प्रणव मुखर्जी पहली बार 15 जनवरी 1982 को वित्त मंत्री बने थे और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उनसे पूछा था कि क्या वह 27 फरवरी को बजट पेश कर पाएंगे (क्योंकि अगला दिन रविवार था)। मुखर्जी से पहले वित्त मंत्री रहे आर वेंकटरामन ने नवंबर दिसंबर 1981 में 5 अरब डॉलर एसडीआर के लिए आईएमएफ से समझौता किया था मगर इस पर अमल मुखर्जी के वित्त मंत्री के कार्यकाल के दौरान होना था। एसडीआर की 1.1 अरब डॉलर की आखिरी किस्त की आवश्यकता नहीं थी।
मुखर्जी ने कहा, 'मैंने आईएमएफ को लिखा कि हमें पैसे की जरूरत नहीं है और हमने तय अवधि में पूरे कर्ज की वापसी कर दी। आईएमएफ के इतिहास में यह पहली बार था कि कर्ज लेने वाले किसी देश ने कर्ज की पूरी रकम नहीं ली हो। मैंने 1984 के अपने बजट भाषण में बड़े गर्व के साथ इसका जिक्र किया।'
उनके पहले कार्यकाल की शुरुआत इस आरोप के साथ हुई कि 1982-83 का बजट आईएमएफ को लीक हो चुका था। मुखर्जी ने बताया कि इंदिरा गांधी इस बात से काफी परेशान थीं। तब मुखर्जी ने गांधी से कहा, 'फिक्र न करें। मैं कल इसका जवाब दूंगा। हमने कोई गलती नहीं की है।' सदन में मुखर्जी ने यह आरोप लगाने वाले पूर्व जनता पार्टी सरकार के एक मंत्री रवींद्र वर्मा को बताया, 'आपने जो आंकड़े और पाठ्य सामग्री उपलब्ध कराई है, वे सही हैं। पर आपने एक छोटी सी गलती कर दी है। आप जो पढ़ रहे हैं वह 1982-83 का बजट नहीं बल्कि 1981-82 का बजट है। हमने पिछले साल के बजट दस्तावेज आईएमएफ को दिए हैं जो ऐसे भी सार्वजनिक संपत्ति हैं।'
भारतीय अर्थव्यवस्था को 1982, 1983, 1984 और 1985 और इससे भी पहले 1979-80 में सूखे का सामना करना पड़ा था। मुखर्जी के दूसरे कार्यकाल में भी एक बार फिर 2009 में भारतीय कृषि को सूखे से गुजरना पड़ा था।
इंदिरा गांधी सरकार में वित्त मंत्री के तौर पर अपने पहले कार्यकाल में मुखर्जी ने सार्वजनिक बचत को पटरी पर लाने के लिए दो साधन पेश किए। उनमें से पहला सामाजिक सुरक्षा प्रमाणपत्र था जो तीन साल में निवेशित रकम को दोगुना करता था और दूसरा पूंजी निवेश फंड था जो निजी बचत के लिए सार्वजनिक क्षेत्र का निवेश आकर्षित करता था। इसकी परिपक्वता अवधि 10 साल थी और इसके लिए सालाना 17 फीसदी का कर मुक्त ब्याज था। आप समझ सकते हैं कि उन दिनों कितनी ऊंची ब्याज दरें मिला करती थीं।
संप्रग सरकार में वित्त मंत्री की भूमिका में भी मुखर्जी बढ़ती अर्थव्यवस्था की जरूरतों को पूरा करने के लिए बचत को पटरी पर लाने में जुटे रहे। खुदरा निवेशकों को इक्विटी बाजार में लाने के उद्देश्य से ही उन्होंने राजीव विकास योजना की शुरुआत की।
अपनी दोनों ही पारियों में उन्होंने वित्तीय समायोजन पर ध्यान दिया। 2011-12 में वित्तीय घाटा पूरा 1 फीसदी बढ़कर जीडीपी का 5.9 फीसदी हो गया था, जबकि अनुमान महज 4.6 फीसदी का ही था। मुखर्जी इसे कम करने की रणनीतियां बना रहे थे। उन्होंने वित्तीय घाटा कम कर के जीडीपी का 5.1 फीसदी लाने का लक्ष्य रखा था।
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