| पोस्को विरोधी खेमे में दरार से राह हुई आसान | | दिलीप सत्पथी / भुवनेश्वर July 03, 2012 | | | | |
जब पोस्को-विरोधी खेमे ने पिछले सप्ताह उड़ीसा के पारादीप के निकट ढिंकिया में दक्षिण कोरियाई कंपनी की इस्पात परियोजना के खिलाफ अपने आंदोलन की सातवीं वर्षगांठ मनाई थी तो इसकी गूंज उनके खेमे में दरार की अफवाह के बीच दब कर रह गई थी। लेकिन सात वर्षों के संघर्ष के बाद पोस्को प्रतिरोध संग्राम समिति (पीपीएसएस) अब विभाजन के कगार पर है, क्योंकि इसके कई समर्थक नेतृत्व की मौजूदा कार्य प्रणाली से नाराज हैं।
इसे भांप कर सरकार के स्वामित्व वाली भूमि अधिग्रहण एजेंसी इंडस्ट्रियल इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कॉरपोरेशन ऑफ उड़ीसा (इडको) 1.2 करोड़ टन की इस्पात परियोजना के लिए फिर से भूमि अधिग्रहण की योजना की तैयारी में जुट गई है जिसे एक साल पहले रद्द कर दिया गया था। समिति में दरार ऐसे समय सामने आई है जब गोबिंदपुर गांव से पोस्को-विरोधी कार्यकर्ता 22 जून की विरोध बैठक में नहीं आए। यह बैठक उड़ीसा सरकार के साथ पोस्को के सहमति पत्र की सातवीं वर्षगांठ के लिए हुई थी। अब असंतुष्टों ने आगे की कार्रवाई के लिए अलग समिति बनाई है। समिति के वरिष्ठ नेता बाबुली राउत ने कहा, 'मौजूदा नेतृत्व पर हमारा विश्वास खत्म हो गया है।'
पीपीएसएस में मतभेद से इस परियोजना पर सकारात्मक असर पड़ सकता है। पोस्को को परियोजना के लिए 4,004 एकड़ भूमि चाहिए जिसमें से 2000 एकड़ पर सरकार का ही कब्जा है। कंपनी ने कहा है कि यदि उसे अतिरिक्त 700 एकड़ भूमि (गोबिंदनगर गांव के नजदीक) मुहैया कराई जाती है तो वह परियोजना के पहले दो चरणों के लिए काम शुरू कर सकती है जिसमें प्रत्येक में 40 लाख टन शामिल है। पिछले साल विरोध के बाद प्रशासन ने इस परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण रोक दिया था।
फिलहाल इडको भूमि अधिग्रहण फिर शुरू करने की योजना बना रही है। यह रणनीति लोगों के साथ संपर्क बनाने, उनकी शिकायतें दूर करने और ग्रामीणों की मदद के लिए विभिन्न विकास कार्यक्रम चलाए जाने आदि पर आधारित है। परियोजना और आसपास के आठ गांवों के लिए विकास कार्यों की रूपरेखा बनाई गई है। इसमें कंक्रीट सड़कों का निर्माण, पेयजल की व्यवस्था, स्कूलों का उन्नयन, स्व-सहायता समूहों और पंचायतों के लिए मदद आदि शामिल है। यह पैकेज लगभग 250 करोड़ रुपये का है जिसमें से अधिकतर रकम पोस्को देगी।
एक अधिकारी ने कहा, 'प्रस्ताव पोस्को को भेज दिया गया है। जब कंपनी इस पर राजी हो जाएगी, तो फिर आगे के कदमों की पहचान की जाएगी और गोबिंदपुर में अतिरिक्त 700 एकड़ भूमि की खरीदारी के लिए प्रयास तेज किए जाएंगे।' उन्हें उम्मीद है कि अगले कुछ सप्ताहों में हालात में निश्चित रूप से बदलाव आएगा और इस साल अक्टूबर के आसपास परियोजना पर काम शुरू हो सकता है।
साथ ही सरकार पोस्को और उसकी भारतीय सहायक कंपनी पोस्को इंडिया के साथ तितरफा समझौते का मसौदा तैयार कर रही है जिसे सहमति पत्र में तब्दील किया जाएगा। इसकी अवधि जून 2010 में समाप्त हो चुकी है। लेकिन भूमि अधिग्रहण और त्रिपक्षीय समझौते के अलावा दक्षिण कोरियाई कंपनी को कई अन्य समस्याओं से भी जूझना पड़ रहा है। इनमें ग्रीन ट्रिब्यूनल द्वारा पर्यावरण मंजूरी को टालना और निजी इस्तेमाल की खदान के लिए लाइसेंस को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में लंबित मामले आदि शामिल हैं।
'पोस्को के साथ तितरफा समझौता अंतिम चरण में'
उड़ीसा सरकार दक्षिण कोरियाई इस्पात कंपनी पोस्को और इसकी भारतीय इकाई के साथ नए समझौते पर हस्ताक्षर के अंतिम चरण में है। समझौते के लिए मुख्यमंत्री नवीन पटनायक की मंजूरी का इंतजार है।
पोस्को इंडिया की उसके उप प्रबंध निदेशक हो चान रयू के नेतृत्व में एक उच्चस्तरीय टीम ने परियोजना की प्रगति के बारे में बताने के लिए राज्य के मुख्य सचिव बी के पटनायक से बातचीत की है। पटनायक ने कहा, 'मैंने पोस्को इंडिया के अधिकारियों के साथ बातचीत की। त्रिपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर के लिए सभी औपचारिकताएं लगभग पूरी हो गई हैं और इस पर जल्द ही हस्ताक्षर हो जाएंगे। बातचीत कंपनी के लिए भूमि स्थानांतरण और पर्यावरण मंजूरी के मुद्दे पर केंद्रित है।' पोस्को इंडिया के अधिकारियों ने इस पर कोई टिप्पणी नहीं दी है।
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