| पी नोट छूट से कुछ परदेसी निवेशक खफा | | एन सुंदरेश सुब्रमण्यन / नई दिल्ली July 03, 2012 | | | | |
पार्टिसिपेटरी नोट (पी नोटों) को जनरल ऐंटी-अवॉयडेंस रूल्स (गार) के प्रावधानों से हाल में दी गई छूट से कुछ विदेशी संस्थागत निवेशक (एफआईआई) खफा हैं।
जहां एफआईआई और उनके जरिए मॉरिशस और दूसरी जगहों के रास्ते भारत में निवेश करने वालों के लिए यह खतरा हो सकता है कि अगर वे 'इकॉनॉमिक सबस्टेंस' परीक्षा पर खरे नहीं उतरते हैं तो उन्हें कर संधि के फायदों से वंचित कर दिए जाएं, मगर पी नोटों के निवेशक जो एफआईआई के जरिए भारतीय बाजारों में निवेश करते हैं उन्हें ऐसी किसी परीक्षा से गुजरे बिना कर छूट का लाभ मिलेगा।
पी नोट शेयर या डेरिवेटिव के एवज में जारी किए जाने वाले डेरिवेटिव संसाधन हैं। भारत में पंजीकृत एफआईआई इन्हें उन विदेशी क्लाइंटों को जारी करते हैं जो यहां के बाजारों में निवेश के पात्र नहीं हैं। पी नोट धारकों को उन शेयरों के मूल्य में बढ़ोतरी का लाभ मिलता है।
छोटे एफआईआई जो पी नोट नहीं खरीदते हैं और न ही उन्हें जारी करते हैं, उनका मानना है कि गार से छूट नियमों और सरकारी नीतियों के अनुरूप नहीं हैं जिन्होंने साल दर साल पी नोटों के इस्तेमाल के प्रति उदासीनता बढ़ाई है और यह उन निवेशकों के साथ अन्याय है जो नियमों के हिसाब से चलते हैं।
कैलिफोर्निया के एक एफआईआई ईएम कैपिटल मैनेजमेंट के सीईओ सेथ आर फ्रीमैन ने बताया, 'गार के बारे में हमें फिलहाल जो समय आया है वह यह है कि पी नोटों का गार से कुछ लेना देना नहीं होगा। हम एफआईआई हैं और हम सीधे भारतीय बाजारों में शेयर खरीद कर निवेश करते हैं। हमनें कभी पी नोटों का इस्तेमाल नहीं किया है। पिछले 8 सालों से हम यही सुनते आए हैं कि पी नोट को अधिक पसंद नहीं किया जाता, पी नोट काले धन से बचने का एक जरिया है और पी नोट भारतीय शेयरों के असल अधिकार को कम करते हैं। गार की मदद से पी नोटों की समस्या को दूर करने के बजाय, जल्दी से यह स्पष्ट किया गया कि पी नोटों पर कोई असर नहीं पड़ेगा। मेरा मानना है कि यह उनके साथ गलत व्यवहार है जिन्होंने समय और पैसा लगाकर एफआईआई के तौर पर खुद को पंजीकृत कराया है।'
गौरतलब है कि सेबी के पास 1600 से अधिक एफआईआई पंजीकृत हैं जिनमें से कुछ बड़ी कंपनियां ही पी नोट के कारोबार में हिस्सेदार हैं। अप्रैल में एफआईआई के कुल ऐसेट में पी नोटों की हिस्सेदारी महज 8 फीसदी थी।
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