साल 2012-13 के फसल विपणन वर्ष के लिए सरकार ने गुरुवार को मुख्य खरीफ फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में अधिकतम 53 फीसदी तक का इजाफा कर दिया। इस इजाफे के साथ ही महंगाई के और बढऩे का खतरा पैदा हो गया है और महंगाई बढऩे से आर्थिक समस्याओं में और इजाफा हो सकता है। सरकार ने कृषि लागत और मूल्य आयोग (सीएसीपी) की सिफारिशों को स्वीकर कर लिया है। उत्पादन लागत को ध्यान में रखते हुए सीएसीपी एमएसपी की सिफारिश करता है। आर्थिक मामलों की कैबिनेट कमेटी की बैठक के बाद गृह मंत्री पी चिदंबरम ने फैसले की जानकारी दी।
गुरुवार को हुई बढ़ोतरी के बाद साल 2012-13 के सीजन में धान की सामान्य किस्म की एमएसपी 1250 रुपये प्रति क्विंटल होगी, जो पहले के मुकाबले 16 फीसदी ज्यादा है। धान की ए श्रेणी की एमएसपी अब 1280 रुपये प्रति क्विंटल होगी, जो पहले के मुकाबले 15 फीसदी ज्यादा है। तिलहन और उड़द की एमएसपी में भी 37 फीसदी तक की बढ़ोतरी की गई है ताकि आयात पर देश की निर्भरता कम हो। कैबिनेट ने हालांकि मूंग और अरहर की एमएसपी में बढ़ोतरी का फैसला टाल दिया क्योंकि उपभोक्ता मामलों के विभाग की तरफ से इसका विरोध किया जा रहा था। विभाग को डर है कि अगर एमएसपी में तेज बढ़ोतरी की गई तो खुदरा कीमतें बढ़ जाएंगी। सीएसीपी ने मूंग और अरहर की एमएसपी में क्रमश: 29 व 25 फीसदी की बढ़ोतरी की सिफारिश की थी। अधिकारियों ने कहा कि धान के एमएसपी के ऊपर 100 रुपये प्रति क्विंटल का बोनस देने के प्रस्ताव को इसी आधार पर खारिज कर दिया गया।
एमएसपी में तीव्र बढ़ोतरी से महंगाई बढऩे के दावे का विरोध करते हुए सीएसीपी के चेयरमैन अशोक गुलाटी ने कहा - उच्च एमएसपी का असर देश की बड़ी आबादी पर नहीं पड़ेगा क्योंकि 60 फीसदी आबादी को जल्द ही बाजार से कम कीमत पर अनाज मिलेगा, जब खाद्य सुरक्षा विधेयक लागू होगा। गुलाटी ने कहा, इसके अलावा सरकारी गोदामों में काफी ज्यादा अनाज है और कीमतों में बढ़ोतरी पर लगाम कसने के लिए यह पर्याप्त है। उन्होंने यह भी कहा कि तिलहन व कुछ दालों की खुदरा कीमतें पहले ही एमएसपी से ऊपर है, लिहाजा इनकी एमएसपी में तीव्र बढ़ोतरी से कीमतें नहीं बढ़ेंगी।
गुलाटी ने कहा कि आदर्श स्थिति में मौजूदा बाजार कीमत के मुकाबले एमएसपी सिर्फ 10-15 फीसदी कम होना चाहिए, लेकिन मौजूदा समय में कुछ फसलों की एमएसपी बाजार कीमत के मुकाबले करीब 50 फीसदी कम है। अगर हम ज्यादा एमएसपी की सिफारिश नहीं करेंगे तो फिर किसानों को प्रोत्साहन नहीं मिलेगा।
उन्होंने कहा - हमने एमएसपी का सिर्फ समायोजन नहीं किया है बल्कि इसके बदले प्रक्रिया के पुनर्गठन के जरिए सिफारिश की है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि उत्पादक गैर-खाद्य फसलों का भी रुख करें और इनका उत्पादन मांग से कम है। अन्य फसलों में उड़द की एमएसपी 30 फीसदी बढ़ाकर 4300 रुपये प्रति क्विंटल कर दी गई है जबकि काले सोयाबीन की एमएसपी 2200 रुपये और पीले सोयाबीन की एमएसपी 2240 रुपये प्रति क्विंटल तय की गई है। इनमें साल 2011-12 के मुकाबले 550 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी की गई है। इसी तरह मूंगफली की एमएसपी 37 फीसदी बढ़ाकर 3700 रुपये प्रति क्विंटल कर दी गई है।
कपास की एमएसपी में 28 फीसदी की बढ़ोतरी का ऐलान किया गया है और मीडियम व लॉन्ग कपास के लिए क्रमश: 3600 व 3900 रुपये प्रति क्विंटल की एमएसपी तय की गई है। मोटे अनाज के मामले में सरकार ने मक्के व बाजरे की एमएसपी में 195-195 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी का फैसला किया है और इस तरह इसकी एमएसपी 1175-1175 रुपये प्रति क्विंटल होगी। वहीं ज्वार की एमएसपी 520 रुपये बढ़ाकर 1500 रुपये प्रति क्विंटल कर दी गई है। केयर रेटिंग के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस ने कहा - मुझे समझ में नहीं आता कि गेहूं व चावल के अलावा दूसरी फसलों की एमएसपी का ऐलान करने की आखिर क्या दरकार है जबकि इनकी सरकारी खरीद नहीं होती। इससे सिर्फ और सिर्फ खाद्य महंगाई में इजाफा होगा। उन्होंने कहा कि दूसरी फसलों की एमएसपी के ऐलान की पूरी प्रक्रिया को समाप्त कर दिया जाना चाहिए क्योंकि इससे अनावश्यक रूप से खाद्य महंगाई में इजाफा होता है।
रेलिगेयर कमोडिटीज के शोध में कहा गया है कि हालांकि किसानों द्वारा विभिन्न फसलों के लिए खेतों के आवंटन में एमएसपी प्रमुख भूमिका निभाता है, लेकिन पिछले कुछ सालों के अनुभव से पता चलता है कि सोयाबीन, कपास और धान को छोड़ दें तो किसानों ने एमएसपी में बढ़ोतरी के हिसाब से अपनी प्रतिक्रिया नहीं जताई है।
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