| नेयवेली लिग्नाइट: कम झंझट | | प्रिया कंसारा पंड्या / July 08, 2012 | | | | |
जहां ताप विद्युत उत्पादकों को ईंधन उपलब्धता और मूल्य निर्धारण की समस्याओं से जूझना पड़ रहा है वहीं नेयवेली लिग्नाइट कॉरपोरेशन (एनएलसी) इनसे दूर है। इस संबंध में कंपनी उचित विकास संभावनाओं के साथ अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में है। इसलिए इसके एफपीओ को अच्छी प्रतिक्रिया मिल सकती है।
ताप विद्युत में विविधीकरण का अपेक्षित परिणाम सामने आने में वक्त लग सकता है। नई क्षमताओं के निर्माण की प्रक्रिया में पहले ही विलंब हो चुका है। ईंधन आपूर्ति की समस्या बरकरार रहने पर कुछ परियोजनाओं को अलाभकारी रहने के खतरे का भी सामना करना पड़ रहा है। हालांकि इससे एनएलसी की दीर्घावधि विकास संभावनाओं को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं, लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि इनका असर शेयर पर पहले ही दिख चुका है, जो 2012-13 की अनुमानित आय के 10 गुना पर कारोबार कर रहा है।
मजबूत स्थिति
एनटीपीसी की तरह नेवेली भी विनियमित बिजनेस मॉडल (मर्चेंट पावर एक्सपोजर नहीं) के तहत काम करती है, जो गारंटीड रिटर्न प्रदान करता है। मौजूदा समय में ज्यादातर विद्युत उत्पादकों के लिए ईंधन सबसे बड़ी चिंता है, लेकिन नेवेली के साथ ऐसा नहीं है, क्योंकि कंपनी 100 फीसदी ईंधन सुरक्षा के साथ पूरी तरह एकीकृत है। इसकी लिग्नाइट-आधारित क्षमता 2,740 मेगावॉट की है और यह 3.06 करोड़ टन की क्षमता वाली इसकी चार परिचालन कैप्टिव खदानों द्वारा पूरी तरह समर्थित है।
कंपनी को प्राप्तियों के संदर्भ में भी अपेक्षाकृत कम समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है और राज्य विद्युत बोर्डों (एसईबी) द्वारा वापसी की संभावना कम है। लिग्नाइट-आधारित बिजली अपेक्षाकृत सस्ती है। कंपनी की लो गियरिंग (वित्त वर्ष 2012 में इक्विटी के मुकाबले 0.5 गुना शुद्घ कर्ज से कम), अधिक प्रमोटर शेयरधारिता 93.56 फीसदी पर रहने, परिचालन से मजबूत नकदी प्रवाह एवं नवरत्न दर्जे आदि से भी परियोजनाओं के वित्त पोषण में मदद मिलेगी।
प्रमुख योजनाएं
जैसा कि ऊपर बताया जा चुका है, नेयवेली के सभी विद्युत स्टेशन फिलहाल लिग्नाइट-आधारित हैं। भारत लिग्नाइट के विशाल भंडार (लगभग 40 अरब टन) से लैस है और इसका 80 फीसदी तमिलनाडु में है। इस 80 फीसदी में से 20-25 फीसदी काफी गहराई में, सतह से 300 मीटर नीचे है। इसके दोहन के लिए प्रौद्योगिकी आसानी से कहीं भी उपलब्ध नहीं है। दूसरे शब्दों में, जहां लिग्नाइट आधारित बिजली में अपार अवसर हैं, वहीं चुनौतियां भी मौजूद हैं। अपने राजस्व प्रवाह में नयापन लाने के लिए कंपनी ने ताप विद्युत और अक्षय ऊर्जा (तमिलनाडु में 50 मेगावॉट विंड फार्म और 10 मेगावॉट सोलर फार्म) के लिए बड़ी योजनाएं बनाई हैं। कंपनी ने हाल में उत्तर प्रदेश में 1980 मेगावॉट के साथ कोयला-आधारित क्षमता जोडऩे की घोषणा की जिसके 2016 तक चालू हो जाने की संभावना है। दीर्घावधि में कंपनी ने तमिलनाडु, झारखंड, उड़ीसा और मध्य प्रदेश में ऐसी परियोजनाएं स्थापित करने की योजना बनाई है। कुल मिला कर एनएलसी ने वित्त वर्ष 2017 तक 10,000 मेगावॉट की क्षमता हासिल करने का लक्ष्य रखा है जिससे 40,200 करोड़ रुपये की लागत जुड़ी होगी। इसमें वित्त वर्ष 2013 में 500 मेगावॉट की नेवेली टीपीएस-2 विस्तार और 1000 मेगावॉट की तूतीकोरिन विस्तार परियोजना भी शामिल हैं।
मूल्यांकन
इस शेयर ने 16 फरवरी को 105.3 रुपये की 52 सप्ताह की ऊंचाई को छुआ था, लेकिन उसके बाद से इसमें 20 फीसदी तक की गिरावट आ चुकी है। 84.40 रुपये की मौजूदा कीमत पर यह एनटीपीसी के 14 गुना और एनएचपीसी के 11 गुना की तुलना में धीमे मूल्यांकन पर कारोबार कर रहा है।
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