरिक दवाओं को जन स्वास्थ्य प्रणाली के जरिये नि:शुल्क मुहैया कराये जाने संबंधी प्रस्ताव की खबर को दो तरह से देखा जा सकता है। एक ओर यह जन स्वास्थ्य की व्यवहार्यता और पहुंच में सुधार के रूप में शायद बहुत बड़े बदलाव की वजह बन सकता है। वहीं दूसरी ओर इसकी प्रभावोत्पादकता इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या स्वास्थ्य सेवा मुहैया कराने के तरीके में सुधार के लिए जरूरी उपाय भी अपनाए जाते हैं? अभी देश के अधिकांश राज्यों में यह सुविधा बहुत बुरी स्थिति में है। 12वीं पंचवर्षीय योजना के लिए दवाओं और खाद्य पदार्थों संबंधी योजना आयोग के कार्य समूह ने अनुमान लगाया है कि देश का जन स्वास्थ्य क्षेत्र महज 22 फीसदी आबादी की देखरेख कर पाता है। इलाज का महंगा खर्च आम घरों पर बहुत अधिक बोझ डाल सकता है। औसतन 78 फीसदी मरीज इलाज पर खुद खर्च करते हैं। इनमें से 72 फीसदी दवाएं खरीदते हैं। आश्चर्य नहीं कि देश की ग्रामीण आबादी का 30 फीसदी और शहरी आबादी का 20 फीसदी हिस्सा वित्तीय वजहों से सामान्य बीमारियों को यूं ही बर्दाश्त कर लेता है। इससे भी बुरी बात यह है कि ग्रामीण इलाकों में मरीजों के अस्पताल में भर्ती होने के जितने भी मामले होते हैं उनमें से आधे मामलों में इलाज के लिए या तो ऋण लिया जाता है या फिर संपत्ति की बिक्री कर दी जाती है। परिणामस्वरूप, चिकित्सा ग्रामीण इलाकों में कर्ज की दूसरी सबसे बड़ी वजह बनकर उभरा है। इसी तरह देश में हर वर्ष करीब 3.9 करोड़ लोग बीमारी के कारण गरीबी के शिकार हो जाते हैं। ऐसे में यह नयी योजना सैद्घांतिक रूप से तो भारतीय स्वास्थ्य सेवा की अर्थव्यवस्था की निष्क्रियता से निपटने में सक्षम दिखाई देती है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय को उम्मीद है कि 12वीं योजना के अंत तक यह कार्यक्रम देश की 50 फीसदी आबादी तक पहुंच बना लेगा। अगर ऐसा होता है तो यह एक उल्लेखनीय उपलब्धि होगी। निश्चित तौर पर देश में निजी क्षेत्र की स्वास्थ्य सुविधाओं में विकास के बावजूद स्वास्थ्य क्षेत्र में सरकारी खर्च अभी भी जरूरतों से काफी कम है। केंद्र और राज्य मिलकर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 1.1 फीसदी जन स्वास्थ्य पर खर्च करते हैं। कुछ सूचकांकों के मुताबिक जन स्वास्थ्य खर्च के मोर्चे पर भारत दुनिया नीचे से आठवें क्रम पर है। इसलिए आश्चर्य नहीं कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने फरवरी में योजना आयोग को निर्देश दिया था कि 12वीं योजना के दौरान स्वास्थ्य सेवा खर्च को जीडीपी का 2.5 फीसदी किया जाए। नयी योजना राजस्थान और आंध्र प्रदेश में राज्य स्तर पर शुरू की गई पहलों के बाद तथा तमिलनाडु में 1995 से सफलतापूर्वक संचालित नि:शुल्क दवा कार्यक्रम को आधार बनाकर शुरू की गई है। तमिलनाडु ने एक स्वायत्त संस्था की स्थापना की जो एक पारदर्शी नीलामी प्रक्रिया के तहत सीधे दवा निर्माताओं से जेनेरिक दवा खरीदती है जिसे प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और अस्पतालों को आवंटित किया जाता है। इससे भ्रष्ट आचरण का पूरी तरह खात्मा नहीं हो सका है लेकिन फिर भी उन पर लगाम लगी है। बहरहाल, निशुल्क दवा कार्यक्रम की सफलता की पहली शर्त है मौजूदा स्वास्थ्य सेवा व्यवस्था को मजबूत बनाना। इसका बीते कई वर्षों के दौरान विस्तार होता रहा है लेकिन उसमें कोई मजबूती नहीं आई है। देश के 640 जिला अस्पतालों, 23,000 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और 5,000 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में से अधिकांश में कर्मचारियों व उपकरणों की कमी है। इनके लिए वित्तीय सहायता का सवाल तो है ही। दवाओं पर खर्च होने वाले 27,000 करोड़ रुपये कहां से आएंगे? क्या नकदी की किल्लत से जूझ रही सरकार के लिए खर्च करने का यही सही वक्त है?
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