| जीएसटी सही, लेकिन दावे अतिरंजित! | | सुकुमार मुखोपाध्याय / June 17, 2012 | | | | |
उद्योग जगत और सरकार वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के बारे में बड़े-बड़े दावे कर रही है और बता रही है कि इसके पिटारे में हमारे लिए बहुत कुछ है। उद्योगों के एक महासंघ के प्रमुख ने कहा है कि जीएसटी व्यवस्था लागू हो जाने से सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 1.5 फीसदी की अतिरिक्त वृद्घि हो सकती है। इस वर्ष 22 मई को पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी) की ओर से जारी बुलेटिन में वित्त मंत्रालय ने भी ऐसे ही दावे किए हैं। मैं कहना चाहता हूं कि जीएसटी से होने वाले लाभ के बारे में सभी बड़े दावे बेकार साबित होंगे। जीएसटी कई वजहों से अच्छी कर प्रणाली है, लेकिन इसकी प्रशंसा उन विशेषताओं के लिए नहीं की जानी चाहिए, जो इसमें है ही नहीं।
जीएसटी कुछ खास वजहों से अच्छा है। यह बेहद बड़ा केंद्रीय उत्पाद शुल्क टैरिफ और अत्यधिक जटिल सेवा कर व्यवस्था खत्म कर देगा। एक व्यापक जीएसटी में केवल एक प्रविष्टि- वस्तुएं एवं सेवाएं और शुल्क की केवल एक या दो दरें होंगी। यह नई व्यवस्था लागू होने से वस्तुओं एवं सेवाओं के वर्गीकरण से संबंधित तमाम विवाद खत्म हो जाएंगे और वस्तुओं एवं सेवाओं के बीच अंतर करने की जरूरत भी नहीं रह जाएगी। इस प्रणाली की मदद से पूरे देश के लिए एक साझा बाजार की व्यवस्था भी हो जाएगी। लेकिन यह आदर्श स्थिति है और भारत में जीएसटी प्रणाली इस स्थिति से काफी दूर है। जीएसटी से संबंधित विभिन्न मसलों पर राज्यों के साथ जो विवाद उभरे हैं, वे मुख्य रूप से राज्यों की राजकोषीय स्वायत्तता के मुद्दे हैं जो दर्शाते हैं कि रोजाना आधार पर जीएसटी की कार्यप्रणाली उतनी ही मुश्किल हो जाएगी, जितनी दिक्कत दर्जनों भाई-बहनों वाले एक संयुक्त परिवार को चलाने में होती है क्योंकि छोटे-छोटे मसलों पर परिवार के हरेक सदस्य की राय अलग-अलग होती है। ऐसी परिस्थिति में कभी भी आम राय नहीं बनेगी। किसी भी फैसले के लिए दो तिहाई बहुमत बेहतर होना चाहिए, लेकिन अब तक ऐसी आदर्श स्थिति नहीं बन पाई है। इसलिए हर मसले पर गतिरोध उभरता है। फिलहाल हरेक राज्य में सिगरेट पर अलग-अलग मूल्य वर्धित कर (वैट) की व्यवस्था है, लेकिन ऐसी स्थिति के लिए वैट की परिकल्पना नहीं की गई थी।
बहरहाल, जिन लोगों की यह दलील है कि जीएसटी प्रणाली लागू हो जाने से जीडीपी में 1.5 फीसदी बढ़ोतरी होगी, उनका कहना है कि गलत कारणों से राजस्व का नुकसान रुकने के चलते ऐसा होगा। उनकी राय में ज्यादा कर संग्रह का अर्थ होगा ज्यादा निवेश और जीडीपी में अतिरिक्त वृद्घि। यह सैद्घांतिक उम्मीद है, लेकिन इसके समर्थन में वास्तविक उदाहरण नहीं दिए गए हैं। कई पश्चिमी देशों में वैट और जीएसटी लंबे समय से लागू हैं। वहां इन मसलों पर कई अध्ययन किए गए, जिनके नतीजे कहते हैं कि वैट से धन उगाही नहीं होती। इटली के प्रधानमंत्री मारियो मोंटी ने हाल ही में जमींदारों, प्लंबरों, बिजली के काम करने वालों और छोटे उद्यमियों से नकद में बड़े लेनदेन न करने का अनुरोध किया था। इटली सरकार को हर साल बकाया करों की वजह से 120 अरब यूरो से ज्यादा का नुकसान उठाना पड़ता है। स्पेन, ग्रीस, आयरलैंड और पुर्तगाल जैसे देशों के हालात भी इतने ही खराब हैं। यह दावा करना कि उपभोक्ताओं को कम कर बोझ का फायदा होगा, सीधे-सीधे उस दावे के विपरीत है कि नई व्यवस्था से राजस्व में बहुत बढ़ोतरी होगी। जीएसटी की व्यवस्था लागू होने से जीडीपी में 1.5 फीसदी इजाफा होने संबंधी मान्यता की पुष्टि किसी भी अनुसंधान संस्थान ने नहीं की है। कोई भी इस दावे की जिम्मेदारी नहीं लेता, लेकिन सभी लोग इसे आश्वस्ति के तौर पर ले रहे हैं। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि जीडीपी में 1.5 फीसदी बढ़ोतरी की बात अतिशयोक्तिपूर्ण है, बल्कि जीएसटी लागू होने के चलते राजस्व वृद्घि का कोई कारण नहीं है।
केंद्रीय स्तर पर सेनवैट (केंद्रीय मूल्य वर्धित कर) और प्रांतीय स्तर पर वैट की व्यवस्था पहले से है। जीएसटी में नया कुछ नहीं है, बल्कि यह सेनवैट, वैट और कुछ अन्य मौजूदा करों का एकीकरण भर है। लिहाजा राजस्व का स्तर पहले जैसा ही रहेगा। इसमें तभी बढ़ोतरी हो सकती है, जब कर आधार को विस्तार दिया जाए और कर की चोरी रोकी जाए। यदि जीएसटी लागू हो जाता है, तब भी न तो कर आधार बढ़ेगा और न ही कर की चोरी रुकेगी। यदि मौजूदा प्रणाली के तहत सेनवैट और वैट में कर चोरी की गुंजाइश है तो इनके एकीकरण के बाद भी यह खामी बरकरार रहेगी। आखिर जीएसटी किस आधार पर अपने दो घटकों से अलग होगा।
जीएसटी की बदौलत महंगाई बढ़ाने वाले कारकों को दूर करने की बात जोर-शोर से की जा रही है। जो लोग ऐसी बातें कर रहे हैं, वे भूल गए हैं कि सेनवैट और वैट की वजह से ये कारक पहले ही खत्म हो गए हैं। इसलिए फिर वही सवाल उठता है कि वैट और सेनवैट को मिलाकर बनाई गई नई व्यवस्था महंगाई बढ़ाने वाले उन कारकों को कैसे दूर करेगी, जो पहले से ही अस्तित्व में नहीं हैं?
ऐसे दावे भी किए गए हैं कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में वस्तुएं ज्यादा प्रतिस्पद्र्घी हो जाएंगी। इस विषय पर विशेषज्ञों के अनुसंधान इस दावे की पुष्टि नहीं करते। यदि दुनिया के सभी देशों में जीएसटी प्रणाली बहाल हो जाएगी तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में इनके प्रभाव एक-दूसरे को शून्य कर देंगे। निष्कर्ष यह है कि जीएसटी कुछ वजहों से अच्छा है, लेकिन इससे ज्यादा उम्मीद करना न तो तार्किक रूप से सही है और न ही आर्थिक नजरिये से उचित है।
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