रियो डी जनेरियो में होने जा रहे सतत विकास संबंधी संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में हालांकि कुछ महत्त्वपूर्ण शख्सियत गैरमौजूद रहेंगी लेकिन इसके बावजूद कम से कम 120 देशों के प्रमुख उसमें हिस्सा लेंगे। वहां काम इतना अधिक हतोत्साहित करने वाला है कि वे यह मानकर चल रहे हैं कि ऐसी नीति बना पाना लगभग असंभव है जिसके जरिये पृथ्वी के अनुकूल आर्थिक विकास जो गरीबी तथा भूख खत्म करने पर केंद्रित हो तथा जिसके तहत पृथ्वी के प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करते हुए लोगों की मूलभूत जरूरतों को पूरा किया जा सके। यह काम जितना कठिन नजर आ रहा है दरअसल यह उससे अधिक चुनौतीपूर्ण है। सम्मेलन से पहले जारी संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट कहती है कि वर्ष 1992 में रियो में आयोजित मूल पृथ्वी सम्मेलन में जिन 90 के करीब लक्ष्यों पर सहमति बनी थी उनमें से कमोबेश चार में ही थोड़ी बहुत तरक्की हुई है। बहरहाल, यह सम्मेलन बाद में वैश्विक स्तर पर हुए कई महत्त्वपूर्ण और अस्वाभाविक सम्मेलनों का जनक जरूर बना। इनमें जैव विविधता समझौता, जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र का समझौता- जो आगे चलकर क्योटो प्रोटोकॉल की वजह बना, मरुस्थलीकरण से निपटने संबंधी संयुक्त राष्ट्र समझौते और सामाजिक विकास पर कोपेनहेगन समझौता समेत कई अन्य समझौते शामिल हैं। यह दुख की बात है कि जलवायु परिवर्तन के अलावा इनमें से कुछ समझौतों पर बाद में उस कदर ध्यान नहीं दिया गया। जलवायु परिवर्तन पर भी क्योटो समझौता इस वर्ष समाप्त हो रहा है जबकि न तो इसके लक्ष्यों की प्राप्ति हो सकी और न ही इसके बाद किसी समझौते पर सहमति बन सकी। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि कुल मिलाकर पृथ्वी पर जीवित प्राणियों की स्थिति 20 वर्ष पहले की तुलना में खराब ही हुई है। भविष्य को लेकर भी कोई खास उम्मीद नहीं है क्योंकि इंसानों द्वारा सालाना पृथ्वी की पुनरुत्पादन क्षमता के मुकाबले डेढ़ गुना प्राकृतिक संसाधनों का दोहन किया जा रहा है। भारत में पिछले दिनों कई ऐसे कानून तथा नीतिगत कदम उठाए गए जिनके जरिये संसाधनों का प्रबंधन संभव है। इनमें पर्यावरण एवं जैव विविधता संरक्षण कानून और जलवायु परिवर्तन से निपटने के संबंध में कई अभियान शामिल हैं। इसके अलावा गरीबी, कुपोषण तथा मूलभूत सुविधाएं हासिल करने के लिए सहस्राब्दि विकास लक्ष्य हासिल करने की दिशा में तो काम किया ही जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय वार्ताओं में भारत की छवि समझौतों को आकार देने में मदद करने वाले देश के बजाय उनको बिगाडऩे वाले देश की है। लेकिन इस स्तर के किसी सम्मेलन में वह नकार की स्थिति में नहीं है। बहरहाल, उसे 'एकाकीपन' के भय को खुद पर हावी नहीं होने देना चाहिए जैसे कि उसने कोपेनहेगन जलवायु सम्मेलन में चीन के साथ गठजोड़ बना कर किया था। रियो में मुख्य प्रयास है अमेरिका से उन परिवर्तनों पर हस्ताक्षर कराना जो विकासशील देश चाहते हैं और यह सुनिश्चित करना कि यूरोप के बेहतर प्रदर्शन करने वाले देश पर्यावरण प्रावधानों की आड़ लेकर व्यापारिक विकृतियों को अंजाम न दें। ऐसे में चीन भारत का स्वाभाविक साझेदार नहीं है क्योंकि वह अब लगभग विकसित देशों के बराबर ही प्रदूषण फैलाता है। हमारी समुद्री सीमा लंबी और अपर्याप्त सुरक्षा वाली है। उसे जलवायु परिवर्तन से अधिक जोखिम भी है (कल्पना कीजिए कि मॉनसून के रुख में बदलाव से क्या कुछ हो सकता है। प्रतिबंधात्मक समझौता हमारी अर्थव्यवस्था को भी नुकसान पहुंचाएगा। इन तमाम बातों को ध्यान में रखते हुए भारत के वार्ताकारों को नयी राह तलाश करने में अग्रणी भूमिका निभानी चाहिए।
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