| 33 दवाओं को बाजार से हटाने से इनकार किया | | सुष्मि डे / नई दिल्ली June 19, 2012 | | | | |
सिप्ला, इलाई लिली, नोवार्तिस और ग्लैक्सो स्मिथक्लाइन जैसी दिग्गज दवा कंपनियां अब राहत की सांस ले सकती हैं क्योंकि ऐसी दवाएं जिनकी स्वीकृति संबंधी प्रक्रिया पर हाल में संसद की स्थायी समिति ने सवाल उठाया था, उनकी बाजार में उपलब्धता बरकरार रहेगी। संसद ने भारतीय मरीजों पर परीक्षण किए बिना 33 दवाओं को मंजूरी देने पर गंभीर चिंता जाहिर की थी।
देश में बिक्री के लिए दवाओं को मंजूरी देने वाले दवा नियामक ने उन 33 दवाओं की समीक्षा या बाजार से वापस लेने की बात से इनकार कर दिया, जिनको भारत में जनवरी 2008 और अक्टूबर 2010 के बीच बगैर मानव ट्रायल के स्वीकृति दी गर्ई थी।
बिना ट्रायल के स्वीकृत दवाओं में नॉवर्तिस की संक्रमणरोधी क्लूबिसिन, इलाई लिली की कैंसर की दवा ऐलिम्ता और मर्क की एचआईवी के उपचार में इस्तेमाल की जाने वाली इसेंट्रेस शामिल हैं।
स्थायी समिति ने क्लीनिकल अध्ययन के लिए अनिवार्य चरण-3 को पूरा किए बिना सिप्ला की एंटीबायोटिक दवा कॉलिस्टिमेथेट और फेफड़े के जख्मों के उपचार के लिए पीरफेनिडोन, यूसीबी की मिचली, उलटी व चक्कर आने में ली जाने वाली दवा बूसलीजाइन और जीएसके की दवा ऐंब्रीसेनेटन की बिक्री पर खिंचाई की थी।
जहां स्थायी समिति ने देश में क्लीनिकल ट्रायल किए बगैर इन दवाओं की नियम विरुद्ध मंजूरी पर गंभीर चिंता जाहिर की थी, वहीं दवा नियामक ने दावा किया है कि इन दवाओं के लिए लाइसेंस देने में सभी नियमों और शर्तों का पालन किया गया था। ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (डीसीजीआई) जी एन सिंह ने बिज़नेस स्टैंडर्ड को बताया, 'इन सभी दवाओं को उस समय के नियमों, शर्तों और जरूरतों के आधार पर मंजूरी दी गई थी। इस प्रक्रिया में कोई मध्यस्थ नहीं था।' उन्होंने कहा, 'इन दवाओं को बाजार से हटाना कोई समाधान नहीं है, दवाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने की जरूरत है और विशेषज्ञ समिति इस मामले को देख रही है, जिसमें ये 33 दवाएं ही शामिल नहीं है बल्कि भविष्य में आने वाली सभी दवाएं शामिल हैं।'
मई में संसद की स्थायी समिति द्वारा रखी गई रिपोर्ट में कहा गया था, 'इस बात का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है कि ये 33 दवाएं वास्तव में प्रभावी हैं और भारतीय मरीजों के लिए सुरक्षित हैं।'
हालांकि सिंह ने कहा कि नियामक इन लाइसेंसों को रद्द करने पर विचार नहीं कर रहा है, भले ही स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा बनाए गए विशेषज्ञ पैनल ने इस बात की सिफारिश की हो।
स्थायी समिति की रिपोर्ट के क्रम में मंत्रालय ने बिना क्लीनिकल ट्रायल के नई दवाओं की स्वीकृति के आधार को जांचने, ऐसी मंजूरी व प्रक्रियागत सुधार के वास्ते सुझाव देने और दवा नियंत्रक कार्यालय के कामकाज में सुधार के कदम उठाने के लिए एक विशेषज्ञ पैनल का गठन किया था।
उद्योग के विशेषज्ञों के मुताबिक पैनल के पास ऐसे विशेष 33 मामलों पर गौर करने का कोई अधिकार नहीं होता है जहां वर्तमान कानूनों का उल्लंघन करके लाइसेंस जारी किए गए थे।
एक स्वास्थ्य विशेषज्ञ और मंथली इंडेक्स ऑफ मेकिल स्पेशियलिटीज सी एम गुलाटी ने कहा, 'मंत्रालय द्वारा बनाई गई विशेषज्ञ समिति सिर्फ संसदीय समिति द्वारा उठायी गई खामियों पर गौर करेगी और सुधार के लिए अपने सुझाव देगी। उसे इन 33 दवाओं के मामले पर गौर करने का कोई अधिकार नहीं है।'
गुलाटी के मुताबिक बगैर ट्रायल के स्वीकृत दवाओं और कानून का उल्लंघन करने वालों पर तत्काल कार्रवाई होनी चाहिए। इसके अलावा सरकार को इन दवाओं की सुरक्षा और प्रभाव जांचने के लिए क्लीनिकल ट्रायल कराने का भी आदेश जारी करना चाहिए।
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